devar bhabhi ka romance: मुजफ्फरनगर में ढलती हुई सर्दियों की शाम का अपना ही एक मिज़ाज होता है। जब सूरज दूर क्षितिज पर गन्ने के ऊँचे-ऊँचे खेतों के पीछे धीरे-धीरे छिपने लगता है, तो पूरे इलाके में एक सुनहरी, सुरमई चादर सी बिछ जाती है।
खेतों की पगडंडियों से बहती हुई ठंडी और नम हवा में केवल सर्दियों की सिहरन ही नहीं होती, बल्कि पास ही जलते हुए कोल्हू (गुड़ बनाने के क्रेशर) से उड़ती हुई गुड़ की सौंधी, मीठी और गाढ़ी खुशबू पूरे माहौल को एक अजीब से संवेदी अहसास से भर देती थी। devar bhabhi ka romance
राजनगर की पुरानी, विशाल हवेली इसी देहाती परिवेश के बीचों-बीच शान से खड़ी थी। हवेली की लाल ईंटों की दीवारें और बड़ी-बड़ी मेहराबदार खिड़कियाँ इस बात की गवाह थीं कि यहाँ कई पीढ़ियों का इतिहास साँस लेता है। devar bhabhi ka romance
उसी हवेली की दूसरी मंज़िल पर बने एक बड़े से कमरे की खिड़की के पास बैठी थी सुहानी।
छब्बीस साल की सुहानी, मेरठ के एक संभ्रांत और सुसंस्कृत परिवार से आई हुई बेहद खूबसूरत लड़की थी। दो साल पहले उसकी शादी इस बड़े ज़मींदार परिवार के बड़े बेटे के साथ हुई थी। सुहानी का व्यक्तित्व सादगी और आकर्षण का एक अनोखा संगम था—लंबा कद, ढलवां कंधे, कमर तक लहराते घने काले बाल और उसकी आँखों में छिपी एक गहरी, अनाम तड़प। devar bhabhi ka romance
सुहानी केवल घर-गृहस्थी के काम-काज तक सीमित रहने वाली औरत नहीं थी; वह एक बेहद संवेदनशील चित्रकार भी थी। जब उसके हाथ में कैनवास और ब्रश आते, तो उसकी अंतरात्मा की सारी खामोशी, सारी दबी हुई इच्छाएँ रंगों के रूप में कैनवास पर बिखर जाती थीं।
लेकिन सुहानी के जीवन में एक गहरा सूनापन था। उसका पति एक बड़ा कारोबारी था, जो साल के ज्यादातर महीने शहर से बाहर या व्यापारिक दौरों पर ही बिताता था। सुहानी के लिए वह हवेली जितनी बड़ी थी, उतनी ही अकेली भी थी।
और उसी हवेली में रहता था उसका बाइस साल का देवर—राघव।
राघव, जो स्थानीय डिग्री कॉलेज से कृषि-व्यवसाय की पढ़ाई कर रहा था, ठेठ मुजफ्फरनगर के रुआब और आधुनिक सोच का एक बेहद अनूठा मेल था। छह फीट लंबा कद, कसरती और गठीला बदन, सांवली रंगत, गहरी और पैनी आँखें, और चेहरे पर एक हल्की सी बेपरवाह मुस्कान। राघव हवेली का सबसे लाडला और चहेता लड़का था।
वह खेत-खलिहान के काम भी देखता था और घर की ज़िम्मेदारियाँ भी उठाता था। लेकिन सुहानी के लिए राघव केवल एक देवर नहीं था; वह इस विशाल हवेली में अकेला ऐसा इंसान था, जो सुहानी की खामोशियों को पढ़ लेता था, जो उसकी आँखों में तैरते हुए अकेलेपन को समझता था।

devar bhabhi ka romance: कैनवास पर उकेरा गया अहसास
दिसंबर का महीना अपने शबाब पर था। कड़ाके की ठंड पड़ने लगी थी। घर के सभी बड़े लोग किसी पारिवारिक रिश्तेदारी के सिलसिले में दो दिनों के लिए बाहर गए हुए थे। विशाल हवेली में सुहानी और राघव के अलावा केवल कुछ पुराने नौकर-चाकर ही थे, जो हवेली के बाहरी हिस्से में बने कमरों में रहते थे।
शाम के लगभग चार बज रहे थे। हवेली की छत के एक कोने में बना छोटा सा कमरा सुहानी का आर्ट स्टूडियो था। इस कमरे में चारों तरफ पेंटिंग्स, रंगों की बोतलें और कैनवास रखे रहते थे। खिड़की से आती हुई धूप की आखिरी पीली किरणें कमरे के फर्श पर सुनहरे धब्बे बना रही थीं।
सुहानी एक बड़े से कैनवास के सामने खड़ी थी। उसने हल्के बैंगनी रंग की एक ढीली सी सूती साड़ी पहन रखी थी। उसके बाल एक ढीले से जुड़े में बंधे हुए थे, और उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर पसीने की बारीक, पारदर्शी बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। वह मुजफ्फरनगर के देहाती सूर्यास्त का चित्र बना रही थी—जिसमें गन्ने के खेत थे, धुंआ था और एक जलती हुई भट्टी थी।
तभी कमरे के दरवाजे पर पैरों की हल्की आहट हुई। सुहानी ने मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि वह उस चलने की ताल को बखूबी पहचानती थी। devar bhabhi ka romance
राघव दरवाजे के फ्रेम से टेक लगाकर खड़ा था। उसके हाथ में मिट्टी के एक छोटे से कुल्हड़ में कोल्हू से लाया गया बिल्कुल ताज़ा, गरम गुड़ का एक छोटा सा टुकड़ा था।
“भाभी…” राघव की भारी, गहरी और ठेठ देहाती मिठास से भरी आवाज़ कमरे की शांति में गूँज उठी।
सुहानी ने धीरे से अपनी गर्दन घुमाई और उसकी तरफ देखकर एक हल्की सी मुस्कान बिखेरी, “तुम कब आए राघव? मुझे तो पता ही नहीं चला।”
“बस अभी आ रहा हूँ…” राघव धीरे-धीरे कमरे के अंदर बढ़ा। उसके चलने में मुजफ्फरनगर की माटी की वही स्वाभाविक अकड़ और शालीनता थी। “नीचे हवेली के पीछे वाले कोल्हू पर आज मौसम की पहली कड़ाही उतरी है। चाची जी तो हैं नहीं, तो मैंने सोचा सबसे पहले आपको ही चखाऊँ। बिल्कुल ताज़ा और गरम है।”
सुहानी ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया, “अरे वाह! लाओ मुझे दो।”
लेकिन जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया, उसने देखा कि उसकी उंगलियों और हथेली पर लाल और पीले तैलचित्र के गहरे रंग लगे हुए थे। “ओह हो! मेरे हाथ तो रंगों से भरे हैं। अगर मैंने छुआ तो गुड़ पर पेंट लग जाएगा।”
राघव सुहानी के बिल्कुल करीब आकर रुक गया। उसके शरीर से गन्ने के रस की ताज़ा खुशबू और हल्की सी मर्दाना महक आ रही थी।
“तो क्या हुआ?” राघव ने अपनी गहरी आँखों से सुहानी की आँखों में सीधे झांका, “मैं खिला देता हूँ।”
सुहानी के दिल की धड़कन ने अचानक एक बीट मिस कर दी। उसकी आँखों में एक हल्की सी झिझक उभरी, लेकिन वह मना नहीं कर सकी। “ठीक है…”
राघव ने अपने दाहिने हाथ से गुड़ का वह छोटा, गरम टुकड़ा उठाया। उसने बहुत संभालकर उस टुकड़े को सुहानी के कसीदे जैसे नाजुक, गुलाबी होंठों के पास ले जाकर रखा।
सुहानी ने अपने होंठ थोड़े से खोले और गुड़ के टुकड़े को अपने मुंह में ले लिया। लेकिन उसी पल, राघव की उंगली की गर्म पोर सुहानी के निचले होंठ की बेहद संवेदनशील त्वचा से टकरा गई।
समय जैसे वहीं जम गया।
एक तीखी, बिजली की लहर दोनों के शरीरों में एक साथ दौड़ गई। सुहानी की सांसें एक पल के लिए थम गईं। गुड़ की वह सौंधी मिठास उसकी जीभ पर पिघल रही थी, लेकिन उससे कहीं ज्यादा मीठी और जानलेवा तपन उसे राघव की उंगली की छुअन से महसूस हो रही थी। सुहानी की बंद पलकें कांपने लगीं, और उसके रोंगटे एक-एक करके खड़े हो गए। devar bhabhi ka romance
राघव ने अपनी उंगली तुरंत वापस नहीं हटाई। वह कुछ सेकंड तक सुहानी के होंठों की नमी को अपनी उंगली पर महसूस करता रहा। उसकी आँखों की पुतलियाँ फ़ैल गई थीं।
“गुड़ कैसा है भाभी? मीठा है न?” राघव ने बेहद धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज़ में पूछा। उसकी निगाहें सुहानी के थरथराते हुए होंठों पर ही टिकी हुई थीं।
“बहुत… बहुत ज्यादा मीठा है राघव,” सुहानी की आवाज़ गले में ही कहीं अटक कर रह गई। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगी थी।

devar bhabhi ka romance: रंगों की भूल और उंगलियों का इक़रार
कमरे के अंदर की हवा अचानक भारी और गर्माहट से भर चुकी थी। सुहानी अपनी घबराहट और अपने अंदर उठते हुए उस अनजाने तूफान को छिपाने के लिए तेज़ी से पीछे मुड़ी। उसने ईज़ल पर रखे अपने ब्रश को उठाने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि ब्रश उसके हाथ से फिसल गया।
गिला ब्रश नीचे गिरने से पहले राघव के सफेद सूती कुर्ते के सीने वाले हिस्से से टकराया और लाल रंग का एक बड़ा, गहरा धब्बा उसके कुर्ते पर छोड़ गया।
“ओह माय गॉड! सॉरी… सॉरी राघव!” सुहानी हड़बड़ा गई। “यह क्या हो गया! तुम्हारा कुर्ता खराब हो गया!”
सुहानी ने बिना कुछ सोचे-समझे, अपनी साड़ी का पल्लू उठाया और अपनी दोनों हथेलियों से राघव के सीने पर लगे उस लाल रंग को पोछने लगी। उसकी उंगलियाँ राघव के चौड़े, सख्त और कसरती सीने पर कुर्ते के ऊपर से घिस रही थीं। सुहानी की साँसें राघव के चेहरे से टकरा रही थीं, और उसकी देह का हर हिस्सा राघव के इतने करीब होने के अहसास से कांप रहा था।
अचानक राघव ने सुहानी की दोनों कलाइयों को अपनी मजबूत, गर्म हथेलियों में थाम लिया।
सुहानी का हाथ राघव के सीने पर ही रुक गया।
“राघव… छोड़ो, मुझे साफ करने दो,” सुहानी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में रोकने की ताकत नहीं थी।
“रंग कुर्ते पर नहीं लगा है सुहानी…” राघव ने पहली बार उसके नाम के आगे से ‘भाभी’ शब्द हटा दिया था। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और अधिकार था। “यह रंग तो बहुत अंदर तक उतर गया है।”
सुहानी ने घबराकर अपनी आँखें उठाईं। राघव की आँखों में कोई चंचलता नहीं थी; वहाँ केवल एक बेपनाह तड़प, एक गहरा आकर्षण और महीनों से दबा हुआ जुनून था।
“तुम… तुम यह क्या कह रहे हो राघव?” सुहानी ने अपनी कलाइयों को छुड़ाने का एक नाममात्र प्रयास किया।
“मैं वही कह रहा हूँ जो आप पिछले छह महीनों से इस कैनवास के रंगों के पीछे छिपाने की कोशिश कर रही हैं,” राघव ने सुहानी की कलाइयों को थोड़ा और कस लिया और उसे अपनी तरफ एक इंच और खींच लिया। “क्या आपको लगता है कि मुझे आपकी तन्हाई नज़र नहीं आती? क्या आपको लगता है कि जब आप खिड़की पर बैठकर रोती हैं, तो मुझे अहसास नहीं होता?”

सुहानी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरक कर नीचे गिर गया।
राघव की एक हथेली सुहानी की कलाई को छोड़कर धीरे से उसकी नंगी कमर के घेरे पर आकर टिक गई। सूती साड़ी और पतले पेटीकोट के ऊपर से राघव की गर्म, सख्त हथेली की छुअन सुहानी की रीढ़ की हड्डी में एक गरम सिहरन बनकर दौड़ गई। सुहानी की आँखें खुद-ब-खुद बंद होने लगीं और उसके मुंह से एक हल्की सी आह निकल गई।
“राघव… यह गलत है… हम…” सुहानी के शब्द राघव की उंगली के दबाव में खो गए।
राघव ने अपनी उंगली सुहानी के होंठों पर रख दी, “गलत क्या है सुहानी? इस सूनी हवेली में अपनी रूह को मारना गलत है, या उस अहसास को महसूस करना जो हमें ज़िंदा बनाता है?”
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devar bhabhi ka romance: कोहरे की चादर और कोल्हू की तपन
रात के आठ बज चुके थे। बाहर पूरे मुजफ्फरनगर को घने, कँपकँपा देने वाले कोहरे ने अपनी आगोश में ले लिया था। विजिबिलिटी इतनी कम थी कि कुछ ही दूरी पर रखी चीज़ें भी धुंधली लग रही थीं। तापमान तेज़ी से गिर रहा था, लेकिन हवेली के ठीक पीछे बने विशाल कोल्हू पर एक अलग ही दुनिया आबाद थी।
वहाँ मिट्टी की बड़ी सी भट्टी (हाड़ा) में सूखी खोई (गन्ने का अवशिष्ट) जल रही थी। लाल और पीली आग की विशाल लपटें अंधेरे और कोहरे को चीरती हुई ऊपर उठ रही थीं। बड़े-बड़े कड़ाहों में गन्ने का रस उबल रहा था, और उससे उठता हुआ गाढ़ा भाप का गुबार चारों तरफ फैल रहा था।
सुहानी अपने कमरे में अकेली नहीं रह सकी। उसके शरीर में जो आग राघव ने शाम को सुलगाई थी, वह ठंडी होने का नाम नहीं ले रही थी। वह एक भारी, ऊनी शॉल को अपने चारों तरफ लपेटकर दबे पाँव हवेली के पिछले दरवाजे से निकलकर कोल्हू की तरफ बढ़ गई। devar bhabhi ka romance
कोल्हू पर इस वक्त कोई नौकर नहीं था। राघव ने उन सबको रात के खाने के लिए भेज दिया था।
राघव अकेला वहाँ खड़ा था। उसने ठंड के बावजूद अपना कुर्ता उतारकर एक तरफ लकड़ी के तख्त पर रख दिया था। भट्टी की तेज़ आग की रोशनी उसके बदन पर पड़ रही थी। उसके सीने और मजबूत बाजुओं पर पसीने की बारीक बूंदें आग की रोशनी में सोने की तरह चमक रही थीं। वह एक लंबे काठ के चाटू (बड़े चमचे) से उबलते हुए रस को चला रहा था।
सुहानी कोहरे को चीरती हुई जैसे ही भट्टी के घेरे में आई, राघव ने चाटू को रोक दिया।
“आप यहाँ इस कड़ाके की ठंड में क्या कर रही हैं?” राघव ने मुड़कर देखा। उसकी आवाज़ में चिंता भी थी और वही पुराना सम्मोहन भी।
“मुझे… मुझे अपने कमरे में बहुत ठंड लग रही थी,” सुहानी ने झूठ बोला, लेकिन उसकी कांपती हुई आवाज़ उसका सच बयां कर रही थी।
“तो फिर यहाँ आइए,” राघव ने भट्टी के पास रखी लकड़ी की एक बड़ी सी चौकी की तरफ इशारा किया। “यहाँ आग की पूरी तपन है।”
सुहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ी और भट्टी के बिल्कुल करीब आकर खड़ी हो गई। भट्टी की आग की गर्मी उसके चेहरे और उसके वजूद को छूने लगी। लेकिन उससे कहीं ज्यादा गर्मी उस इंसान से निकल रही थी जो उसके ठीक पीछे आकर खड़ा हो गया था।
राघव सुहानी के इतने करीब आ गया कि सुहानी को राघव की तपन साफ़ महसूस हो रही थी। राघव की साँसों की गर्माहट सुहानी की गर्दन के बालों को हिला रही थी।
“अभी भी ठंड लग रही है?” राघव ने सुहानी के कान के पास झुककर फुसफुसाया।
सुहानी ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपनी आँखें मूँद लीं। devar bhabhi ka romance
राघव ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए। उसने सुहानी के शॉल के दोनों किनारों को अपने हाथों में लिया और बहुत ही आहिस्ता से, सुहानी के कंधों से उस शॉल को नीचे गिरा दिया। शॉल सरककर नीचे ठंडे फर्श पर गिर गया।
राघव ने अपनी ठुड्डी सुहानी के मुलायम कंधे पर टिका दी। उसके होंठ सुहानी की गर्दन की संवेदनशील त्वचा को छूने लगे।
“राघव… अगर किसी ने देख लिया तो…” सुहानी का शरीर थर-थर कांप रहा था, लेकिन यह कांपना ठंड से नहीं, बल्कि प्रेम की उस बेकाबू लहर से था जो उसके रोम-रोम में बह रही थी।
“इस घने कोहरे में हमारे और इस जलती हुई आग के अलावा कोई तीसरा नहीं है सुहानी…” राघव ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर सुहानी को अपनी गिरफ्त में ले लिया और उसे अपनी तरफ कस लिया।

devar bhabhi ka romance: देह, तपन और देहाती संगम
राघव के होंठ सुहानी की गर्दन से फिसलते हुए उसके कान की लौ तक पहुँचे, और फिर उसने सुहानी के कंधे की ढलान पर एक गहरा, नम चुंबन अंकित कर दिया।
सुहानी के मुंह से एक तीखी आह निकल गई। उसने अपने दोनों हाथ पीछे ले जाकर राघव के घुंघराले बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं और उसके सिर को अपनी गर्दन पर और कस लिया। महीनों का बिखराव, सालों का अकेलापन और दो दिलों की दबी हुई इच्छाएँ इस एक पल में पिघलकर बहने लगी थीं।
राघव ने सुहानी को अपनी बाहों में घुमाया। अब दोनों एक-दूसरे के सामने थे। भट्टी की आग की रोशनी उन दोनों के चेहरों पर नाच रही थी।
“तुम बहुत खूबसूरत हो सुहानी… इतनी खूबसूरत कि तुम्हें देखकर होश में रहना मुमकिन नहीं है,” राघव ने कहा।
“और तुम… तुम बहुत सरफिरे हो राघव,” सुहानी ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से राघव के सख्त गालों और उसकी दाढ़ी को छुआ। “तुमने मुझे पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।”
“यह बर्बादी नहीं है सुहानी… यह तो शुरुआत है,” राघव ने कहते ही अपने होंठ सुहानी कांपते हुए होंठों पर रख दिए।
वह चुंबन कोई साधारण चुंबन नहीं था। उसमें मुजफ्फरनगर के गन्ने के रस जैसी मिठास थी, भट्टी की आग जैसी तपन थी। सुहानी ने भी अपनी झिझक के सारे बंधन तोड़ दिए।
दोनों के मुंह में गुड़ और प्यार की मिली-जुली, मीठी खुशबू घुलने लगी।
राघव ने अपनी मजबूत बाहों में सुहानी को उठाया और उसे पास ही रखी लकड़ी की बड़ी सी चौकी पर बैठा दिया।
सुहानी की देह राघव की हर छुअन पर किसी वीणा के तार की तरह झंकृत हो उठती थी। हवेली, समाज, रिश्ते—सब कुछ उस जलती हुई भट्टी के धुएं में उड़कर गायब हो चुका था। वहाँ केवल दो जिस्म थे, एक आग थी, और गन्ने के खेतों से आती हुई बेकाबू मिठास थी।

devar bhabhi ka romance: सुबह की पहली किरण और अमर मिठास
सुबह के लगभग पाँच बज रहे थे। बाहर कोहरा इतना घना था कि जैसे पूरी दुनिया पर किसी ने सफेद रुई की परत बिछा दी हो। चिड़ियों की हल्की-हल्की चहचहाहट शुरू हो चुकी थी।
सुहानी अपने कमरे में अपने विशाल बिस्तर पर लेटी हुई थी। उसने अपने पूरे शरीर पर एक गर्म कंबल ओढ़ रखा था। उसकी देह के हर हिस्से में एक मीठा, थका देने वाला लेकिन बेहद सुकून देने वाला दर्द था।
उसकी त्वचा से अब भी भट्टी के धुएं, ताज़े गुड़ और राघव के पसीने की मिली-जुली, मादक खुशबू आ रही थी। उसकी आँखें अधखुली थीं और उसके होंठों पर एक ऐसी तृप्ति भरी मुस्कान थी जो उसने पिछले दो सालों में कभी महसूस नहीं की थी।
तभी कमरे का भारी लकड़ी का दरवाजा बिना किसी आवाज के धीरे से खुला।
राघव अंदर आया। उसने अपना सफेद कुर्ता पहन रखा था, लेकिन उसकी आँखें बता रही थीं कि वह रात भर सोया नहीं था। उसकी आँखों में रात वाले जुनून की जगह अब एक बेपनाह इज़्ज़त और प्यार का समंदर था।
राघव दबे पाँव सुहानी के बिस्तर के पास आया। वह घुटनों के बल बैठ गया और उसने बहुत ही कोमलता से सुहानी के माथे पर बिखरी हुई लटों को हटाया और अपने होंठ उसके माथे पर रख दिए।
सुहानी ने अपनी आँखें पूरी तरह खोलीं और राघव के चेहरे को देखा।
“सुहानी…” राघव ने बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा, “मेरी कृषि-अनुसंधान की पढ़ाई पूरी हो चुकी है। आज दोपहर बारह बजे की ट्रेन से मुझे पंजाब एग्रो-रिसर्च सेंटर के लिए दो साल के लिए निकलना है।”
सुहानी के दिल में एक हल्की सी टीस उठी, लेकिन उसकी आँखों में कोई शिकायत या आंसुओं का सैलाब नहीं था। वह जानती थी कि यह रात कोई अनैतिक बंधन नहीं, बल्कि दो रूहों का एक खूबसूरत पड़ाव थी।
सुहानी ने अपना हाथ कंबल से बाहर निकाला और राघव के गाल पर रखा। उसकी उंगलियाँ राघव की दाढ़ी को सहलाने लगीं। devar bhabhi ka romance
“मुझे पता है राघव…” सुहानी ने बेहद आत्मीयता से मुस्कुराते हुए कहा। “तुम जाओ। अपनी मंज़िल को पाओ। जो मिठास, जो अहसास तुमने मुझे इस एक रात में दिया है… वह मेरे पूरे जीवन के अकेलेपन को मिटाने के लिए काफ़ी है।”
राघव ने सुहानी की हथेली को चूमा। फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी सी पीतल की डिब्बी निकाली और उसे सुहानी के तकिए के पास रख दिया।
“इसमें क्या है?” सुहानी ने पूछा।
“इसमें कल रात की बनी पहली कड़ाही का ताज़ा गुड़ है… और गन्ने का एक सूखा हुआ फूल,” राघव ने मुस्कुराकर कहा। “ताकि जब भी तुम इसे देखो, तुम्हें याद रहे कि मुजफ्फरनगर की माटी में सिर्फ़ मिर्च ही नहीं, दुनिया की सबसे गहरी मिठास भी होती है।”

राघव उठा, उसने एक आखिरी बार सुहानी की आँखों में देखा और कमरे से बाहर निकल गया।
दोपहर के एक बजे जब पंजाब जाने वाली ट्रेन कोहरे को चीरती हुई मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन से आगे बढ़ रही थी, सुहानी अपने आर्ट स्टूडियो में खड़ी थी।
उसके सामने ईज़ल पर एक बिल्कुल नया कैनवास लगा हुआ था। सुहानी के हाथ में ब्रश था और वह बड़ी ही तन्मयता से एक नई पेंटिंग बना रही थी।
उस पेंटिंग में दूर तक फैले गन्ने के खेत थे, रात का घना कोहरा था, भट्टी की जलती हुई लाल आग थी… और उस आग की रोशनी में एक-दूसरे में सिमटे हुए दो प्रेमियों के धुंधले, खूबसूरत साये थे।
सुहानी ने अपनी पेंटिंग पूरी की और उसके नीचे लाल रंग के गाढ़े पेंट से अपना नाम नहीं, बल्कि एक शीर्षक लिखा—
devar bhabhi ka romance “मुजफ्फरनगर की पहली मिठास“
राघव हवेली से दूर जा चुका था, लेकिन उसकी छुअन का अहसास, उसकी साँसों की तपन और गुड़ की वह सौंधी, संवेदी मिठास सुहानी के वजूद में और मुजफ्फरनगर की हवाओं में हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो चुकी थी। devar bhabhi ka romance
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