devar bhabhi romance अंबाला जिले के सोंधा गाँव में नवंबर की सुहानी ठंड की शुरुआत हो चुकी थी। सुबह के छः बजते ही कोहरे की हल्की सी चादर खेतों और घरों पर बिछी हुई थी। गाँव की पक्की गलियों में दूधिया की साइकिल की घंटियाँ और चौपाल पर बूढ़े-बुजुर्गों के हुक्के की गुड़गुड़ाहट सुनाई देने लगी थी। devar bhabhi romance
रामधारी चौधरी का घर गाँव के पुराने और प्रतिष्ठित घरों में से एक था। लाल ईंटों की बड़ी सी हवेलीनुमा इमारत, जिसके बाहर एक बड़ा सा आंगन था। सुबह-सुबह घर की बड़ी बहू, 36 वर्ष की सुनीता, रसोई में व्यस्त थी। devar bhabhi romance
सुनीता का व्यक्तित्व ऐसा था कि घर का हर कोना उसकी मौजूदगी से जीवंत उठता था। सांवली-गुलाबी रंगत, तीखे नैन-नक्श, और सादगी से बंधा हुआ सूती कसीदाकारी का सूट। उसके चेहरे पर समझदारी और घर की जिम्मेदारियों का संजीदा भाव हमेशा बना रहता था।
रसोई से ताज़े उबलते दूध और अदरक की चाय की खुशबू उठ रही थी। सुनीता ने पीतल की केतली से चाय छानी और बड़े ससुर जी के लिए अलग पीतल के गिलास में निकाली। devar bhabhi romance
“भाभी! ओ भाभी! मेरी चाय तैयार हुई के ना?”

आंगन की तरफ से एक कड़क पर सुरीली आवाज़ आई। वह विपुल था—25 साल का गबरू जवान, जो शहर से अपनी पढ़ाई पूरी करके अभी कुछ महीने पहले ही गाँव लौटा था। लंबा-चौड़ा कद, गठीला शरीर और आँखों में शहर की हवा तथा गाँव की माटी का अनोखा मेल।
विपुल ने रसोई के दरवाजे से टिकते हुए मुस्कुराकर देखा। सुनीता ने उसे सिर से पैर तक निहारा और मुस्कुराते हुए चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाया। devar bhabhi romance
“ले, पकड़ अपना कप। रोज़-रोज़ तन्ने खाट में पड़ी चाय चाहिए। थोड़ा सुबेरे उठके काम में हाथ बंटा लिया कर, ना तो शहर की पढ़ाई ने तन्ने पूरा आलसी बना दिया सै,” सुनीता ने हरियाणवी अंदाज़ में उलाहना देते हुए कहा।
विपुल ने चाय की चुस्की ली और खिली हुई धूप की तरह हंस पड़ा, “अरे भाभी! तन्ने तो पता सै, शहर में सुबेरे-सुबेरे 10 बजे से पहले आँख ना खुलती थी। पर इब्बे गाँव आया हूँ तो तेरी इस चाय की खुशबू म्हैने 7 बजे ही खाट से खींच लावै सै।”
“चल-चल, ज्यादा बातें ना बना। बापू जी (ससुर जी) खेत में गए हैं, उनके लिए नाश्ता तैयार करना सै। आज तो नीचे वाले खेत में चने की बुवाई का आखरी दिन सै ना?” सुनीता ने परांठे सेकते हुए पूछा। devar bhabhi romance
“हाँ भाभी, आज चने का बीज पूरी तरह बो दिया जाएगा। बापू जी और बड़े भैया सब वहीं हैं। ट्रैक्टर वाला भी आ गया सै। आज शाम तक खेत समतल हो जाएगा,” विपुल ने जवाब दिया और सुनीता के हाथ से गरम-गरम परांठा छीनकर खाते हुए बाहर आंगन की तरफ निकल गया।
सुनीता उसे जाते हुए देखती रही। विपुल उसका छोटा देवर था, लेकिन पिछले कुछ महीनों में उसकी बातों, उसकी नज़रों और उसकी उपस्थिति ने सुनीता के जीवन में एक अनजानी सी हलचल पैदा कर दी थी।
सुनीता के पति अपने काम-काज में इतने व्यस्त रहते थे कि दोनों के बीच का भावनात्मक रिश्ता अब महज़ एक दिनचर्या बन चुका था। ऐसे में विपुल का अल्हड़पन, उसकी मीठी तकरार और उसकी चटपटी हरियाणवी बातें सुनीता के एकाकी मन को एक नया अहसास देती थीं।

devar bhabhi romance: दोपहर का काम और शाम की तैयारी
दोपहर ढलते-ढलते घर के बाकी लोग खेतों से लौट आए। खाना-पीना हुआ और ससुर जी तथा सुनीता के पति हवेली के बाहरी हिस्से (बैठक) में विश्राम करने चले गए।
शाम के चार बज रहे थे। धूप हल्की और सुनहरी हो चुकी थी। चने के खेत में बुवाई का काम पूरा हो चुका था और खेत को पाटा चलाकर समतल कर दिया गया था।
ससुर जी ने बैठक से आवाज़ लगाई, “री सुनीता! ओ बहु!”
सुनीता तुरंत सिर पर दुपट्टा ठीक करते हुए बाहर आई, “जी बापू जी?”
“री बहु, नीचे वाले चने के खेत में बीज बोने के बाद मेढ़ के पास थोड़ा काम रह गया था। विपुल तो ट्रैक्टर वाले को पैसे देने गाँव की दुकान तरफ गया सै। तू जरा खेत में जाके देख आ, वहाँ जो बीज की बोरियाँ और कुदाल पड़ी सै, उन्हें सँभाल आ। और हाँ, शाम की ठंड बढ़ने से पहले वापस आ जाईए।”
“जी बापू जी, मैं अभी चली जाती हूँ,” सुनीता ने कहा।
सुनीता ने अपने सिर पर सूती दुपट्टा सलीके से ओढ़ा, पाँव में अपनी मोजड़ी पहनी और टोकरी हाथ में लेकर गाँव के किनारे स्थित चने के खेत की तरफ चल पड़ी।
devar bhabhi romance: चने के खेत का सुरमई माहौल
गाँव के मुख्य रास्ते से अलग, पगडंडियों से होती हुई सुनीता अपने खेत पर पहुँची।
नवंबर का महीना… हवा में एक मीठी और हल्की ठंडक थी। सूरज आसमान में नीचे ढल रहा था और उसकी लाल-सुनहरी किरणें ताज़ा जोती हुई मिट्टी पर बिखर रही थीं। खेत में अभी-अभी चने के बीज बोए गए थे। मिट्टी की सोंधी, गीली और ताज़ा खुशबू चारों तरफ फैली हुई थी। खेत के किनारों पर शीशम के कुछ ऊंचे पेड़ खड़े थे, जिनकी परछाइयाँ शाम के धुंधलके में लंबी होती जा रही थीं।
सुनीता खेत की मेढ़ पर पहुँची। वहाँ शांत वातावरण था। दूर-दूर तक कोई इंसान नज़र नहीं आ रहा था। केवल पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।
सुनीता ने मेढ़ के पास पड़ी कुदाल और खाली बोरियों को समेटना शुरू किया। झुककर काम करते वक्त उसकी कमर का लचीलापन और उसके शरीर की बनावट शाम की ढलती धूप में और भी निखर रही थी। 36 साल की उम्र में भी उसका बदन पूरी तरह भरा हुआ और सुडौल था।
तभी पगडंडी पर किसी के कदमों की आहट हुई। सूखी पत्तियों के टूटने की आवाज़ पर सुनीता ने मुड़कर देखा। वह विपुल था।
devar bhabhi romance: अनकही खिंचाव और मुलाकात
विपुल पगडंडी से मस्तानी चाल चलता हुआ खेत की ओर आ रहा था। सुनीता को खेत में अकेला देखकर उसकी आँखों में एक अनजानी चमक आ गई।
“के बात भाभी! आज तो चने के खेत में अकेले ही काम निपटाया जा रहा सै?” विपुल ने खेत की मेढ़ लांघते हुए कहा।
सुनीता ने कुदाल को एक तरफ रखते हुए अपने माथे का पसीना पोंछा और बोली, “अरे विपुल! तन्ने तो बापू जी ने भेजा था ना? तू कहाँ गायब था इतनी देर से? मैं अड़े अकेली बोरियाँ समेट रही हूँ और तू आराम से टहलते हुए आ रहा सै।”
विपुल मुस्कुराता हुआ उसके पास आ खड़ा हुआ। हवा में मिट्टी की सोंधी महक और ढलती धूप का सुहाना जादू छाने लगा था।
devar bhabhi romance: चने के खेत में रोमांस
“के बात भाभी, आज तो चने की बुवाई के बाद यहीं ढेरा जमाने का इरादा सै के?”
विपुल की एक चटपटी और जानी-पहचानी आवाज़ फिर गूंजी। सुनीता ने दुपट्टे का कोना सँभालते हुए एक तिरछी नज़र उस पर डाली और चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान लाते हुए बोली, “अरे विपुल! तन्ने किसने भेजा अड़े? अरै मैं तो बस काम समेट ही रही थी। तू क्यूं बिना बुलाए बीच में टांग अड़ाने आ जावै सै?”
विपुल मेढ़ लांघकर खेत की नर्म, ताज़ा जोती हुई मिट्टी पर कदम रखता हुआ उसके और करीब आ गया। उसकी नज़रों में एक गहरा, अनकहा खिंचाव था।
“बिना बुलाए कड़े आया हूँ भाभी?” विपुल ने थोड़ा झुककर, अपनी आवाज़ को धीमा और मखमली बनाते हुए कहा, “तेरी ये कातली सी आँखें ही तो रोज़ साँझ को म्हैने खेत की तरफ खींच लावैं सैं। अब तन्ने मदद की ज़रूरत ना हो, पर म्हारे दिल को तो तेरी हाज़िरी की ज़रूरत सै।”
सुनीता का दिल एक पल को जोर से धड़का। उसने झूठी नाराज़गी दिखाते हुए अपना हाथ हवा में झटका, “चाल हट परे ने! बड़ा आया बातों के बताशे बनाने वाला। देवर सै तू मेरा, ज़रा अपनी हद में रह्या कर। कोई देख लेवेगा तो गाँव में बातें बणने में बेर ना लागैगी।”

“इतनी साँझ को अड़े कौन आवेगा भाभी?” विपुल ने एक कदम और आगे बढ़ाया। दोनों के बीच महज़ चंद इंच का फासला रह गया था। हवा में चने की ताज़ा मिट्टी की सोंधी महक और सुनीता के बदन से उठती केवड़े के इत्र की खुशबू आपस में घुल-मिल रही थी। devar bhabhi romance
विपुल की नज़रों का ताव ऐसा था कि सुनीता की साँसें थोड़ी तेज़ होने लगीं। उसने अपनी निगाहें नीची कर लीं, पर विपुल का ध्यान उसकी गर्दन के उस हिस्से पर था जहाँ दुपट्टा थोड़ा खिसक गया था और साँसों की आवाजाही के साथ उसकी सुराहीदार गर्दन की नसें हलकी सी कांप रही थीं।
“भाभी…” विपुल की आवाज़ में इस बार एक अजीब सी मिठास और बेताबी थी। उसने आहिस्ते से अपना हाथ आगे बढ़ाया और सुनीता की नरम, कलाई को अपनी उंगलियों के घेरे में ले लिया।
“के करे सै री विपुल… छोड़ ना…” सुनीता की आवाज़ में वो सख्ती नहीं थी जो एक शिकायत में होनी चाहिए थी। बल्कि उसमें तो एक ऐसा समर्पण था जो सालों की प्यास और अधूरेपन से निकला था।
“ना छोड़ता,” विपुल ने हौले से उसकी कलाई को थोड़ा और अपनी तरफ खींचा, जिससे सुनीता का सुडौल बदन विपुल के चौड़े सीने से जा टकराया। “नवंबर की ये ठंड और ऊपर से तू इतनी गर्म… तन्ने ना पता भाभी, जब तू चालै सै ना, तो चने के खेत भी शर्मा जावैं सैं।”
सुनीता ने विपुल की आँखों में देखा। उन 25 साल की जवान आँखों में एक ऐसा आकर्षण और सच्चाई थी कि सुनीता की रही-सही हिचक भी पिघलने लगी। उसकी साँसों की गर्माहट विपुल के चेहरे पर पड़ रही थी।
“तू ना सुधरेगा विपुल,” सुनीता ने बहुत धीमे से, अपनी उंगलियों से विपुल के कुरते के कॉलर को छूते हुए कहा। उसकी आवाज़ में हरियाणवी मिठास और लचक साफ़ छलक रही थी। “इतनी चटपटी बातें कड़े से सीख के आया सै शहर से? भाभी हूँ तेरी… थोड़ी तो शर्म कर ले।”
“शर्म और अपनों से भाभी?” विपुल ने मुस्कुराते हुए अपना दूसरा हाथ सुनीता की कमर के घुमावदार मोड़ पर टिका दिया। मिट्टी की सोंधी खुशबू के बीच विपुल की उंगलियों की छुअन सुनीता की मखमली त्वचा पर एक बिजली की सी सिहरन दौड़ा गई। सुनीता के होठ हल्के से खुल गए और एक हल्की सी आह उसकी सांवली रंगत वाले गुलाबी होंठों से बाहर निकल आई। devar bhabhi romance
“अरे विपुल… कोई आ जाएगा रे…” उसने नाममात्र का विरोध करते हुए अपनी दोनों हथेलियाँ विपुल की छाती पर रख दीं, लेकिन उसे पीछे धकेलने के बजाय, उसकी उंगलियां खुद-ब-खुद उसके सूती कुरते को भींचने लगीं।

विपुल ने धीरे से अपना चेहरा सुनीता के कान के पास झुकाया। उसकी गर्म साँसें सुनीता की कान की बाली और गर्दन की त्वचा को सहलाने लगीं। “अड़े कोई ना आता भाभी… बस तू सै और मैं हूँ। और ये चने की बोई हुई मिट्टी सै, जो म्हारे इस मिलन की गवाह बण रही सै।”
विपुल की उंगलियों का दबाव जैसे-जैसे सुनीता की कमर पर बढ़ा, सुनीता ने अपनी आँखें मूंद लीं। चने के इस खेत की खामोशी में उन दोनों की तेज़ होती साँसों की आवाज़ किसी रूहानी और मादक संगीत की तरह गूँज रही थी। विपुल का हाथ आहिस्ते से सुनीता की पीठ के हिस्से को सहलाता हुआ उसकी पतली कमर के निचले हिस्से तक सरकने लगा।
सुनीता ने अपनी ढलती उम्र की पूरी नज़ाकत से विपुल के कंधों पर अपना बांहें डाल दीं। उसने अपनी पूरी देह को विपुल के करीब आने दिया। खेत की ठंडक जैसे दोनों के शरीरों की बढ़ती गर्माहट के आगे हार मान रही थी। devar bhabhi romance
“घणा उतावला हो रहा सै तू विपुल…” सुनीता ने उसकी आँखों में आँखें डालकर मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा। उसकी आँखों में एक अजीब सा नशा था, एक ऐसा आमंत्रण जिसे ठुकराना किसी मर्द के लिए नामुमकिन था। “अगर मन भर गया हो तेरी इन चटपटी हरकतों से, तो म्हाने घर भी जाने दे… या यहीं मिट्टी में ही गिराने का इरादा सै?”
“तेरे साथ तो इस मिट्टी में गिरना भी मंज़ूर सै भाभी,” विपुल ने उसके होठों के इतने करीब आकर कहा कि उनके होठ बस एक-दूसरे को छूने ही वाले थे। “चने की बुवाई तो आज हो गई… पर म्हारे प्यार की फसल तो आज शाम से पकनी शुरू हुई सै।”
सुनीता के चेहरे पर एक गहरी, लजीली मुस्कान फैल गई। उसने विपुल के गाल को अपने नरम हाथों से थपथपाया और उसकी बाहों के घेरे में खुद को थोड़ा और समेट लिया। विपुल ने पास ही पड़ी एक चादर को खेत में बिछाया और बड़े ही नाज से सुनीता को उस पर लेटा दिया। चने के खेत में सजी यह सेज किसी मखमली बिस्तर से कम नहीं थी।
विपुल जैसे-जैसे सुनीता के ऊपर छा रहा था, उसके सुमेरू पर्वत ऊपर नीचे हो रहे थे। विपुल ने सुनीता के सुमेरु पर्वतों पर अपने दोनों हाथ रखे। तो उसके मुंह से एक अजीब सी, लेकिन राहत देने वाली सिसकारी निकल पड़ी। अब बिना वक्त गंवाए विपुल, सुनीता पर पूरी तरह से छा गया। दोनों की मदहोश कर देने वाला यह प्यार इतना परवान चढ़ा कि दोनों काफी देर तक एक दूसरे में समाए रहे।

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ढलती शाम का सुरमई अँधेरा धीरे-धीरे चने के खेत को अपनी आगोश में ले रहा था। दूर गाँव के मंदिर से आरती की घंटियों की ध्वनि हवा में तैरती हुई आ रही थी।
दोनों ने खुद को सँभाला। सुनीता ने लजाते हुए अपना दुपट्टा ठीक किया और टोकरी उठाई। विपुल ने बोरियाँ और कुदाल अपने कंधे पर धरी।
“चल अब विपुल, घर में सब राह देख रहे होंगे,” सुनीता ने मंद सी मुस्कान के साथ कहा। उसकी आँखों की चमक बता रही थी कि आज की शाम उसके दिल के किसी सुने कोने को छू चुकी थी।
चने की बोई हुई मिट्टी पर दोनों के कदम साथ-साथ पड़ रहे थे। उस नवंबर की सुरमई साँझ में चने के खेत से शुरू हुई यह कहानी उनके दिलों में एक अनकही और महकती हुई मिठास छोड़ गई थी, जिसकी गूँज आने वाले हर मौसम में सुनाई देने वाली थी। devar bhabhi romance
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