devar bhabhi romance दिसंबर का महीना आधा बीत चुका था। पंजाब के मालवा इलाके में कड़ाके की ठंड अपनी दस्तक दे चुकी थी। चारों तरफ धुंध की हल्की चादर लिपटी रहती और सूरज की किरणें दोपहर के बाद ही ज़मीन पर अपनी गर्माहट छोड़ पाती थीं। devar bhabhi romance
गाँव की सीमा पर बना संधू परिवार का बड़ा सा फार्महाउस और हवेली अपने आप में एक मिसाल थी। हवेली के ऊंचे दरवाज़े, आंगन में बंधी अच्छी नस्ल की गाय-भैंसें और ट्रैक्टर की आवाज़ इस घर की खुशहाली बयां करती थी। शाम के चार बज रहे थे। आंगन में सुलगती हुई धूनी (लकड़ियों की आग) से उठता धुएं का गुबार और रसोई से आती सरसों के साग की भीनी-भीनी खुशबू हवा में घुल रही थी। devar bhabhi romance
34 साल की सिमरन रसोई में मधानी से छाछ बिलो रही थी। सिमरन—गठीला बदन, गोरा-गुलाबी रंग, तीखे नैन-नक्श और आँखों में एक ऐसी परिपक्वता जो हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेती। devar bhabhi romance
लाल रंग के पटियाला सूट में उसका सुडौल और भरा हुआ शरीर हरियाली और ठंड के इस मौसम में एक अलग ही निखार बिखेर रहा था। सिमरन के पति कुलदीप खेती और व्यापार के सिलसिले में अक्सर जालंधर या लुधियाना के चक्कर काटते रहते थे, जिससे सिमरन के जीवन में एक अजीब सी खामोशी और एकाकीपन आ गया था। devar bhabhi romance
तभी आंगन में बुलेट मोटरसाइकिल के हॉर्न की आवाज़ गूंजी।
“भाभी! ओ भाभी! चाय बणी कि नहीं? बाहिर तो पाला जम रहा है!”
यह परम था—सिमरन का 24 साल का छोटा देवर। परम अभी दो महीने पहले ही कनाडा (Canada) से अपनी बी.एससी की पढ़ाई पूरी करके गाँव लौटा था। लंबा-चौड़ा गबरू जवान, तीखी दाढ़ी, कंधे पर पर्चा डाला हुआ और आँखों में शहर तथा परदेस से आई एक बेबाक शरारत।
परम जब से वापस आया था, हवेली का माहौल थोड़ा रंगीन हो गया था। उसकी नज़रें अपनी खूबसूरत भाभी पर अक्सर टिक जाया करती थीं, और सिमरन भी उसकी इस बेबाक चाहत से अनजान नहीं थी। devar bhabhi romance
सिमरन ने परांठे पर मक्खन रखते हुए मुड़कर देखा और लजाते हुए अपनी कड़क आवाज़ में बोली, “अरे परम! आते ही रौला पाना शुरू कर देता है! थोड़ा सब्र रख्या कर। चाय बन गई है, आके कप संभाल अपना।”
परम रसोई की दहलीज पर आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी जैकेट उतारी और सीधे सिमरन की आँखों में देखते हुए मुस्कुराया, “की गल भाभी, आज तो बड़ी सोहणी लग रही है। लगदा है आज शाम नूँ कोई खास तैयारी है?”
सिमरन का दिल हल्का सा धड़का। उसने दुपट्टा थोड़ा और सँभाला और झूठी घूरती आँखों से कहा, “चाल वे! ज्यादा बातें ना बनाया कर। शहर से पढ़ के आया है पर तेरी जुबान वही देसी की देसी रही। बापू जी और बीजी (सास-ससुर) खेत वाले घर गए हैं, उनके लिए भी नाश्ता भेजना है। तू बातें बनाने की बजाय हाथ बटा मेरा।” devar bhabhi romance
परम ने चाय का कप पकड़ा और एक घूंट भरकर सिमरन के और करीब आ गया, “भाभी, तेरे हाथ दी चाय पी के तो बंदा कनाडा का मौसम भी भूल जाए। पर इक बात दस्स, बापू जी और बीजी तो गाँव की पंचायत वाली बैठक में गए हैं, वो तो रात नूँ ही लौटेंगे।”
यह सुनते ही सिमरन ने अपनी पलकें झुका लीं। हवेली में इस वक्त दोनों के अलावा कोई नहीं था, और यह एहसास ही हवा में एक मादक गर्माहट घोलने के लिए काफी था।

devar bhabhi romance: सरसों के खेत की ओर कदम
शाम के साढ़े चार बज चुके थे। सूरज अब धीरे-धीरे ढलान पर था। आसमान में नारंगी, गुलाबी और सुरमई रंगों का अनोखा संगम दिख रहा था।
ससुर जी का संदेश आया था कि हवेली के पीछे फैले 10 एकड़ के सरसों के खेत के किनारे बनी तुड़ी वाली गुहार (कच्ची कोठरी) में नए बने गुड़ के मटके और साग की टोकरियाँ रखी हैं, जिन्हें सँभालना ज़रूरी था।
“परम, चल उठ,” सिमरन ने अपने सिर पर लाल दुपट्टा ओढ़ते हुए कहा, “पीछे सरसों वाले खेत चलना है। बापू जी का फोन आया था, वहाँ गुड़ के मटके ढकने हैं ताकि ओस से खराब ना हों।”
“हाँ भाभी, चल फिर। तेरे नाल तो मैं पाताल भी चल पवांगा,” परम ने शरारती अंदाज़ में कहा और कंधे पर मोटा खेस (चद्दर) डाल लिया।
दोनों हवेली के पिछले दरवाज़े से निकलकर सीधे खेतों की पगडंडी (मेढ़) पर आ गए।
दिसंबर की इस ढलती शाम में सरसों का खेत किसी सुनहरे समंदर की तरह लग रहा था। 5-6 फीट ऊंचे सरसों के पौधे, जिन पर खिले पीले-पीले फूल शाम की धीमी हवा में हौले-हौले झूम रहे थे।
पीले फूलों की तीखी और सोंधी खुशबू पूरे माहौल पर छाई हुई थी। सरसों के पौधों की ऊँचाई इतनी थी कि पगडंडी पर चलते ही इंसान पूरी तरह से फूलों के बीच छुप जाता था। devar bhabhi romance
सिमरन आगे-आगे चल रही थी। उसके पैरों में पड़ी पंजाबी जूती की हल्की आवाज़ और उसके भरे हुए शरीर की लचक परम का ध्यान पूरी तरह अपनी ओर खींच रही थी। हवा के झोंके से सिमरन का लाल दुपट्टा बार-बार सरक जाता और उसकी गोरी, सुराहीदार गर्दन शाम की सुनहरी धूप में चमक उठती।
परम पीछे-पीछे चलते हुए उसकी चाल की लचक और उसके सुडौल रूप को एकटक निहार रहा था।
“की बात है परम? तू इतना चुप-चुप क्यूं चल रहा है?” सिमरन ने बिना मुड़े ही हरियाली के बीच से कहा।
“कुछ नहीं भाभी,” परम ने अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और गहरा बनाते हुए कहा, “बस ऐ सोच रहा था कि इस सरसों के खेत में इतने सोहणे फूल खिले हैं… पर तेरे चेहरे के आगे सब फीके लग रहे हैं।”
सिमरन के कदम एक पल के लिए रुके। उसने मुड़कर देखा। परम उसके बहुत करीब खड़ा था।
“तू ना… सुधरेगा नहीं,” सिमरन ने शर्माते हुए कहा, उसकी आँखों में पंजाबी औरत की वो ख़ास चमक थी जो लज्जा और आमंत्रण का मिला-जुला रूप होती है। “देवर है तू मेरा, छोटी उम्र का। ऐह जिही बातें शोभा नहीं देतीं तैनूँ।”
“उम्र का की करना भाभी?” परम ने एक कदम और आगे बढ़ाकर कहा, “दिल तो उम्र नहीं देखता। और फिर… तू मेरी भाभी बाद में है, पहले इतनी सोहणी पंजाबन है जिसे देखकर किसी का भी ईमान डोल जाए।”

devar bhabhi romance: सरसों की आगोश और पहला स्पर्श
खेत के बीचों-बीच पहुँचते ही चारों तरफ सन्नाटा छा गया। केवल हवा की सरसराहट और परिंदों की चहचहाहट थी। सरसों की ऊँची झाड़ियों ने उन्हें दुनिया की नज़रों से पूरी तरह से छुपा लिया था।
काम समेटते हुए सिमरन गुड़ के एक बड़े मटके पर टाट का बोरा ढकने के लिए नीचे झुकी। झुकते ही उसके सूट का खिंचाव और उसकी कमर का घुमावदार मोड़ इतना कामुक लग रहा था कि परम खुद पर काबू न रख सका।
अचानक सिमरन का पैर मिट्टी के एक ढेले पर पड़ा और वह थोड़ा लड़खड़ाई।
“अरे!”
इससे पहले कि वह गिरती, परम ने झट से आगे बढ़कर अपनी मजबूत बाहों में उसे थाम लिया। सिमरन सीधे परम के चौड़े और गरम सीने से जा टकराई।
समय जैसे थम गया।
पीले सरसों के फूलों के बीच, ढलती शाम की ठंडक और दोनों के शरीरों की बढ़ती गर्माहट के बीच महज़ चंद इंच का फासला रह गया था। परम का एक हाथ सिमरन की पतली कमर पर था और दूसरा हाथ उसकी पीठ को सँभाले हुए था। सिमरन की दोनों हथेलियाँ स्वतः ही परम के मजबूत कंधों पर टिक गई थीं।
“छाड… छाड दे वे परम…” सिमरन की साँसें तेज़ हो चुकी थीं। उसकी आवाज़ में वो सख्ती बिल्कुल नहीं थी जो किसी को दूर करने के लिए चाहिए होती है। उसमें तो सालों से दबी प्यास और एक मीठा समर्पण छलक रहा था।
“ना भाभी, आज नहीं छाडना,” परम ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए बहुत धीमे से कहा। उसकी गर्म साँसें सिमरन के गालों को छू रही थीं। “आज तो इस सरसों के खेत नूँ भी पता लगना चाहिए कि मेरा दिल तेरे लिए कितना तड़पता है।”
“परम… कोई आ जावेगा… देख, शाम हो गई है,” सिमरन ने नाममात्र का विरोध करते हुए अपनी आँखें झुका लीं। उसके गोरे गाल लज्जा की सुर्खी से लाल हो चुके थे।
“अड़े कोई नहीं आता भाभी,” परम ने धीरे से अपना चेहरा नीचे झुकाया और अपने होठों को सिमरन के कान के पास ले गया। “इस खेत में बस तू है, मैं हूँ… और ऐ सरसों दी खुशबू है।”

devar bhabhi romance: और जब बेकाबू होने लगे दो दिल
परम की मजबूत उंगलियाँ सिमरन की पतली कमर पर कसने लगीं। कपड़े के पार से भी उसका सुलगता हुआ स्पर्श सिमरन के रोम-रोम में बिजली की तरह दौड़ गया। सिमरन के गुलाबी होंठ हल्के से खुले, और उसके मुँह से एक मदहोश कर देने वाली, दबी हुई सी आह निकल पड़ी।
“हाए वे परम… तू सचमुच घणा उतावला हो रहा है… दिल है कि काबू में ही नहीं आता,” सिमरन ने अपनी पलकों को आधा मूँदते हुए, कांपती हुई आवाज़ में कहा।
परम ने बिना एक पल गंवाए अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और सिमरन के चेहरे पर बिखर आई रेशमी लटों को उसके कान के पीछे सँवारा। उसकी गर्म उंगलियाँ सिमरन की गोरी, सुराहीदार गर्दन और मखमली ठुड्डी पर फिसलने लगीं। सिमरन ने अपनी गर्दन को हल्के से पीछे की ओर झुका दिया, जिससे परम को उसकी महकती हुई त्वचा पर अपनी चाहत जताने का पूरा मौका मिल गया। devar bhabhi romance
“भाभी… तू इतनी कातिल और सोहणी क्यूँ है कि इंसान अपना सब कुछ हार बैठे?” परम की आवाज़ में एक गहरा, बहका देने वाला नशा था। उसने अपने होंठ सीधे सिमरन की गरमाई हुई गर्दन की नाजुक त्वचा पर रख दिए।
“अहह… परम… धीमे…” सिमरन के बदन में सिहरन की एक तेज लहर दौड़ गई। उसने अपनी दोनों बाहें तड़प कर परम की मजबूत गर्दन के चारों ओर कस लीं और अपने बदन को उसके चौड़े सीने से पूरी तरह सटा लिया।
परम पूरी तरह समझ गया कि अब भाभी को किस चीज की जरुरत है। उसने एक एक करके सिमरन के बदन पर अपने प्यार की निशानियां छोड़नी शुरू कर दी। जब वह सिमरन के नजदीक आया आलिंगन करने लगा तो सिमरन के मुंह से मदहोश कर देने वाली आवाज निकलने लगी।
उसकी साँसों की गर्म आँच ने माहौल को और मादक बना दिया। दोनों के जिस्म एक ऐसी लय में बंधे थे, जहाँ हर हरकत के साथ चाहत की दीवारें दरक रही थीं।

सरसों के ऊंचे-ऊंचे और घने पौधे अब उनके चारों तरफ एक गुप्त और सुरक्षित दुनिया बना चुके थे। पीले फूलों की महक और ठंडी हवा के बीच उनके जिस्मों की तपिश हवा को और गर्म कर रही थी।
परम ने सिमरन को अपनी बाहों में थोड़ा और भींच लिया, जिससे दोनों के बीच का जरा सा भी फासला पूरी तरह मिट गया। परम की हथेलियाँ अब सिमरन की कमर के गोलाई से होती हुई उसकी सुडौल पीठ पर मचलने लगीं।
34 साल की सिमरन का भरा-पूरा, परिपक्व और जवां शरीर परम के कसरती और मस्कुलर बदन के आगे पूरी तरह पिघल चुका था। उसकी तेज़ होती साँसें और धड़कता हुआ दिल परम के सीने पर साफ महसूस हो रहा था।
“दस्स भाभी… सच बता, इस दिल की आग में सिर्फ मैं जल रहा हूँ, या तेरे दिल में भी वही तूफान उठ रहा है जो मेरे अंदर है?” परम ने उसके चहरे को अपने दोनों हाथों के प्याले में भरते हुए, आँखों में आँखें डालकर पूछा। उसकी नज़रें सिमरन के हर एक नक़्श पर प्यासे शिकारी की तरह टिक गईं।
सिमरन ने अपनी आँखें धीरे से खोलीं। उसकी उन आँखों में एक अजीब सी मादक चमक और समर्पण था। उसने परम के होंठों के बेहद करीब आकर, अपनी मदहोश करने वाली आवाज़ में फुसफुसाया, “तैनूँ की लगता है वे? क्या मैं अंधी हूँ? तेरी इन भूखी नज़रों का ताव मैं पहले दिन से समझती थी… पर तू इतना बेकाबू और निडर निकलेगा, ऐ कभी नहीं सोचा था…”
“तेरे इस इश्क़ ने ही मुझे सब कुछ भुलाने पर मजबूर कर दिया है भाभी!” परम ने दीवानगी में डूबकर कहा और अपने होंठ सिमरन के महकते गले और गालों पर और भी शिद्दत से टिका दिए।
सिमरन ने एक गहरी और लंबी साँस ली, अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने जिस्म के रोंगटे-रोंगटे में परम के उस पाग़ल कर देने वाले स्पर्श को जीने लगी। सरसों के खेत की दिसंबर की वह ठंड जैसे उनके जिस्मों से उठती उस आँच के आगे दम तोड़ चुकी थी। सिमरन ने अपने हाथों से परम के बालों को कसकर भींच लिया और अपनी उंगलियों से उसकी मजबूत पीठ को सहलाने लगी।
“परम… अब अगर तू मुझे इस जहाँ के सामने भी ले जाए, तो भी मुझे परवाह नहीं… मैं सिर्फ और सिर्फ तेरी हूँ,” सिमरन की रूह से निकली यह बात सुनकर परम का दिल और नसों का खून मानो खौल उठा।
उस ढलती शाम के सन्नाटे में, सरसों के उन सुनहरे फूलों के साये में, दोनों एक-दूसरे की बाहों में इस कदर उलझ गए कि वक्त जैसे वहीं ठहर गया। वहाँ सिर्फ दो धड़कनों का शोर था, साँसों की गरमाहट थी और एक ऐसा मादक मिलन था जहाँ हर बंधन टूट चुका था।

devar bhabhi romance: एक नई शुरुआत
सूरज पूरी तरह से छिप चुका था और आसमान में सुरमई अँधेरा अपनी चादर फैला रहा था। दूर गाँव के एक धर्मस्थल की धीमी और रूहानी आवाज़ हवा में तैरती हुई आ रही थी।
दोनों ने धीरे-धीरे खुद को संभाला। सिमरन ने अपनी सुधबुध समेटते हुए लजाते हुए अपना लाल दुपट्टा ठीक किया और सिर पर ओढ़ लिया। उसके चेहरे की रंगत और आँखों का नशा बता रहा था कि सरसों के इस खेत ने आज उसके जीवन को एक नया मोड़ दे दिया है।
परम ने जमीन पर पड़ा अपना खेस उठाया और सिमरन के कंधों पर ओढ़ा दिया, “ठंड बढ़ गई है भाभी… ध्यान रख अपना।”
सिमरन ने परम की आँखों में देखा और एक बहुत ही प्यारी, लजीली मुस्कान दी, “और तू मेरा ध्यान रखेगा ना?”
“ताउम्र भाभी… ताउम्र,” परम ने उसका हाथ थामते हुए कहा।
दोनों ने खेत का काम पूरा किया और गुड़ के मटके ढके। फिर एक-दूसरे का हाथ थामे हुए वे सरसों के खेत की पगडंडी से वापस हवेली की तरफ चल पड़े।
दिसंबर की उस ठंडी शाम में, सरसों के खेतों की सोंधी महक के बीच जो आग जली थी, उसकी गर्माहट आने वाली कई रातों तक उनके दिलों को महकाने वाली थी। devar bhabhi romance
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