Devar Bhabhi Love story,: सुबह के ठीक साढ़े आठ बजे थे। दक्षिण दिल्ली की एक कॉलोनी की गलियों में हल्की-हल्की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। तभी एक मकान के भारी लोहे के गेट को खोलते हुए शशांक अपनी रॉयल एनफील्ड बाइक बाहर लाया।
शशांक की उम्र यही कोई सत्ताइस-अट्ठाइस साल थी। साफ-सुथरा कटी हुई दाढ़ी, सलीके से सँवारे बाल और नीली फॉर्मल शर्ट में उसकी शख्सियत में एक अजीब सा ठहराव और संजीदगी झलकती थी। वह दिल्ली की एक जानी-मानी आईटी कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था।
शशांक ने बाइक स्टार्ट की। इंजन की भारी आवाज़ हवा में गूँज उठी। तभी घर के भीतर से सुलेखा बाहर आई। तीस साल की सुलेखा ने हल्के पीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था, कंधे पर ऑफिस का बैग था और आँखों में एक अजीब सी उदासी के साथ-साथ आज की सुबह का एक नया संकल्प था। उसने धीरे से मकान के गेट को बंद किया और शशांक के पास आकर बाइक की पिछली सीट पर बैठ गई।
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जैसे ही सुलेखा बाइक पर बैठी, उसका हाथ स्वाभाविक रूप से शशांक के कंधे पर टिक गया। बाइक जैसे ही कॉलोनी के नुक्कड़ पर बने पार्क के पास से गुजरी, वहाँ टहल रहे मिश्रा जी और उनके साथ खड़े तीन-चार बुजुर्गों की नजरें उन पर टिक गईं। मिश्रा जी ने चाय की चुस्की लेते हुए अपने चश्मे को नाक पर थोड़ा नीचे खिसकाया और पास खड़े शर्मा जी से कानाफूसी की, “देख रहे हो शर्मा जी? अभी धीरज को गए दो साल भी नहीं हुए… और छोटी बहू ने देवर की बाइक की पीठ पकड़ ली है। जमाना सचमुच खराब है।”
शर्मा जी ने गहरी सांस लेकर हामी भरी, “और नहीं तो क्या मिश्रा जी! लोग मर्यादा भूल चुके हैं। वैसे भी, इस कंचन विला में तो जैसे दुखों का पहाड़ ही टूटा है, लेकिन इन जवानों को देखो, इन्हें अपनी ही धुन सवार है।”
सुलेखा ने उन निगाहों को देख लिया था। उसकी उँगलियाँ शशांक के कंधे पर थोड़ी और कस गईं। उसने अपना सिर थोड़ा नीचे झुका लिया, जैसे वह उन तीखे तीरों जैसे तानों से खुद को बचाना चाहती हो।
शशांक ने शीशे में सुलेखा का मुरझाया हुआ चेहरा देखा। उसने बाइक की रफ्तार थोड़ी धीमी की और बेहद शांत मगर आश्वस्त करने वाली आवाज में कहा, “सुलेखा… नीचे मत देखो। तुमने कोई गुनाह नहीं किया है। ये लोग दूसरों की जिंदगी की खाली किताबें पढ़ना पसंद करते हैं क्योंकि इनकी खुद की किताबें कोरी होती हैं।”

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सुलेखा के होठों पर एक बहुत ही हल्की, लगभग अदृश्य मुस्कान तैर गई। उसने कहा, “मैं जानती हूँ शशांक। लेकिन कभी-कभी ये नजरें पीठ में चुभने वाले नश्तर की तरह लगती हैं। दो साल हो गए धीरज को गए… न्यूयॉर्क की उस सर्द रात में जब उनका ट्रक पलटा था, तो मेरा सब कुछ वहीं जमींदोज हो गया था। तब इनमें से कोई आंसू पोंछने नहीं आया था। आज जब मैं अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश कर रही हूँ, तो सबको मेरी मर्यादा की चिंता सता रही है।”
शशांक ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उसने बाइक की स्पीड बढ़ा दी। वह सुलेखा को उस संकीर्ण माहौल से दूर ले जाना चाहता था। सुलेखा दिल्ली की एक नामी ई-कॉमर्स कंपनी में लॉजिस्टिक्स मैनेजर के पद पर काम करती थी। उसका ऑफिस शशांक के ऑफिस से महज दो किलोमीटर की दूरी पर था। इसलिए रोज़ सुबह दोनों का एक साथ निकलना और शाम को कभी-कभार साथ लौटना अब एक नियम बन चुका था। लेकिन इस रोजमर्रा के नियम के पीछे जज्बातों की जो नई इबारत लिखी जा रही थी, उससे घर के बाकी लोग अब तक अनजान थे।
Devar Bhabhi Love story: घर का खालीपन और सिमरन की दुनिया
जब शशांक और सुलेखा काम पर निकल जाते, तब घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर जाता था। इस तीन मंजिला आलीशान मकान में सुख-सुविधा की हर चीज़ मौजूद थी, पर यहाँ की दीवारों में एक खामोश रुदन कैद था।
घर के मुखिया थे दीनदयाल उपाध्याय, जो दिल्ली पुलिस से रिटायर्ड थे। उनके कड़क अनुशासन के नीचे पूरा परिवार पला-बढ़ा था। उनकी पत्नी सुमित्रा देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं, जो अपना अधिकांश समय पूजा-पाठ और टीवी पर सत्संग देखने में बिताती थीं। दीनदयाल जी और सुमित्रा जी के तीन बेटे थे- रमेश, धीरज और शशांक।
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सबसे बड़े बेटे रमेश की शादी चालीस वर्षीय सिमरन से हुई थी। रमेश और सिमरन की शादी के सात साल बाद ही रमेश को ब्लड कैंसर हो गया था। सिमरन ने दिन-रात एक करके उसकी सेवा की, लेकिन चार साल पहले रमेश ने दम तोड़ दिया। सिमरन तब से ही इस घर में बड़ी बहू के रूप में एक सन्यासी जैसा जीवन जी रही थी। वह बेहद खूबसूरत, शांत और गंभीर महिला थीं।
उन्होंने अपनी सारी इच्छाओं, रंगीन साड़ियों और अपनी मुस्कान को जैसे अलमारी के किसी सबसे गहरे कोने में बंद कर दिया था। उनका पूरा दिन रसोई संभालने, सास-ससुर की दवाइयों का ध्यान रखने और घर की साफ-सफाई में बीत जाता था।
दूसरे बेटे धीरज की शादी सुलेखा से हुई थी। धीरज थोड़ा महत्वाकांक्षी था। वह ज्यादा पैसे कमाने और अपने परिवार को एक बेहतर भविष्य देने के लिए न्यूयॉर्क चला गया था। वहाँ उसने ट्रक चलाने का काम शुरू किया। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन दो साल पहले एक बर्फीली रात में उसकी गाड़ी का भयानक एक्सीडेंट हो गया और धीरज इस दुनिया से हमेशा के लिए चला गया। तीस साल की उम्र में सुलेखा विधवा हो गई। उस समय वह पूरी तरह टूट चुकी थी।
इस दोहरे वज्रपात ने पूरे घर को हिलाकर रख दिया था। घर के दोनों बड़े बेटों की अर्थियाँ उठ चुकी थीं। अब केवल सबसे छोटा बेटा शशांक ही इस परिवार का एकमात्र चिराग और सहारा बचा था।

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दोपहर के समय सिमरन रसोई में अकेली खड़ी सब्ज़ी काट रही थी। बाहर आँगन में सुमित्रा देवी माला जप रही थीं। सिमरन की आँखें खिड़की से बाहर लगे अमलतास के पेड़ पर टिकी थीं, जिस पर पीले फूल खिले हुए थे। वसंत आ चुका था, लेकिन सिमरन की जिंदगी में पतझड़ का सन्नाटा कई सालों से पसरा हुआ था। उसने अपनी कलाई पर बंधी सूनी कांच की चूड़ियों को देखा, जो अब केवल नाममात्र की थीं। उसकी उम्र चालीस की थी, लेकिन उसका मन साठ साल के किसी बुजुर्ग जैसा थक चुका था।
तभी उसकी नज़र रसोई के काउंटर पर रखे शशांक के टिफिन बॉक्स पर पड़ी, जिसे वह आज सुबह जल्दबाजी में ले जाना भूल गया था। सिमरन के मन में एक अजीब सी टीस उठी। शशांक इस घर में केवल एक देवर नहीं था, वह पूरे परिवार की रीढ़ था।
वह सिमरन का कितना सम्मान करता था! हर छोटी बात पर भाभी से पूछना, उनके सिर में दर्द होने पर खुद दवा लाकर देना, और जब कभी सिमरन उदास होती, तो बिना कुछ कहे उसके पसंदीदा काजू कतली के डिब्बे लाकर चुपके से उसकी मेज पर रख देना।
सिमरन ने एक ठंडी सांस ली और सब्ज़ी काटने लगी। लेकिन उसका दिमाग अभी भी सुबह के उस दृश्य पर अटका हुआ था जब उसने बालकनी से शशांक की बाइक पर बैठती हुई सुलेखा को देखा था। सुलेखा की आँखों की वह चमक, जो धीरज के जाने के बाद खो गई थी, शशांक के पास आते ही वापस लौट आती थी।
सिमरन कोई नासमझ नहीं थी। वह औरत थी और दूसरी औरत के दिल में उठने वाले जज्बातों की आहट बहुत पहले सुन लेती है। उसे महसूस होने लगा था कि सुलेखा और शशांक के बीच का रिश्ता अब केवल देवर-भाभी या दोस्ती का नहीं रह गया था। उसमें एक नया, नाजुक और गहरा रंग घुल चुका था।

Devar Bhabhi Love story: बारिश, सहारा और उभरता हुआ प्यार
शाम के करीब सात बज रहे थे। दिल्ली के आसमान पर अचानक काले बादलों ने डेरा डाल लिया था और तेज हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी।
सुलेखा अपने ऑफिस की लॉबी में खड़ी थी। उसके पास छाता नहीं था और ऑटो या कैब मिलना इस मौसम में नामुमकिन जैसा लग रहा था। वह घबराहट में अपने फोन की स्क्रीन देख रही थी। तभी ऑफिस के मुख्य गेट पर एक कार आकर रुकी। कार का शीशा नीचे हुआ—वह शशांक था। उसने ऑफिस की ही एक कैब किराए पर ली थी ताकि वह सुलेखा को लेने आ सके।
सुलेखा दौड़कर कार में बैठ गई। उसके बाल और कंधे थोड़े भीग चुके थे। उसने हंसते हुए अपने बालों को झटका, जिससे पानी की कुछ बूंदें शशांक के चेहरे पर जा गिरीं।
“सॉरी!” सुलेखा ने जीभ काटते हुए कहा और तुरंत अपने पर्स से टिशू पेपर निकालकर शशांक का चेहरा पोंछने लगी।
शशांक ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। कार के भीतर का तापमान थोड़ा ठंडा था, लेकिन शशांक के हाथ की छुअन में एक ऐसी गर्माहट थी जिसने सुलेखा के दिल की धड़कनों को तेज कर दिया। दोनों की नजरें मिलीं। कार के शीशों पर गिरती बारिश की बूंदों ने बाहर की दुनिया को धुंधला कर दिया था, जिससे उस छोटी सी जगह में एक बेहद निजी और जादुई माहौल बन गया था।
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“तुम हमेशा मेरे लिए सही समय पर कैसे आ जाते हो, शशांक?” सुलेखा ने बहुत ही धीमी आवाज में पूछा, उसकी आँखों में कृतज्ञता और गहरे प्यार के भाव तैर रहे थे।
“क्योंकि मेरा दिल जानता है कि तुम्हें मेरी ज़रूरत कब है, सुलेखा,” शशांक ने बेहद संजीदगी से कहा। “जब भैया गए थे, तो मैंने खुद से वादा किया था कि मैं तुम्हें इस घर में कभी अकेला या बेसहारा महसूस नहीं होने दूँगा। लेकिन धीरे-धीरे… मुझे अहसास हुआ कि मैं यह सब सिर्फ एक कर्तव्य के रूप में नहीं कर रहा हूँ।”
“तो फिर?” सुलेखा की सांसें थम सी गईं।
शशांक ने उसका हाथ थोड़ा और कसकर थाम लिया, “क्योंकि मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ, सुलेखा। तुम्हारी उदासी मुझे तड़पाती है, और तुम्हारी छोटी सी मुस्कान मेरी पूरी दुनिया को रोशन कर देती है। मुझे नहीं पता कि समाज इसे क्या नाम देगा, पापा-मम्मी क्या कहेंगे… लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए जो जज्बात हैं, वे बिल्कुल सच्चे हैं।”
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सुलेखा की आँखों से आंसू बह निकले। यह दुख के आंसू नहीं थे, बल्कि उस सूनेपन के खत्म होने की राहत थी जिसने उसे दो सालों से अपनी गिरफ्त में ले रखा था। उसने अपना सिर शशांक के कंधे पर रख दिया।
“मैं भी शशांक…” सुलेखा ने सिसकते हुए कहा। “धीरज के जाने के बाद मुझे लगता था कि मेरी जिंदगी खत्म हो गई है। लेकिन तुमने मुझे फिर से जीना सिखाया। जब मैं तुम्हारे पीछे बाइक पर बैठती हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं दुनिया के सबसे सुरक्षित साये में हूँ। मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि कॉलोनी के लोग क्या बकवास करते हैं। मेरे लिए तुम ही मेरा सच हो।”
उस शाम, दिल्ली की उस मूसलाधार बारिश के बीच, बंद कार के भीतर दो अकेली रूहों ने एक-दूसरे में अपना आशियाना ढूंढ लिया था। उनका यह अफेयर कोई शारीरिक आकर्षण नहीं था, बल्कि दो दिलों की वह गहराई थी जहाँ दुख, सम्मान और समझदारी का अनूठा संगम था।

Devar Bhabhi Love story: सिमरन का सच और एक नया आकर्षण
समय अपनी गति से बीतता रहा। शशांक और सुलेखा का प्यार गहरा होता गया, लेकिन वे घर के भीतर बेहद सतर्क रहते थे। डाइनिंग टेबल पर वे एक-दूसरे को सामान्य रूप से ही बुलाते थे, लेकिन कभी-कभी आँखों ही आँखों में होने वाली बातें सिमरन की पैनी नज़रों से छुप नहीं पाती थीं।
एक रविवार की दोपहर, घर के सभी लोग सो रहे थे। शशांक अपने कमरे में लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। तभी सिमरन उसके कमरे में चाय का कप लेकर दाखिल हुई।
“शशांक, तुम्हारी चाय,” सिमरन ने अपनी मधुर और शांत आवाज में कहा।
“अरे भाभी! थैंक यू सो मच। आपको तकलीफ करने की क्या ज़रूरत थी, मैं खुद ले लेता,” शशांक ने मुस्कुराते हुए लैपटॉप बंद किया और चाय का कप थाम लिया।
सिमरन वहीं बेड के कोने पर बैठ गई। उसने शशांक को चाय पीते हुए देखा। शशांक का चौड़ा माथा, उसकी गहरी आँखें और उसके चेहरे पर झलकती वह सौम्यता सिमरन को भीतर तक छू गईं। सिमरन ने अचानक महसूस किया कि रमेश के जाने के बाद उसने कभी किसी पुरुष को इस तरह इतने करीब से नहीं देखा था।
“शशांक…” सिमरन ने हिचकिचाते हुए बात शुरू की। “तुम आजकल काफी थके हुए लगते हो। ऑफिस का काम बहुत ज्यादा है क्या?”
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“नहीं भाभी, बस थोड़ा प्रोजेक्ट का प्रेशर है। वैसे भी, घर में जब आप और सुलेखा सब संभाल लेते हैं, तो मुझे किसी चीज़ की चिंता नहीं रहती,” शशांक ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।
सिमरन ने गहराई से उसे देखा, “और सुलेखा का… उसका ख्याल तुम बहुत अच्छे से रख रहे हो। मैंने देखा है कि वह आजकल बहुत खुश रहने लगी है।”
सिमरन की आवाज़ में कोई उलाहना नहीं था, बल्कि एक अजीब सा दर्द और खालीपन था। शशांक थोड़ा सकपका गया। उसने चाय का कप साइड में रखा और कहा, “भाभी, सुलेखा ने बहुत कम उम्र में बहुत बड़ा दुख देखा है। धीरज भैया के जाने के बाद वह पूरी तरह टूट गई थी। मैं तो बस उसे थोड़ा सहारा देने की कोशिश कर रहा हूँ।”
सिमरन के होठों पर एक उदास मुस्कान उभरी, “सहारा… या कुछ और, शशांक?”
शशांक के चेहरे का रंग उड़ गया। वह समझ गया कि बड़ी भाभी सब जान चुकी हैं। वह कुछ कहने ही वाला था कि सिमरन ने अपना हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“घबराओ मत शशांक। मैं घर में किसी से कुछ नहीं कहूँगी। पापाजी का दिल कमज़ोर है और मम्मीजी इस बात को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाएँगी। लेकिन… मैं सुलेखा की किस्मत पर रश्क करती हूँ,” सिमरन की आँखों में एक खामोश आंसू तैर आया। “वह खुशकिस्मत है कि उसे संभालने के लिए तुम मिल गए। रमेश को गए चार साल हो गए शशांक… इन चार सालों में इस घर की चारदीवारी के बीच मैंने अपनी जवानी, अपनी इच्छाओं और अपनी रूह को घुट-घुट कर मरते देखा है। जब सुलेखा को देखती हूँ, तो मुझे अपना वह खालीपन और ज्यादा डराने लगता है।”
शशांक सिमरन के इस दर्द को देखकर सुन्न रह गया। उसने कभी सिमरन भाभी के भीतर छिपे इस बवंडर को नहीं देखा था। उसने धीरे से सिमरन का हाथ अपने हाथों में ले लिया।
“भाभी… आप ऐसा मत कहिए। आपने इस परिवार के लिए जो कुर्बानियाँ दी हैं, उनका कर्ज हम कभी नहीं चुका सकते। आप हमारे लिए पूजनीय हैं,” शशांक ने बेहद भावुक होकर कहा।
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सिमरन ने अपना हाथ नहीं खींचा। शशांक के हाथ की छुअन ने उसके भीतर सालों से दबी उस स्त्री को जगा दिया था जो प्यार और स्पर्श के लिए तरस रही थी। उसने शशांक की आँखों में देखा-उन आँखों में दया, सम्मान और एक अजीब सी कशमकश थी।
“पूजनीय नहीं बनना चाहती मैं शशांक,” सिमरन ने बहुत ही धीमी, कांपती हुई आवाज़ में कहा। “मैं भी एक इंसान हूँ। मुझे भी कभी-कभी लगता है कि कोई मेरे सिर पर हाथ रखे, कोई मुझसे पूछे कि सिमरन तुमने खाना खाया या नहीं। कोई मेरे अकेलेपन को गले लगा ले।”
यह कहकर सिमरन उठ खड़ी हुई और तेजी से कमरे से बाहर निकल गई। लेकिन वह शशांक के दिल-दिमाग पर एक ऐसा बोझ छोड़ गई जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। शशांक को पहली बार अहसास हुआ कि बड़ी भाभी भी उसके प्रति एक गहरे और अनकहे आकर्षण की गिरफ्त में आ चुकी हैं। वह असमंजस में पड़ गया। एक तरफ सुलेखा का प्रेम था, जिसे वह अपना मान चुका था, और दूसरी तरफ सिमरन भाभी की वह तन्हाई और मूक पुकार थी जिसे वह अनदेखा नहीं कर पा रहा था।

Devar Bhabhi Love story: राखी की एंट्री और ऑफिस की उलझन
जैसे शशांक के निजी जीवन का यह तूफान कम था, वैसे ही उसके पेशेवर जीवन में भी एक नया मोड़ आ गया। शशांक की आईटी कंपनी के प्रोजेक्ट में एक नई टीम लीडर की एंट्री हुई- राखी।
राखी पच्चीस साल की एक बेहद खूबसूरत, तेजतर्रार और जिंदादिल लड़की थी। वह दिल्ली के ही एक संभ्रांत परिवार से वास्ता रखती थी। काम के प्रति उसकी लगन और उसकी हाजिरजवाबी ने ऑफिस में सबका दिल जीत लिया था। शशांक और राखी को एक ही प्रोजेक्ट पर साथ काम करना था, जिसके चलते दोनों का काफी समय मीटिंग्स और क्लाइंट कॉल्स में बीतने लगा।
शशांक की सादगी, उसकी समझदारी और महिलाओं के प्रति उसका सम्मानजनक व्यवहार देखकर राखी धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होने लगी। वह शशांक के साथ लंच करने के बहाने ढूंढती, काम खत्म होने के बाद कॉफी पीने की जिद करती और अक्सर अपनी निजी जिंदगी की बातें भी उससे साझा करने लगी।
एक शाम, जब दोनों ऑफिस की छत पर बने कैफेटेरिया में बैठे थे, राखी ने कॉफी का मग टेबल पर रखते हुए सीधे शशांक की आँखों में देखा।
“शशांक, मैं बहुत घुमा-फिराकर बात करना नहीं जानती। मुझे सीधे बात करना पसंद है,” राखी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हाँ राखी, कहो ना। कोई प्रॉब्लम है प्रोजेक्ट में?” शशांक ने सहजता से पूछा।
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“प्रोजेक्ट में नहीं, मेरी जिंदगी में एक खूबसूरत प्रॉब्लम आ गई है… और वो प्रॉब्लम तुम हो,” राखी ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को शशांक पर टिकाते हुए कहा। “शशांक, मैं तुम्हें पसंद करती हूँ। सिर्फ एक कलीग की तरह नहीं, बल्कि एक लाइफ पार्टनर की तरह। मैंने अपने पेरेंट्स से भी तुम्हारे बारे में बात की है। वे तुम्हें बहुत पसंद करेंगे। क्या तुम मेरे साथ अपनी जिंदगी आगे बढ़ाने के बारे में सोचोगे?”
शशांक के हाथ से कॉफी का मग छूटते-छूटते बचा। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह राखी को एक बहुत अच्छी दोस्त और कलीग मानता था, लेकिन उसकी जिंदगी में पहले से ही जो उलझनें चल रही थीं, उनमें राखी के इस प्रपोजल ने आग में घी का काम किया था।
“राखी… मैं… मैं सचमुच सम्मानित महसूस कर रहा हूँ कि तुम मेरे बारे में ऐसा सोचती हो,” शशांक ने हकलाते हुए कहा। “लेकिन मेरी जिंदगी वैसी नहीं है जैसी बाहर से दिखती है। मेरे परिवार की कुछ ऐसी जिम्मेदारियाँ हैं, कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं कि मैं अभी इस बारे में कुछ नहीं कह सकता।”
“शशांक, जिम्मेदारियाँ सबकी होती हैं। हम मिलकर उन्हें संभाल लेंगे। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। मैं तुम्हें सोचने के लिए समय देती हूँ, लेकिन प्लीज मुझे बिना सोचे-समझे ना मत कहना,” राखी ने बेहद प्यार और उम्मीद के साथ उसका हाथ थपथपाया।
शशांक ऑफिस से घर के लिए निकला, तो उसका सिर फटा जा रहा था। वह एक ऐसे दोराहे पर खड़ा था जहाँ से उसे कोई रास्ता सुझाई नहीं दे रहा था।

Devar Bhabhi Love story: भावनाओं का बवंडर और बेकाबू सच
घर पहुँचने पर शशांक का सामना एक नई मुसीबत से हुआ। सुलेखा और सिमरन के बीच का तनाव अब साफ महसूस होने लगा था।
सुलेखा ने भांप लिया था कि सिमरन का व्यवहार शशांक के प्रति बदल गया है। सिमरन अब खुद शशांक के कपड़े प्रेस करने लगी थी, उसके पसंद की डिशेज खुद बनाने लगी थी और जब कभी शशांक सुलेखा से बात कर रहा होता, तो सिमरन का वहाँ अचानक आ जाना सुलेखा को खटकने लगा था।
एक रात, जब पूरा घर सो रहा था, सुलेखा दबे पांव शशांक के कमरे में आई। उसका चेहरा गुस्से और जलन से लाल था।
“शशांक! मुझे तुमसे अभी बात करनी है,” सुलेखा ने फुसफुसाते हुए लेकिन कड़े लहजे में कहा।
“सुलेखा? इतनी रात को यहाँ… कोई देख लेगा तो बवाल हो जाएगा। क्या बात है?” शशांक ने घबराकर दरवाजा बंद किया।
“बवाल तो वैसे भी होने वाला है शशांक! मुझे यह बताओ कि दीदी (सिमरन) का तुम्हारे प्रति यह व्यवहार क्या है? वह आजकल तुम्हारे इतने करीब आने की कोशिश क्यों कर रही हैं? क्या वह भूल गई हैं कि तुम मेरे…” सुलेखा बोलते-बोलते रुक गई, उसकी आँखों में जलन के आंसू थे।
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“सुलेखा, तुम गलत समझ रही हो। भाभी बड़ी हैं, वे बस मेरा ख्याल रखती हैं…” शशांक ने उसे समझाने की कोशिश की।
“मैं अंधी नहीं हूँ शशांक!” सुलेखा ने उसका कॉलर पकड़ते हुए कहा। “मैं देखती हूँ कि जब तुम कमरे में होते हो, तो वह किस तरह तुम्हें निहारती हैं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बेरंग बिता दी, और अब जब मेरी जिंदगी में थोड़ा सा रंग आया है, तो क्या वह इसे भी मुझसे छीन लेना चाहती हैं? मुझे डर लग रहा है शशांक। मुझे डर है कि कहीं मैं तुम्हें खो न दूँ।”
शशांक ने सुलेखा को गले से लगा लिया, “तुम मुझे कभी नहीं खोओगी सुलेखा। मैं सिर्फ तुमसे प्यार करता हूँ। प्लीज शांत हो जाओ।”
लेकिन तभी कमरे का आधा खुला दरवाजा धीरे से पूरा खुल गया। सामने सिमरन खड़ी थी। उसके हाथ में पानी की बोतल थी, जो शायद वह रसोई से भरकर ला रही थी। सिमरन ने शशांक और सुलेखा को एक-दूसरे के आगोश में बंधे देख लिया था।
तीनों के बीच एक सन्नाटा पसर गया। सुलेखा तुरंत शशांक से अलग हुई। उसकी आँखों में चोरी पकड़े जाने का डर और सिमरन के प्रति गुस्सा साफ दिख रहा था।
सिमरन ने पानी की बोतल को जोर से पकड़ा। उसके चेहरे पर गुस्से की जगह एक गहरा और असहनीय दर्द था। उसने सुलेखा की तरफ देखा और फिर शशांक की तरफ।
“तो… तुम दोनों का यह रिश्ता इस हद तक आगे बढ़ चुका है,” सिमरन की आवाज़ कांप रही थी।
“दीदी, आप जो देख रही हैं…” सुलेखा ने कड़े लहजे में बोलना शुरू किया, “हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं। धीरज के जाने के बाद शशांक ही मेरी जिंदगी का एकमात्र सहारा है। क्या आपको मेरी यह खुशी बर्दाश्त नहीं हो रही?”
सुलेखा के इस तीखे प्रहार ने सिमरन के सब्र का बांध तोड़ दिया। उसकी आँखों से आंसू बह निकले।
“खुशी? सुलेखा, तुम मुझे अपनी खुशी का दुश्मन समझ रही हो?” सिमरन ने रोते हुए कहा। “तुम भूल रही हो कि जब धीरज गया था, तो मैं ही थी जिसने रात-रात भर जागकर तुम्हें अपनी बांहों में सुलाया था। लेकिन तुमने कभी मेरे कमरे की उस खाली दीवार को देखा है? आठ साल से मैं उस दीवार को रमेश की तस्वीर के साथ देख रही हूँ।
मेरी जवानी, मेरे अरमान सब इस रसोई के धुएं में उड़ गए। जब मैंने देखा कि शशांक तुम्हारे अकेलेपन को दूर कर रहा है, तो मेरे दिल में भी एक उम्मीद जगी थी कि शायद… शायद इस बंजर जमीन पर भी कभी प्यार की दो बूंदें गिरेंगी। क्या मेरा यह सोचना गुनाह था? क्या मुझे इस घर में सिर्फ एक बेजान मूरत बनकर ही रहना होगा?”
सिमरन की इस बेबाक और दर्द भरी स्वीकारोक्ति ने सुलेखा को भीतर तक हिला दिया। वह स्तब्ध रह गई। उसे पहली बार अहसास हुआ कि बड़ी दीदी का दर्द उसके अपने दर्द से कहीं ज्यादा गहरा और पुराना था।
शशांक दोनों के बीच खड़ा था। वह अपनी दोनों भाभियों के इस असीम दर्द और उनके बीच उठने वाले इस भावनात्मक तूफान को देख रहा था। उसे लगा कि यदि उसने इस स्थिति को अभी नहीं संभाला, तो कंचन विला ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा। ससुर जी का कमजोर दिल यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा, और समाज उनके इस अनोखे त्रिकोण को कीचड़ में घसीट देगा।

Devar Bhabhi Love story: शशांक का धर्मसंकट और आत्ममंथन
उस भयानक रात के बाद कंचन विला में एक भारी और दम घोटने वाला सन्नाटा पसर गया। सिमरन ने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया था। वह केवल सास-ससुर की दवाइयों और खाने के समय बाहर आती थी, लेकिन उसकी आँखों में अब कोई चमक नहीं बची थी। सुलेखा भी गुमसुम रहने लगी थी। उसने शशांक के साथ बाइक पर जाना बंद कर दिया था। वह अब ऑटो से ऑफिस जाने लगी थी।
शशांक का मन अपने काम में बिल्कुल नहीं लग रहा था। ऑफिस में राखी लगातार उसके फैसले का इंतजार कर रही थी। वह रोज़ उसे उम्मीद भरी नज़रों से देखती, लेकिन शशांक केवल नजरें चुरा लेता था।
शशांक कई रातों तक सो नहीं सका। वह अपने कमरे की बालकनी में खड़ा होकर दिल्ली की जगमगाती रोशनी को देखता रहता और सोचता:
‘अगर मैं सुलेखा से शादी कर लेता हूँ, तो बड़ी भाभी का क्या होगा? वे फिर से उसी अकेलेपन और अंधकार में चली जाएँगी। क्या वे यह बर्दाश्त कर पाएँगी कि उनकी आँखों के सामने उनकी छोटी बहन जैसी देवरानी उस पुरुष के साथ सुखी संसार बसाए जिससे वे खुद प्यार करने लगी हैं? नहीं, इससे परिवार पूरी तरह टूट जाएगा।’
‘अगर मैं बड़ी भाभी यानी सिमरन के प्रति अपने आकर्षण को स्वीकार कर लेता हूँ, तो सुलेखा का क्या होगा? वह तो पहले ही धीरज की मौत से टूट चुकी थी। वह तो दोबारा जिंदा ही मेरी वजह से हुई थी। मैं उसका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ?’
‘और अगर मैं इन सब उलझनों से दूर भागकर राखी का हाथ थाम लेता हूँ और अपनी एक नई दुनिया बसा लेता हूँ, तो मैं अपनी दोनों भाभियों को उसी नरक में वापस धकेल दूँगा जहाँ से मैंने उन्हें बाहर निकाला था। वे दोनों फिर से उसी सूनेपन की भट्टी में जलने लगेंगी। क्या मैं इतना स्वार्थी हो सकता हूँ कि अपनी खुशी के लिए अपने दोनों मरे हुए भाइयों की पत्नियों को बेसहारा छोड़ दूँ?’
शशांक का दम घुटने लगा। वह एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुका था जिसके सारे द्वार बंद थे। हर रास्ता किसी न किसी के दिल के टूटने और बर्बादी की तरफ जाता था।
कई दिनों के आत्ममंथन, आंसुओं और प्रार्थनाओं के बाद शशांक के भीतर एक अजीब सी शांति का उदय हुआ। उसने एक ऐसा फैसला लिया जो केवल एक बेहद संवेदनशील और त्यागी पुरुष ही ले सकता था।

Devar Bhabhi Love story: अंतिम फैसला और अटूट कसम
वसंत के दिन ढल चुके थे और दिल्ली की गर्मी अपनी दस्तक दे रही थी। रविवार की शाम, शशांक ने सिमरन और सुलेखा दोनों को चुपके से घर की छत पर बुलाया।
शाम का धुंधलका छा रहा था। सिमरन और सुलेखा एक-दूसरे से नजरें चुराते हुए छत के दो अलग-अलग कोनों में खड़ी थीं। दोनों के चेहरों पर उदासी और आशंका के भाव थे।
शशांक दोनों के बीच में आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी गंगाजल की बोतल निकाली। दोनों भाभियों ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।
“भाभी… सुलेखा…” शशांक की आवाज़ में एक ऐसी गंभीरता और दृढ़ता थी जिसने दोनों को अपनी तरफ देखने पर मजबूर कर दिया। “मैंने पिछले कई दिनों में जो कुछ भी महसूस किया है, उसने मुझे अंदर से पूरी तरह बदल दिया है। मैं आप दोनों के दर्द को समझता हूँ। मैं रमेश भैया के जाने के बाद सिमरन भाभी की उस खामोश तन्हाई को भी महसूस करता हूँ, और धीरज भैया के बाद सुलेखा की उस सूनी जिंदगी को भी।”
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शशांक ने गंगाजल की बोतल खोली और उसकी कुछ बूंदें अपने हाथ पर लीं।
“शशांक, तुम यह क्या कर रहे हो?” सिमरन ने घबराते हुए पूछा।
“भाभी, आज मैं एक ऐसा फैसला लेने जा रहा हूँ जो हम तीनों की जिंदगी को हमेशा के लिए एक नई मर्यादा और सुरक्षा देगा,” शशांक ने शांत स्वर में कहा। “मैं जानता हूँ कि अगर मैं किसी एक का हाथ थामता हूँ, तो दूसरे का दिल हमेशा के लिए टूट जाएगा। और अगर मैं किसी तीसरे (राखी) के पास जाता हूँ, तो मैं अपनी रूह को कभी माफ नहीं कर पाऊँगा। इसलिए, आज मैं इस पवित्र गंगाजल को हाथ में लेकर कसम खाता हूँ…”
सुलेखा की सांसें अटक गईं, “शशांक, नहीं…”
“मैं कसम खाता हूँ कि मैं अपनी पूरी जिंदगी में कभी शादी नहीं करूँगा,” शशांक ने बेहद अडिग आवाज में अपनी कसम पूरी की। “मैं ताउम्र कुंवारा रहूँगा। मेरी यह जिंदगी, मेरा यह अस्तित्व केवल और केवल आप दोनों की खुशी, आपकी सुरक्षा और आपके सम्मान के लिए समर्पित रहेगा। मैं आप दोनों से बराबर का प्यार करूँगा- एक मर्यादा के दायरे में रहकर।
मैं सिमरन भाभी के सूनेपन को भी अपनी दोस्ती और परवाह से भरूँगा, और सुलेखा की जिंदगी के रंगों को भी कभी फीका नहीं पड़ने दूँगा। कंचन विला में कभी कोई अकेला नहीं रहेगा। हम तीनों मिलकर इस घर को संभालेंगे, लेकिन बिना किसी बंधन या समाज के तानों के।”
शशांक की इस कसम ने सिमरन और सुलेखा दोनों के दिलों को झकझोर कर रख दिया। सुलेखा घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। सिमरन की आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उसने आगे बढ़कर शशांक के सिर पर अपना हाथ रख दिया।
“शशांक… तुमने अपनी जवानी की इतनी बड़ी कुर्बानी दे दी…” सिमरन का गला रुंध गया था। “हम दोनों के अकेलेपन की खातिर तुमने खुद को इस बंधन से हमेशा के लिए मुक्त कर लिया।”
“नहीं भाभी, यह कुर्बानी नहीं है। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं आप दोनों के चेहरों पर मुस्कान ला सकूँ,” शशांक ने मुस्कुराते हुए सुलेखा को नीचे से उठाया और दोनों का हाथ अपने हाथों में थाम लिया। “आज से हम तीनों एक नए और अटूट रिश्ते में बंध गए हैं। एक ऐसा रिश्ता जिसे दुनिया शायद कभी समझ न पाए, लेकिन जो हमारे दिलों में सबसे पवित्र और सच्चा रहेगा।”
Devar Bhabhi Love story: राखी की विदाई और एक नया सवेरा
अगले दिन सोमवार था। ऑफिस में हमेशा की तरह चहल-पहल थी। शशांक अपने केबिन में बैठा काम कर रहा था कि तभी राखी अंदर आई। उसके हाथ में दो कॉफी के मग थे।
“तो शशांक, क्या फैसला किया तुमने? मेरे पेरेंट्स इस वीकेंड पर तुमसे मिलने की बात कर रहे हैं,” राखी ने बेहद उम्मीद के साथ पूछा।
शशांक ने गहरी सांस ली। उसने राखी की आँखों में देखा, जहाँ उसके लिए ढेर सारा प्यार और सुनहरे भविष्य के सपने थे। शशांक ने धीरे से अपना सिर हिलाया।
“राखी… तुम बहुत अच्छी लड़की हो। कोई भी पुरुष तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में पाकर खुद को दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान समझेगा,” शशांक ने बेहद शांत और भारी आवाज में कहा। “लेकिन मैं उस लायक नहीं हूँ। मैंने अपनी जिंदगी का एक ऐसा फैसला ले लिया है जिसे मैं कभी बदल नहीं सकता। मैं कभी शादी नहीं करूँगा।”
राखी के हाथ से कॉफी का मग छूटते-छूटते बचा। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं, “क्या? कभी शादी नहीं करोगे? लेकिन क्यों शशांक? कोई वजह तो होगी?”
“वजह बहुत व्यक्तिगत है राखी। बस इतना समझ लो कि मेरे परिवार को मेरी शादी से ज्यादा मेरी मौजूदगी और मेरे समर्पण की ज़रूरत है। मैं तुम्हें एक ऐसी जिंदगी के साथ नहीं बांध सकता जो पहले से ही दो अन्य जिंदगियों की सुरक्षा के लिए समर्पित हो चुकी है। तुम आगे बढ़ो, तुम्हें मुझसे कहीं बेहतर जीवनसाथी मिलेगा।”
राखी ने शशांक के चेहरे पर पसरी उस चट्टान जैसी दृढ़ता को देखा। वह समझ गई कि शशांक के इस फैसले के पीछे कोई ऐसा गहरा सच और मर्यादा है जिसे वह कभी भेद नहीं पाएगी। उसने अपने आंसू पोंछे, कॉफी का मग टेबल पर रखा और बिना कुछ कहे शांत कदमों से केबिन से बाहर निकल गई।
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Devar Bhabhi Love Story: कैसे गिरी मर्यादा की दीवार: मेरठ के देवर-भाभी की अनकही दास्तान
शशांक ने खिड़की के बाहर देखा। दिल्ली की तपती दोपहर में भी आसमान साफ था।
शाम को जब शशांक कंचन विला वापस लौटा, तो घर का माहौल बदला हुआ था। रसोई से सिमरन भाभी की हँसने की आवाज़ आ रही थी और सुलेखा आँगन में लगे पौधों में पानी डालते हुए गुनगुना रही थी। दोनों की नजरें जब शशांक पर पड़ीं, तो उनकी आँखों में वही पुराना सम्मान, गहरा स्नेह और एक अटूट सुरक्षा का अहसास तैर रहा था।
शशांक ने अपनी बाइक स्टैंड पर खड़ी की। उसने महसूस किया कि भले ही उसकी जिंदगी में अब कोई वैवाहिक सुख या पारंपरिक परिवार का सुख नहीं होगा, लेकिन उसने अपनी दोनों भाभियों को जो नया जीवनदान दिया था, वह दुनिया के किसी भी सुख से कहीं बढ़कर था। वह एक ऐसी स्थिति में था जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था, लेकिन उसने उस चक्रव्यूह के भीतर ही अपने त्याग और मर्यादा से एक बेहद खूबसूरत आशियाना बना लिया था। Devar Bhabhi Love Story
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