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रियल लव स्टोरी

devar bhabhi ka romance मां की कसम, अब नहीं जिएंगे…यूपी के देवर भाभी की प्रेम कहानी, नहर की गहराई में रूहानी मिलन

devar bhabhi ka romance:: उत्तर प्रदेश के कासगंज ज़िले के मानौटा गांव का माहौल उस सुबह बेहद शांत था। सूरज की किरणें अभी खेत-खलिहानों पर ठीक से बिखरी भी नहीं थीं कि गांव के कृष्णकांत के घर में हलचल शुरू हो गई।

27 वर्ष का कृष्णकांत, जो चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर था, बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद पिछले कुछ महीनों से अपना पूरा ध्यान पुलिस भर्ती परीक्षा की तैयारी में लगा रहा था। घर के बाकी सदस्य उसे एक होनहार युवक के रूप में देखते थे, जिससे पूरे परिवार को बड़ी उम्मीदें थीं।

कृष्णकांत का बड़ा भाई, 33 वर्षीय पंकज, हरियाणा के पानीपत शहर में एक कपड़ा गोदाम में मेहनत-मजदूरी करता था। पंकज का विवाह करीब चार साल पहले प्रियंका से हुआ था। प्रियंका भी बीएससी की छात्रा थी। devar bhabhi ka romance

चार साल पहले दोनों ने परिवार की मर्जी के बिना भागकर लव मैरिज की थी। शुरुआत में परिवार में थोड़ा मनमुटाव रहा, लेकिन समय के साथ सब ठीक हो गया और पंकज प्रियंका के साथ पानीपत में किराए के कमरे पर रहकर अपनी छोटी सी दुनिया बसा चुका था। उनकी 4 साल की एक छोटी सी बेटी भी थी। devar bhabhi ka romance

कृष्णकांत अक्सर पढ़ाई के तनाव से थोड़ा ब्रेक लेने या भाई-भाभी से मिलने के बहाने पानीपत जाता-आता रहता था। प्रियंका और कृष्णकांत की उम्र लगभग एक समान थी और दोनों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि (बीएससी) भी एक जैसी थी, जिससे उनके बीच शुरुआती झिझक जल्द ही समाप्त हो गई। पंकज दिनभर गोदाम में काम में व्यस्त रहता था, ऐसे में कृष्णकांत और प्रियंका के बीच बातचीत का दायरा धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

समय बीतने के साथ, यह सामान्य बातचीत एक अनकही आत्मीयता में बदलने लगी। पिछले एक साल के दौरान, दोनों के बीच का यह जुड़ाव एक गहरे अफेयर का रूप ले चुका था। वे दोनों ही इस बात से भली-भांति परिचित थे कि जिस रिश्ते के भंवर में वे फंस चुके हैं, उसका सामाजिक या पारिवारिक स्तर पर कोई भविष्य नहीं है।

एक तरफ पंकज के प्रति नैतिक जिम्मेदारी और 4 साल की मासूम बच्ची का चेहरा था, तो दूसरी तरफ कृष्णकांत और प्रियंका का एक-दूसरे के प्रति बढ़ता आकर्षण।

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devar bhabhi ka romance 7 सितंबर 2026: अचानक गायब होना

7 सितंबर की सुबह कासगंज के मानौटा गांव में कृष्णकांत रोजाना की तरह सुबह उठा। उसने अपने पिता से बहुत ही सहजता से बात की।

“पिताजी, मेरी थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। सिर में भारीपन है, मैं शहर जाकर अस्पताल से दवा ले आता हूँ,” कृष्णकांत ने कहा।

पिता ने अपने बेटे पर विश्वास करते हुए कहा, “ठीक है बेटा, समय से दवाई लेकर वापस आ जाना। शाम को पुलिस भर्ती की तैयारी वाली क्लास भी तुम्हें लेनी होगी।”

कृष्णकांत घर से निकला, लेकिन वह अस्पताल जाने के लिए बस स्टैंड नहीं गया। उसने पहले से ही प्रियंका के साथ पानीपत से निकलने का प्लान बना रखा था।

उधर पानीपत में, दोपहर के करीब 1 बजे पंकज हमेशा की तरह अपने कपड़ा गोदाम से लंच करने के लिए कमरे पर पहुंचा। कमरे का दरवाजा आधा खुला हुआ था। अंदर जाकर पंकज ने देखा कि उसकी 4 साल की बेटी बेड पर सो रही थी, लेकिन प्रियंका वहां मौजूद नहीं थी। पंकज ने आसपास देखा, किचन और बालकनी में आवाज दी, “प्रियंका! प्रियंका! कहां हो?”

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जब कोई जवाब नहीं मिला, तो पंकज को चिंता हुई। उसने सोचा कि शायद वह पास की किसी दुकान पर सामान लेने गई होगी। लेकिन आधे घंटे तक इंतजार करने के बाद भी जब प्रियंका नहीं लौटी, तो पंकज की घबराहट बढ़ने लगी। उसने दोपहर करीब 1:30 बजे कासगंज में अपनी माँ रामवती को फोन मिलाया।

“माँ, प्रियंका वहां गांव आई है क्या? वह कमरे पर नहीं है और बच्ची अकेली बेड पर सो रही थी,” पंकज ने परेशान स्वर में पूछा।

माँ रामवती ने हैरान होते हुए कहा, “नहीं पंकज, प्रियंका यहाँ तो नहीं आई है। कृष्णकांत भी सुबह से दवाई लेने शहर गया हुआ है, अभी तक नहीं लौटा।”

पंकज का मन किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठा। उसने दिनभर प्रियंका के दोस्तों, पड़ोसियों और जान-पहचान वालों को फोन किया, लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिला। शाम ढलते-ढलते पंकज की बेचैनी हद से गुजर गई। शाम करीब 6 बजे उसने अपने छोटे भाई कृष्णकांत के मोबाइल पर कॉल किया।

दूसरी तरफ फोन की घंटी बजी और कृष्णकांत ने कॉल रिसीव की।

पंकज ने बेताबी से पूछा, “कृष्णकांत, प्रियंका का कुछ पता चला? वह दोपहर से गायब है, बच्ची रो-रोकर परेशान हो रही है!”

फोन पर कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया। फिर कृष्णकांत ने धीमी और भारी आवाज में कहा, “भैया… प्रियंका मेरे साथ है।”

यह सुनते ही पंकज के होश उड़ गए। उसे अपनी कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। “क्या? प्रियंका तुम्हारे साथ है? तुम दोनों कहाँ हो इस वक्त?”

“हम दोनों दिल्ली में हैं, कश्मीरी गेट और चांदनी चौक के पास,” कृष्णकांत ने जवाब दिया।

पंकज ने तुरंत कहा, “तुम लोग वहीं रुको! मैं पानीपत से पहली बस पकड़कर दिल्ली आ रहा हूँ। वहीं बैठकर बात करेंगे।”

कृष्णकांत ने गंभीर स्वर में कहा, “नहीं भैया, आपको दिल्ली आने की कोई जरूरत नहीं है। आप परेशान मत होइए, हम खुद वापस आ जाएंगे।”

उसी शाम कासगंज में कृष्णकांत के पिता ने भी अपने बेटे के फोन पर दोबारा कॉल किया। “बेटा कृष्णकांत, कितनी देर हो गई? दवा मिली या नहीं?”

कृष्णकांत ने बात संभालते हुए झूठ बोला, “पिताजी, अस्पताल में मरीजों की बहुत लंबी लाइन लगी है। डॉक्टर देर से बैठे थे। अभी कुछ समय और लगेगा, आप लोग चिंता मत कीजिए।”

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devar bhabhi ka romance दिल्ली की वह आखिरी शाम

दिल्ली के कश्मीरी गेट इलाके की चहल-पहल और गाड़ियों के शोर के बीच कृष्णकांत और प्रियंका एक-दूसरे के सामने खड़े थे। चारों तरफ भागती-दौड़ती दुनिया के बीच वे दोनों एक अजीब सी खामोशी से घिरे हुए थे।

प्रियंका ने अपनी आँखें पोंछते हुए कृष्णकांत से कहा, “कृष्णकांत, अब हम कहां जाएंगे? अगर हम वापस घर गए तो समाज, परिवार और पंकज हमें कभी माफ नहीं करेंगे। हमारी वजह से पूरे परिवार की बदनामी होगी। और अगर हम दूर भागकर भी रहे, तो क्या जिंदगीभर छिपकर जी पाएंगे?”

कृष्णकांत ने प्रियंका के हाथ को मजबूती से थामते हुए कहा, “प्रियंका, मैं जानता हूँ कि हमने जो रास्ता चुना, उसकी कोई मंजिल नहीं है। भाई ने मुझ पर भरोसा किया, परिवार ने मुझे पढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी, और मैंने… लेकिन अब पीछे हटने का रास्ता भी बंद हो चुका है। अगर हमें इस रिश्ते की कीमत चुकानी है, तो हम पीछे नहीं हटेंगे।”

प्रियंका ने रोते हुए कहा, “मुझे अपनी बेटी की याद आ रही है कृष्णकांत, लेकिन मैं अब पंकज के सामने जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकती।”

दोनों ने एक ऐसा फैसला कर लिया था, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। वे दिल्ली से कासगंज की ओर लौटने वाली बस में बैठ गए, लेकिन गांव जाने के लिए नहीं।

8 सितंबर 2026 तड़के: कॉल, कसम और अलविदा

8 सितंबर 2026 की तड़के करीब 3 बजे, पूरा कासगंज और नदरई इलाका गहरे अंधेरे में डूबा हुआ था। नदरई स्थित हजारा नहर का पिकनिक पॉइंट उस वक्त बिल्कुल सुनसान था। केवल नहर के पानी के बहने की तेज आवाज आ रही थी। ठंडी हवाओं के बीच दोनों नहर की पुलिया के पास खड़े थे।

कृष्णकांत ने अपने जेब से फोन निकाला और कांपती उंगलियों से पंकज का नंबर मिलाया।

पानीपत में पंकज जो पूरी रात सो नहीं पाया था, उसने पहली ही घंटी पर फोन उठा लिया। “हेलो! कृष्णकांत, कहाँ हो तुम लोग?”

कृष्णकांत की आवाज में एक अजीब सी ठंडक और भारीपन था। “भैया… हम दोनों इस वक्त नदरई में हजारा नहर के पिकनिक पॉइंट के पास खड़े हैं।”

पंकज के मन में अचानक किसी अनहोनी का खौफ कौंध गया। “तुम लोग नहर के पास क्या कर रहे हो रात के तीन बजे? तुरंत वहां से हटो और घर आओ! जो भी बात है, हम घर बैठकर सुलझा लेंगे!”

कृष्णकांत ने रुंधे गले से कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है भैया। माँ की कसम खाकर कहता हूँ… हम दोनों अब जीने नहीं जा रहे। हम नहर में कूदकर अपनी जान देने जा रहे हैं।”

पंकज के पैर जैसे ठंडे पड़ गए। वह चिल्लाया, “कृष्णकांत! पागल मत बनो! माँ की कसम मत दो! रुक जाओ! प्रियंका से मेरी बात कराओ!”

कृष्णकांत ने फोन प्रियंका को थमा दिया। प्रियंका की सिसकियों की आवाज फोन में सुनाई दी।

“पंकज… हमें माफ कर देना,” प्रियंका ने रोते हुए कहा। “हमारी वजह से तुम्हें और परिवार को बहुत दुख पहुंचा है। बच्ची का ख्याल रखना… अब यही हमारा आखिरी रास्ता है।”

पंकज ने पागलों की तरह गिड़गिड़ाना शुरू किया, “प्रियंका, ऐसा मत करो! बेटी के बारे में सोचो! कृष्णकांत, मेरी बात सुनो!”

लेकिन फोन कट चुका था। पंकज ने तुरंत कृष्णकांत के नंबर पर मैसेज भेजे: “रुक जाओ, ऐसा कोई कदम मत उठाना! सुरक्षित रहो, हम सब संभाल लेंगे!”

कुछ ही देर बाद, कृष्णकांत का मोबाइल पूरी तरह से स्विच ऑफ हो गया।

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devar bhabhi ka romance नहर में मिली देवर भाभी की लाश

devar bhabhi ka romance नहर किनारे लावारिस सामान

8 सितंबर 2026 की सुबह जब सूरज निकला, तो नदरई पिकनिक पॉइंट के पास टहलने निकले कुछ ग्रामीणों को नहर के किनारे एक बड़ा थैला और कुछ लावारिस सामान दिखाई दिया। लावारिस बैग देखकर लोगों ने तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचना दी।

कासगंज थाने के थानाध्यक्ष अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। जब बैग और आसपास बिखरे सामान की तलाशी ली गई, तो पुलिस को दो अलग-अलग लेडीज और जेंट्स पर्स मिले।

एक लेडीज पर्स में सोने की कुछ ज्वैलरी, 4,510 रुपये नकद और प्रियंका की एक पासपोर्ट साइज फोटो मिली। दूसरे पर्स में बिंदी के पत्ते और प्रियंका की एक और फोटो रखी थी। जेंट्स वॉलेट को खोलने पर उसमें चार एटीएम कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और 510 रुपये नकद बरामद हुए। ड्राइविंग लाइसेंस के आधार पर पहचान मानौटा गांव निवासी कृष्णकांत (27) के रूप में हुई।

पुलिस ने तुरंत मानौटा गांव में परिजनों से संपर्क किया। पंकज और उसके पिता बदहवास हालत में नदरई पहुंचे। वहां सामान देखते ही पंकज फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने पुलिस को तड़के 3 बजे आई उस फोन कॉल और माँ की कसम वाली पूरी बात बताई।

पुलिस ने बिना समय गंवाए पीएसी (PAC) की फ्लड यूनिट और स्थानीय गोताखोरों को बुलाया। हजारा नहर के तेज बहाव में दोनों की तलाश का अभियान शुरू किया गया। गोताखोरों की टीम ने कई किलोमीटर तक नहर के पानी में छानबीन की, लेकिन दिन बीतते गए और कोई सुराग हाथ नहीं लगा।

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devar bhabhi ka romance नहर किनारे खड़े परिजन

devar bhabhi ka romance 9वें दिन का खौफनाक अंत

दिन बीतते रहे। परिजनों की आँखें नहर के किनारे पथरा चुकी थीं। कासगंज पुलिस की टीमें लगातार नहर के किनारे बसे गांवों और इलाकों में निगरानी रख रही थीं।

आखिरकार घटना के 9वें दिन, यानी गुरुवार की सुबह, घटना स्थल नदरई पिकनिक पॉइंट से करीब 13 किलोमीटर दूर नहर के एक शांत मोड़ पर दो शव तैरते हुए देखे गए। स्थानीय ग्रामीणों ने तुरंत पुलिस को खबर दी।

थानाध्यक्ष विदेश राठी अपनी पुलिस टीम और एम्बुलेंस के साथ मौके पर पहुंचे। गोताखोरों की मदद से दोनों शवों को नहर से बाहर निकाला गया। पानी में कई दिनों तक रहने के कारण शव काफी खराब हो चुके थे, लेकिन कपड़ों और शारीरिक बनावट से उनकी पहचान कृष्णकांत और प्रियंका के रूप में हुई।

खबर मिलते ही पंकज और परिवार के अन्य लोग रोते-बिलखते मौके पर पहुंचे। जिस भाई और पत्नी के लौटने की धुंधली सी उम्मीद परिवार के दिल में बची थी, वह अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी थी। devar bhabhi ka romance

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थानाध्यक्ष विदेश राठी ने पूरी स्थिति का जायजा लेते हुए बताया, “देवर और भाभी दोनों के शव नहर से बरामद कर लिए गए हैं। दोनों शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया है। परिजनों के बयानों और प्राथमिक जांच के आधार पर मामले की वैधानिक कार्रवाई की जा रही है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद आगे की विधिक कार्रवाई की जाएगी।”

मानौटा गांव में उस दिन हर आंख नम थी। 27 साल का कृष्णकांत, जो कभी पुलिस अफसर बनने के सपने देखता था, और प्रियंका, जो अपने परिवार के साथ एक खुशहाल जिंदगी बिता सकती थी—दोनों का एक साल का अनैतिक अफेयर और समाज के डर से उठाया गया यह आत्मघाती कदम, आखिरकार हजारा नहर के ठंडे पानी में हमेशा-हमेशा के लिए दफन हो गया। devar bhabhi ka romance

इस दुखद घटना से मिलने वाली मुख्य सीख:

आवेग में गलत फैसले का अंजाम: कठिन परिस्थितियों और तनाव में जल्दबाजी या भावुकता में लिया गया फैसला पूरे जीवन को तबाह कर देता है।

नैतिकता और जिम्मेदारी की अनदेखी: सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर लिए गए आत्मघाती कदमों की सबसे भारी कीमत मासूम बच्चों और निर्दोष परिवार को चुकानी पड़ती है।

संवाद से हल संभव: किसी भी गलती या पारिवारिक तनाव का समाधान छिपने या जान देने में नहीं, बल्कि अपनों के सामने सच स्वीकार करने और बातचीत करने में होता है।

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Mahesh kant Shiva
महेश कांत शिवा (Xlaila Editor) पिछले 15 वर्षों से डिजिटल मीडिया से जुडे़ हैं। अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं देने के बाद, वर्तमान में वह एक बड़े मीडिया घराने में बतौर चीफ सब एडिटर (डिजिटल) कार्यरत हैं। खबरों के साथ-साथ दिल को छू लेने वाली कहानियों और जज्बातों को पन्नों पर उतारना उनका पैशन है, और अपने ब्लॉग xlaila पर कहानियों को जीवंत करना उनका हुनर है।
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