Romantic Kahani Patiala: पंजाब का पटियाला शहर अपनी शाही नज़ाकत, पटियाला पेग, परांदों और खूबसूरत बागों के लिए जाना जाता है। यहाँ की पुरानी हवेलियाँ और बाज़ार आज भी अतीत की भव्यता की गवाही देते हैं।
शहर के बीचों-बीच स्थित ‘बारादरी गार्डन’ के पास एक पुरानी, दो-मंजिला हवेली बनी हुई थी। लाल ईंटों, नक्काशीदार झरोखों और बड़े-बड़े आँगन वाली यह हवेली कपूर परिवार का पुश्तैनी घर थी। Romantic Kahani
जनवरी की ढलती हुई एक शाम को, जब सूरज की सुनहरी किरणें शीश महल के तालाब के पानी पर झिलमिला रही थीं, हवेली के आँगन में चाय की चुस्कियाँ ली जा रही थीं।
शादी को अभी महज़ पाँच महीने हुए थे। घर की बड़ी बहू बनकर आई थीं सिमरन। सिमरन मूल रूप से अमृतसर की रहने वाली थीं- सुंदर, समझदार, शांत स्वभाव की और किताबों व पुरानी चीज़ों की शौकीन। सिमरन की शादी घर के बड़े बेटे नवजोत से हुई थी। नवजोत इंडियन आर्मी में कैप्टन थे और शादी के कुछ ही हफ्तों बाद उनकी पोस्टिंग लेह-लद्दाख के सीमावर्ती इलाके में हो गई थी।
घर में सास-ससुर, सिमरन और नवजोत का छोटा भाई गुरुसेवक रह गए थे।
गुरुसेवक- जिसे घर में सब प्यार से ‘गुरु’ कहते थे- पटियाला के ही एक जाने-माने कॉलेज में फाइन आर्ट्स (चित्रकारी) का छात्र था। गुरु का दिल कला, संगीत और पुराने ज़माने की शायरी में बसता था। वह बहुत ही संवेदनशील, सुलझा हुआ और शांत स्वभाव का लड़का था।
नवजोत के जाने के बाद, सिमरन घर की हर ज़िम्मेदारी बखूबी निभा रही थीं, लेकिन दिल के किसी कोने में एक अजीब सा खालीपन था। पटियाला का यह बड़ा सा घर और उसकी शांत रातें उन्हें अक्सर उदास कर देती थीं। Romantic Kahani
गुरुसेवक अपनी भाभी के इस मौन दर्द को बखूबी समझता था। वह अक्सर घर के कामों में उनकी मदद करता और कोशिश करता कि भाभी कभी खुद को अकेला न महसूस करें।

Romantic Kahani हवेली की अटारी और एक भूली-बिसरी पेटारी
रविवार का दिन था। सुबह से ही आसमान में बादलों का डेरा था और हल्की-हल्की फुहारें गिर रही थीं। मम्मी जी ने सिमरन से कहा कि हवेली की पुरानी अटारी (स्टोर-रूम) में सालों से कुछ पुराने बक्से पड़े हैं, उन्हें साफ करके बेकार सामान निकाल दिया जाए।
सिमरन अटारी की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचीं। अटारी में पुरानी लकड़ी, पीतल के बर्तन और धूल जमी किताबों की एक अजीब, भीनी-भीनी सी महक तैर रही थी। सिमरन ने खिड़की खोली तो धूप की एक पतली सी लकीर धूल के कणों को चमकाती हुई अंदर आई।
सिमरन ने एक पुराना संदूक खोला। उसमें नवजोत और गुरु के बचपन के खिलौने, पुराने कपड़े और कुछ पुरानी तस्वीरें रखी थीं। काम में हाथ बँटाने के लिए गुरुसेवक भी तौलिया और झाड़न लेकर अटारी में आ गया।
“भाभी! आप अकेली ही इस धूल-मिट्टी में जुट गईं? मुझे आवाज़ दे दी होती,” गुरुसेवक ने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा।
“अरे गुरु! कोई बात नहीं, बस थोड़ा सा ही सामान है। देखो तो, तुम्हारे बचपन के खिलौने मिले हैं यहाँ,” सिमरन ने एक पुरानी चाबी वाली कार दिखाते हुए मुस्कुराकर कहा।
गुरुसेवक हँस पड़ा और सिमरन के पास नीचे फर्श पर बैठ गया। दोनों मिलकर सामान छाँटने लगे।
सामान छाँटते-छाँटते, संदूक के सबसे निचले हिस्से में सिमरन को मखमली लाल कपड़े में लिपटा हुआ एक छोटा सा डिब्बा मिला। सिमरन ने उत्सुकता से वह कपड़ा हटाया। अंदर लकड़ी की एक पुरानी नक्काशीदार पेटी थी। पीतल का ताला लगा हुआ था, लेकिन चाबी साथ ही लटक रही थी।
सिमरन ने धीरे से ताला खोला। अंदर एक पुरानी, चमड़े के कवर वाली डायरी रखी थी। डायरी के पन्ने हल्के पीले पड़ चुके थे।
“यह किसकी डायरी है, गुरु?” सिमरन ने अचरज से पूछा।
गुरुसेवक ने डायरी की तरफ देखा। “पता नहीं भाभी, मैंने तो आज तक नहीं देखी। शायद चाचा जी की हो या पिताजी के ज़माने की?”
सिमरन ने डायरी का पहला पन्ना पलटा। पन्ने के कोने पर नीली स्याही से एक खूबसूरत लिखावट में लिखा था- ‘सिमरन की यादें और ख़्वाब’ (अमृतसर, 2018)।
सिमरन का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। यह उनकी अपनी डायरी थी! उनके कॉलेज के दिनों की डायरी! शादी के समय सामान की पैकिंग में यह डायरी कहीं खो गई थी और सिमरन को लगा था कि यह अमृतसर में ही छूट गई है।
“यह… यह तो मेरी डायरी है, गुरु!” सिमरन की आँखें खुशी से चमक उठीं।

Romantic Kahani डायरी के पन्ने और पसंद का अनोखा संगम
गुरुसेवक ने हैरानी से देखा, “आपकी डायरी? यहाँ कैसे आई भाभी?”
“लगता है जब शादी के बाद मेरा सामान इस हवेली में शिफ्ट हो रहा था, तब यह बक्सा इसी अटारी में रख दिया गया होगा,” सिमरन ने डायरी को बहुत प्यार से अपने हाथों में समेटते हुए कहा।
गुरुसेवक की उत्सुकता बढ़ गई। “भाभी… अगर आपको ऐतराज़ न हो, तो क्या मैं देख सकता हूँ कि हमारी सुघड़ भाभी कॉलेज के दिनों में कैसी शायरी लिखती थीं?”
सिमरन थोड़ी शरमा गईं। “अरे नहीं गुरु, इसमें कुछ खास नहीं है। बस मेरी पसंद के गाने, पुरानी ग़ज़लें, मेरी बनाई कुछ अधूरी पेंटिंग्स और कुछ ख़्वाब लिखे हैं।”
“अब तो और भी देखना पड़ेगा!” गुरुसेवक ने बच्चों जैसी ज़िद की।
सिमरन ने हँसते हुए डायरी गुरु की तरफ बढ़ा दी। गुरुसेवक ने पहला पन्ना पलटा।
डायरी में एक तरफ जगजीत सिंह की एक मशहूर ग़ज़ल के शेर लिखे थे—‘झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं…’। और ठीक उसके बगल वाले पन्ने पर काली स्याही से एक सायादार पेड़ और उसके नीचे बैठे इंसान का बहुत ही खूबसूरत स्केच बना हुआ था।
गुरुसेवक उस स्केच और ग़ज़ल को देखता ही रह गया। उसकी आँखें फैल गईं।
“भाभी… यह ग़ज़ल? यह तो मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल है! और यह स्केच… यह तो बिल्कुल उसी स्टाइल में बना है जिस स्टाइल में मैं अपने कॉलेज के प्रोजेक्ट्स बनाता हूँ!” गुरुसेवक की आवाज़ में आश्चर्य साफ झलक रहा था।
सिमरन ने चौंककर देखा। “सच में? तुम्हें जगजीत सिंह की ग़ज़लें पसंद हैं? मुझे लगा था आजकल के लड़कों को सिर्फ पॉप और रॉक म्यूज़िक ही पसंद आता है।”
“अरे भाभी! आप मुझे क्या समझती हैं?” गुरुसेवक ने डायरी का अगला पन्ना पलटते हुए कहा। “मैं तो 90s के गानों और क्लासिकल शेरो-शायरी का दीवाना हूँ। और देखिए… यहाँ आपने ‘नुसरत फतेह अली खान’ की कव्वाली की पंक्तियाँ लिखी हैं!”
जैसे-जैसे डायरी के पन्ने पलटते गए, दोनों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।
सिमरन की डायरी में जो भी चीज़ें दर्ज थीं- चाहे वह बारिश में अदरक वाली चाय पीते हुए किताबें पढ़ने का शौक हो, पटियाला के पुराने बाज़ारों से पुरानी मुग़लई पेंटिंग्स इकट्ठा करने की चाहत हो, या फिर दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों के प्रति दीवानगी- वह सब कुछ हूबहू गुरुसेवक की अपनी पसंद से मेल खाता था!
नवजोत स्वभाव से बहुत व्यावहारिक, अनुशासित और सेना के सख्त नियमों में ढले हुए इंसान थे। उन्हें संगीत, शायरी या पेंटिंग्स में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। सिमरन ने कभी नवजोत से इन चीज़ों का ज़िक्र भी किया था, तो उन्होंने मुस्कुराकर बात टाल दी थी। लेकिन आज, इस पुरानी अटारी की धूल भरी फिज़ा में, सिमरन को अहसास हुआ कि इस बड़े से घर में एक ऐसा इंसान भी मौजूद था जो उनकी अंतरात्मा की भाषा समझता था।
“भाभी… हम दोनों की पसंद इतनी मिलती-जुलती है? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा!” गुरुसेवक ने डायरी से नज़रें उठाकर सिमरन की आँखों में देखा।
सिमरन ने एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “शायद इसे ही ‘समान सोच’ (Like-mindedness) कहते हैं, गुरु। मुझे भी नहीं पता था कि मेरे देवर के अंदर एक इतना गहरा कलाकार छिपा है।”

Romantic Kahani सीक्रेट बॉन्ड और ‘कलात्मक’ नोक-झोंक
उस दिन के बाद से, हवेली का माहौल चुपचाप बदलने लगा।
अटारी में मिली उस पुरानी डायरी ने सिमरन और गुरुसेवक के बीच एक ऐसा सीक्रेट बॉन्ड (गुप्त रिश्ता) बना दिया था, जिसकी खबर घर के बाकी लोगों को नहीं थी। यह रिश्ता किसी दिखावे या शोर-शराबे का नहीं था, बल्कि दो समान कलात्मक आत्माओं का एक-दूसरे से मिलन था।
शाम के समय, जब ससुर जी अपने दोस्तों के साथ ताश खेलने क्लब चले जाते और मम्मी जी गुरुद्वारे में कीर्तन के लिए जातीं, हवेली के बड़े से बरामदे में एक अलग ही महफिल सजती।
गुरुसेवक अपना कैनवास और वाटर-कलर लेकर बैठ जाता, और सिमरन अपने हाथ में चाय की केतली और वही पुरानी डायरी लेकर आ जातीं।
“भाभी! आज मैं पटियाला के ‘किला मुबारक’ का एक स्केच बना रहा हूँ। ज़रा बताइए तो, इसमें आसमान का रंग ढलते सूरज जैसा नारंगी रखूँ या गहरा नीला?” गुरुसेवक ने ब्रश हाथ में पकड़े-पकड़े पूछा।
सिमरन ने चाय का कप टेबल पर रखा और गुरु के बिल्कुल करीब आकर कैनवास को ध्यान से देखा। “अगर मेरी मानो गुरु, तो आसमान को हल्का बैंगनी और नारंगी का मिक्स दो। और हाँ… किले की दीवार पर वो जो पुरानी लकीरें हैं, उन्हें थोड़ा गहरा दिखाओ, ताकि उसमें इतिहास की महक आए।”
गुरुसेवक ने सिमरन का सुझाव माना और जैसे ही उसने पहला स्ट्रोक लगाया, कैनवास पर जादू सा बिखर गया।
“वाह भाभी! आपका आर्ट सेंस तो किसी बड़े आर्ट क्रिटिक से भी बेहतर है!” गुरुसेवक ने तारीफ की।
“अच्छा जी? तारीफ तो बहुत कर रहे हो, लेकिन मेरी चाय ठंडी हो रही है,” सिमरन ने नटखट अंदाज़ में अपनी आँखें मटकाते हुए कहा। “जल्दी से बताओ, कल जो मैंने डायरी में अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल पढ़ी थी, उसका दूसरा शेर क्या था?”
गुरुसेवक ने अपना ब्रश नीचे रखा और सिमरन की आँखों में देखते हुए बहुत ही मखमली आवाज़ में बोला-
“सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं…”
सिमरन एक पल के लिए स्तब्ध रह गईं। गुरु की आवाज़ में इतनी रवानगी और मिठास थी कि बरामदे में बहती ठंडी हवा भी जैसे ठहर गई। सिमरन ने अपनी नज़रें नीची कर लीं। उनके गालों पर एक हल्का सा गुलाबीपन तैर गया।
“बिल्कुल सही… गुरु,” सिमरन ने धीमी आवाज़ में कहा। “तुम्हें तो सब ज़बानी याद है।”
“याद कैसे न हो भाभी? जब लिखने वाली मेरी भाभी हो, और पढ़ने वाला उनका देवर!” गुरुसेवक ने हँसते हुए माहौल को हल्का कर दिया।
दोनों के बीच ऐसी ही खट्टी-मीठी नोक-झोंक चलती रहती। कभी गुरु सिमरन की बनाई पुरानी पेंटिंग्स में कमियाँ निकालता, तो कभी सिमरन गुरु की शायरी के लहज़े को सुधारतीं। इस नोक-झोंक में एक अनकही मिठास थी—एक ऐसा आकर्षण जो दो इंसानों को उनके साझा शौक और विचारों के ज़रिए एक-दूसरे के बेहद करीब ले आता है।

Romantic Kahani शीश महल की सैर और एक भावुक पल
फरवरी की शुरुआत में, पटियाला की सर्दी थोड़ी कम होने लगी थी। धूप में एक मीठी सी गर्माहट आ गई थी।
गुरुसेवक के कॉलेज का एक एनुअल आर्ट एक्सहिबिशन (कला प्रदर्शनी) पटियाला के ऐतिहासिक ‘शीश महल’ के प्रांगण में आयोजित किया गया था। गुरु की बनाई दो पेंटिंग्स भी इस एक्सहिबिशन में चुनी गई थीं।
मम्मी जी का पैर में दर्द था, इसलिए उन्होंने सिमरन से कहा कि वह गुरुसेवक के साथ जाकर उसकी प्रदर्शनी देख आए।
सिमरन ने उस दिन बहुत ही सादगी भरी, आसमानी रंग की पटियाला सूट पहनी थी, कानों में पारंपरिक झुमके और बालों में एक हल्की सी परांदी। जब वे शीश महल के प्रांगण में पहुँचीं, तो गुरुसेवक उन्हें देखकर एक पल के लिए ठिठक गया।
“क्या हुआ गुरु? ऐसे क्या देख रहे हो? क्या मैं अच्छी नहीं लग रही?” सिमरन ने झिझकते हुए पूछा।
“भाभी… आप बिल्कुल वैसी लग रही हैं जैसी उस पुरानी डायरी के पन्ने नंबर चौदह पर बनी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग की तस्वीर थी,” गुरुसेवक ने दिल से कहा।
सिमरन शरमा गईं। “चलो भी अब, अपनी पेंटिंग्स दिखाओ।”
गुरुसेवक सिमरन को एक्सहिबिशन हॉल के अंदर ले गया। वहाँ शहर के कई बड़े कलाकार और कला-प्रेमी मौजूद थे।
जब वे गुरुसेवक की पेंटिंग के पास पहुँचे, तो सिमरन का दिल गर्व से भर गया। गुरु ने जो पेंटिंग बनाई थी, उसमें एक पुरानी हवेली की अटारी में बैठी एक औरत की परछाई थी, जिसके हाथ में एक डायरी थी और खिड़की से धूप अंदर आ रही थी। पेंटिंग का शीर्षक था- ‘द लॉस्ट मेलोडी’ (खोई हुई धुन)।
सिमरन ने उस पेंटिंग को देखा। वह साफ़ तौर पर उनकी उस दिन की मुलाकात पर आधारित थी जब उन्हें अटारी में डायरी मिली थी।
“गुरु… यह…” सिमरन के शब्द गले में ही अटक गए।
“यह पेंटिंग मैंने आपके नाम समर्पित की है, भाभी,” गुरुसेवक ने बहुत ही धीमी और गंभीर आवाज़ में कहा। “जब तक यह डायरी नहीं मिली थी, मुझे लगता था कि मेरी कला को गहराई से समझने वाला इस घर में कोई नहीं है। लेकिन आपने मेरी कला को एक नई आत्मा दी है।”
आस-पास कई लोग गुरु की पेंटिंग की तारीफ़ कर रहे थे। एक बड़े आर्ट क्रिटिक ने गुरु से पूछा, “मिस्टर कपूर, इस पेंटिंग में जो भावुकता है, उसका प्रेरणास्रोत (Inspiration) कौन है?”
गुरुसेवक ने मुस्कुराकर सिमरन की तरफ देखा और कहा, “मेरी भाभी। यह मेरी सबसे बेहतरीन दोस्त और मेरी सबसे बड़ी गाइड हैं।”
सिमरन की आँखों में खुशी और भावुकता के आंसू आ गए। उन्होंने अपनी पलकें झुका लीं। उस पल में सिमरन को लगा कि किसी स्त्री के लिए इससे बड़ा सम्मान कोई नहीं हो सकता कि कोई उसकी आंतरिक सुंदरता और सोच को इस तरह अपनी कला में अमर कर दे।

Romantic Kahani बारिश की रात, चाय और मर्यादा की लकीर
प्रदर्शनी से लौटने के बाद, उसी रात पटियाला में झमाझम बारिश शुरू हो गई। पुराने ज़माने की हवेली की छत पर गिरती बारिश की बूंदों से पूरा घर गूँज रहा था।
रात के ग्यारह बज रहे थे। सिमरन अपने कमरे की बालकनी में खड़ी होकर बारिश को देख रही थीं। उनके हाथ में वही पुरानी डायरी थी।
तभी सीढ़ियों से कदम चाप सुनाई दी। गुरुसेवक हाथ में दो कप गरमा-गरम चाय और पकौड़े की प्लेट लिए बालकनी में आया।
“भाभी! बारिश हो और हम चाय न पिएँ? ऐसा तो हमारी डायरी के नियमों के खिलाफ है!” गुरुसेवक ने हँसते हुए कहा।
सिमरन ने मुड़कर देखा और मुस्कुरा दीं। “तुम्हें आराम करना चाहिए गुरु, आज का दिन बहुत थका देने वाला था।”
“थकावट? भाभी, आज का दिन तो मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत दिन था,” गुरुसेवक ने चाय का कप सिमरन को थमाया।
दोनों बालकनी की मुंडेर पर टिक कर खड़े हो गए। सामने शीश महल का विस्तृत इलाका बारिश की धुंध में डूबा हुआ दिख रहा था।
“गुरु…” सिमरन ने चाय की चुस्की लेते हुए अचानक शांत आवाज़ में कहा।
“हाँ भाभी?”
“कभी-कभी मुझे डर लगता है।”
“डर? किस बात का भाभी?” गुरुसेवक ने चिंतित होकर सिमरन का चेहरा देखा।
“इस बात का… कि हमारी यह दोस्ती, हमारी यह समान पसंद, और यह सीक्रेट डायरी… कहीं इस घर के लोगों के लिए कोई गलतफहमी न बन जाए। समाज ऐसे रिश्तों को अक्सर गलत नज़रों से देखता है, गुरु।” सिमरन की आवाज़ में एक अनकहा डर और संकोच था।
गुरुसेवक ने चाय का कप मुंडेर पर रखा। वह सिमरन के सामने आया। उसने बहुत ही आदर और शालीनता के साथ सिमरन के सिर पर हाथ रखा- एक छोटे भाई और सच्चे दोस्त की तरह।
“भाभी… दुनिया क्या सोचती है, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मुझे आप पर और अपने आप पर पूरा भरोसा है,” गुरुसेवक की आवाज़ में एक अद्भुत परिपक्वता और ठहराव था। “हमारे बीच जो रिश्ता है, वह सिर्फ दो समान विचारों का मिलन है। इसमें कोई वासना, कोई बेईमानी या कोई खोट नहीं है। यह रिश्ता किताबों, कला, शायरी और एक-दूसरे के प्रति गहरी इज़्ज़त पर टिका है।”
गुरुसेवक ने सिमरन की आँखों में देखा और आगे कहा, “नवजोत भाई मेरे आदर्श हैं। वे देश की रक्षा कर रहे हैं, और मैं इस घर में आपकी खुशियों और आपके आत्म-सम्मान की रक्षा करूँगा। यह डायरी हमारी दोस्ती का प्रतीक है, और यह प्रतीक हमेशा पवित्र रहेगा।”
गुरुसेवक के इन शब्दों ने सिमरन के दिल से सारा डर और संकोच मिटा दिया। उनकी आँखों से एक आंसू छलक कर गाल पर आ गया, लेकिन इस बार वह डर का नहीं, बल्कि सुकून का आंसू था।
सिमरन ने डायरी को सीने से लगाया और मुस्कुराई। “तुम सच में बहुत समझदार हो, गुरु। नवजोत को तुम पर बहुत गर्व होगा।”
“और मुझे आपकी तरह समझदार भाभी मिलने पर गर्व है,” गुरुसेवक ने हँसते हुए कहा।

Romantic Kahani एक नया अध्याय और नवजोत की वापसी
दो महीने बीत गए। मार्च का महीना आ गया था।
पटियाला के बागों में फूल खिल चुके थे और मौसम सुहाना हो गया था। उसी हफ़्ते, लेह-लद्दाख से खबर आई कि नवजोत को एक महीने की छुट्टी मिल गई है और वे घर आ रहे हैं।
पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई। मम्मी जी ने मिठाइयाँ बनवानी शुरू कर दीं, ससुर जी हवेली की सजावट में जुट गए।
जिस दिन नवजोत घर पहुँचे, हवेली का माहौल उत्सव जैसा हो गया। नवजोत अपनी वर्दी में बहुत ही रोबदार और हैंडसम लग रहे थे। उन्होंने घर के सभी बड़ों के पैर छुए, सिमरन को प्यार से देखा और गुरुसेवक को कसकर गले लगा लिया।
“कैसा है मेरे छोटे शेर?” नवजोत ने गुरु की पीठ थपथपाते हुए कहा।
“बिल्कुल बढ़िया, भाई! आपकी बहुत याद आ रही थी,” गुरुसेवक ने मुस्कुराकर कहा।
रात को जब सबने साथ बैठकर खाना खाया, तो नवजोत ने सिमरन के चेहरे पर आई एक नई चमक को महसूस किया। शादी के बाद जब वे गए थे, तब सिमरन थोड़ी सहमी और शांत सी थीं, लेकिन आज वे बहुत ही आत्मविश्वासी, खुश और सहज लग रही थीं।
खाने के बाद, जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए, नवजोत अपने कमरे में आए। सिमरन खिड़की के पास खड़ी थीं। Romantic Kahani
नवजोत उनके पास आए और उनके कंधों पर हाथ रखा। “सिमरन… तुम बहुत खुश लग रही हो। जब मैं गया था, तब मुझे चिंता थी कि तुम इस नए घर में ढल पाओगी या नहीं।”
सिमरन ने नवजोत की तरफ देखा और उनका हाथ थाम लिया। “नवजोत, आपका घर बहुत प्यारा है। और यहाँ मुझे कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ।”
तभी नवजोत की नज़र टेबल पर रखी उस पुरानी चमड़े की डायरी पर पड़ी।
“अरे! यह डायरी… यह तो गुरु के पास भी ऐसी ही एक डायरी है न?” नवजोत ने अचरज से पूछा।
सिमरन ने मुस्कुराकर डायरी उठाई। “हाँ नवजोत, यह मेरी कॉलेज की पुरानी डायरी है जो अटारी में मिली थी। और आपको पता है? आपकी गैरमौजूदगी में गुरु ने मुझे कभी उदास नहीं होने दिया। उसने मुझे मेरी अपनी पसंद, मेरी कला और मेरी शायरी से फिर से जोड़ दिया।”
नवजोत ने डायरी के कुछ पन्ने पलटे। उसमें सिमरन के स्केच और शायरी लिखी थी। नवजोत के चेहरे पर एक बहुत ही सुंदर और गर्व भरी मुस्कान आ गई।
“गुरु बचपन से ही ऐसा है,” नवजोत ने कहा। “वह दिल का बहुत सच्चा और कलात्मक है। सिमरन, मुझे खुशी है कि मेरी अनुपस्थिति में तुम्हें एक ऐसा छोटा भाई और दोस्त मिला जिसने तुम्हारे चेहरे की मुस्कान को खोने नहीं दिया।”
Romantic Kahani in hindi
अगली सुबह, जब सूरज की सुनहरी किरणें हवेली के आँगन में बिखरीं, तो एक बहुत ही खूबसूरत नज़ारा देखने को मिला।
आँगन में बने चबूतरे पर गुरुसेवक बैठा अपना कैनवास रंग रहा था। नवजोत उसके पास खड़े होकर चाय पी रहे थे और उसकी पेंटिंग की तारीफ कर रहे थे। और सिमरन रसोई से गरमा-गरम पराठे लेकर आ रही थीं।
गुरुसेवक ने सिर उठाकर सिमरन को देखा। सिमरन ने मुस्कुराकर उसे इशारा किया- ‘सब ठीक है’।
गुरुसेवक ने अपनी डायरी निकाली और उसके आखिरी पन्ने पर एक नई लाइन लिखी-
“रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते, कुछ रिश्ते समान सोच, इज़्ज़त और रूह के धागों से बुने जाते हैं…”
पटियाला की उस ऐतिहासिक हवेली में, पुरानी डायरी के पन्नों से शुरू हुई यह देवर-भाभी की कहानी किसी आम लव स्टोरी जैसी नहीं थी। यह एक ऐसी अनोखी कहानी थी जिसमें प्यार था, लेकिन वह प्यार वासना का नहीं, बल्कि कला, साहित्य, सम्मान, भाईचारे और अटूट भरोसे का था। एक ऐसा पवित्र बंधन, जो जीवन भर हवेली के आँगन में खिली धूप की तरह चमकता रहने वाला था। Romantic Kahani
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