devar bhabhi romance: हरियाणा के झज्जर जिले का एक गांव। सूरज की पहली किरण के साथ ही हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू, हुक्के की गुड़गुड़ाहट और ढोर-डांगरों (मवेशियों) के गले की घंटियों की आवाज़ घुल जाती थी।
लेकिन इस परंपरागत गांव की आबो-हवा में पिछले दो महीनों से एक नया रंग घुल गया था—और वो रंग था कविता का। devar bhabhi romance
कविता—यानी गांव के सबसे बड़े जमींदार घराने की छोटी बहू। दिल्ली के एक नामी कॉलेज से ग्रेजुएट, रंग एकदम कंचन जैसा गोरा, तीखे नैन-नक्श और ढलती हुई शाम जैसी घनी, काली ज़ुल्फ़ें। devar bhabhi romance
जब वो सूती या रेशमी हरियाणवी सूट पहनकर सिर पर करीने से पल्ला डालती, तो ऐसा लगता मानो शहर का कोई आधुनिक हुस्न गांव की सादगी से रूबरू होने आया हो। उसकी हर चाल में एक नज़ाकत थी, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव। devar bhabhi romance
और दूसरी तरफ था राहुल—कविता का देवर।
तेईस-चौबीस साल का गबरू जवान। छह फीट लंबा कद, कसरती बदन, चौड़ी छाती, धूप में तपा हुआ गंदमी रंग और कंचे जैसी साफ, मासूम आंखें। राहुल का दिल एकदम कांच की तरह साफ था, लेकिन स्वभाव से वह बेहद शर्मीला और अपनी ही धुन में रहने वाला लड़का था।
पूरे दिन खेत-खलिहान, ट्रैक्टर की सर्विसिंग, और ढोरों के चारे-पानी में लगा रहता। गांव की लड़कियां छुप-छुपकर राहुल को देखा करती थीं, पर राहुल ने कभी किसी लड़की की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा था। उसके लिए तो बस उसकी खेती और उसका घर ही दुनिया थी। devar bhabhi romance
लेकिन जब से कविता ब्याह कर इस घर में आई थी, राहुल का चैन-ओ-अमन कहीं खो सा गया था।
कविता सिर्फ खूबसूरत ही नहीं थी, बल्कि उसे नए ज़माने के सोशल मीडिया—खासकर इंस्टाग्राम रील्स बनाने का बेइंतहा शौक था। उसका आईफोन 15 प्रो मैक्स हमेशा उसके हाथ में रहता। कभी वो गांव के पुराने कुएं पर शॉट लेती, तो कभी कोठी की पुरानी सीढ़ियों पर ट्रेडिशनल लुक में वॉक करती।
समस्या यह थी कि कविता के पति यानी राहुल के बड़े भाई (संजय) की पोस्टिंग शहर में एक मल्टीनेशनल कंपनी में थी। वो महीने-दो महीने में एक बार ही गांव आ पाते थे। ऐसे में हवेली में कविता, सासू मां, और राहुल ही रहते थे। सासू मां पूजा-पाठ और गांव की औरतों के साथ गपशप में व्यस्त रहतीं, और कविता के हाथ लगता उसका सीधा-साधा, लंबा-चौड़ा देवर—राहुल!
“राहुलिया… ओ राहुलिया! अरे सुन तो, कित जावै सै इतनी उतावल में?”
रसोई के बाहर से गुज़रते राहुल के कदम ठिठक गए। उसने पीछे मुड़कर देखा। कविता दरवाज़े की चौखट पर खड़ी थी। उसने गहरे नीले रंग का हरियाणवी सूट पहना हुआ था, जिसमें उसकी कमर का हल्का सा मोड़ और निखरी हुई गर्दन साफ झलक रही थी। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर बिखरे हुए थे, जिनसे चमेली के तेल और साबुन की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी।
राहुल ने नज़रें नीची कर लीं। उसकी छाती में दिल धक-धक करने लगा।
“जी भाभी… वो खेत में पानी मोड़न जाना था। ताऊ जी बाट देखैं सैं,” राहुल ने अपनी भारी, लजाती हुई आवाज़ में कहा।

कविता मुस्कुराई। उसकी हंसी में एक अजीब सी खनक थी जो सीधे राहुल के दिल के तार छेड़ देती थी। वो धीरे-धीरे चलकर राहुल के पास आई। उसके पास आते ही वो चमेली की खुशबू राहुल के नथुनों से होती हुई उसके पूरे वजूद में समा गई। devar bhabhi romance
“खेत का काम तो दो घंटे बाद भी हो जाएगा, देवर जी। पहले मेरी एक हेल्प करो,” कविता ने आईफोन उसकी तरफ बढ़ाते हुए अपनी पलकें झझकाईं। “मुझे आज एक रील्स बनानी है… इस नए हरियाणवी रोमांटिक गाने पर। और इसमें मुझे एक देसी गबरू चाहिए। अब तुम बताओ, तुमसे सुथरा (सुंदर) गबरू पूरे गांव में कित पावैगा?”
राहुल का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया। उसने झट से हाथ जोड़ लिए, “ना ना भाभी! मनै बख्श दे! रील्स-वील्स मेरे बस की बात ना सै। गांव के बालक देखेंगे तो चिढ़ावेंगे मनै। कहेंगे—यो देख राहुलिया, भाभी की उंगली पे नाचै सै!”
कविता ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए अपने होंठ भींचे और अपनी पतली उंगली राहुल की चौड़ी छाती पर टिका दी।
उस उंगली के स्पर्श से राहुल के शरीर में एक बिजली सी दौड़ी। उसकी रीढ़ की हड्डी में सिहरन उठ गई।
“अच्छा? अब तू अपनी इस प्यारी भाभी की बात भी टालेगा? देख राहुल, मना मत कर… नहीं तो मैं तेरे बड़े भाई से शिकायत कर दूंगी कि तेरा लाडला छोटा भाई मेरी ज़रा सी बात भी नहीं मानता,” कविता ने मटकते हुए कहा। उसकी आंखों में एक नटखटपन था, लेकिन उसकी आवाज़ का जादू ऐसा था कि राहुल चाहकर भी इंकार नहीं कर पाया।
“ठीक सै भाभी… पर जो कहोगी, चुपचाप कर दूंगा। बस गांव के काका-ताऊ की नज़र ना पड़े,” राहुल ने हार मानते हुए अपनी गर्दन खुजलाई।
कविता खिलखिलाकर हंस पड़ी। “चलो मेरे साथ… आज छत पे शूट करेंगे!”
devar bhabhi romance गोबर का कंडा, हाथ का छुअन और पहली सिहरन
छत पर दोपहर की धूप ढल रही थी। गुलाबी ठंड का मौसम शुरू हो चुका था। छत के एक कोने में उपले (कंडे) थापने के लिए गोबर और भूसे का ढेर लगा हुआ था। सासू मां ने सुबह ही कविता से कहा था कि आज उपले थापने सीख ले, गांव की बहू को ये सब आना चाहिए।
कविता ने इसे भी अपनी रील का कॉन्सेप्ट बना लिया।
“देख राहुल,” कविता ने अपने आईफोन को एक ट्राइपॉड पर सेट करते हुए कहा, “रील का सीन ये है कि मैं गोबर के उपले बना रही हूं, और तू खेत से काम करके आता है। अचानक तेरी नज़र मुझ पर पड़ती है, और तू मेरे हाथ से गोबर छीनकर कहता है—’भाभी, इन मखमली हाथों से ये गंदे काम ना करा कर!’ बस… इतना सा डायलॉग बोलना है। कर लेगा ना?”
राहुल ने सूखी थूक निगली। “भाभी… डायलॉग तो घणा रोमांटिक सै। मेरे से ना बोला जावैगा। मेरी जीभ लपका खा जावैगी!”
“अरे तू कोशिश तो कर मेरे बुद्धू देवर!” कविता ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ पकड़ा और उसे कैमरे के सामने खींच लाई। devar bhabhi romance
जब कविता का मखमली, गरम हाथ राहुल की सख्त, चौड़ी हथेली में आया, तो राहुल की सांसें थम गईं। उसने कविता की तरफ देखा। कविता की नीली कुर्ती के ऊपर से उसकी सुराहीदार गर्दन और गहरी नाभि का हल्का सा अहसास हो रहा था। उसके होंठों पर हल्की सी लिपस्टिक की चमक थी जो शाम की धूप में दमक रही थी।
“चल, रोलिंग… एक्शन!” कविता ने टाइमर ऑन कर दिया और खुद ज़मीन पर बैठकर गोबर से उपला बनाने का नाटक करने लगी।
राहुल चलकर आया। कैमरे के सामने आते ही वह लकड़ी की तरह सख्त हो गया। उसकी आवाज़ गले में ही अटक गई।

“कट! कट! कट!” कविता खड़ी हो गई और हंसते-हंसते उसके पेट पर एक हल्का सा घूंसा मारा। “अरे राहुल! तू प्यार से बोल रहा है या किसी डाकू को धमकी दे रहा है? ‘इन मखमली हाथों से…’ ये लाइन बोलते वक्त तेरी आवाज़ में थोड़ा प्यार, थोड़ी नरमी होनी चाहिए। ऐसे कठोर होकर बोलेगा तो कोई रील नहीं देखेगा।”
“भाभी… मनै आदत ना सै ना ऐसे बोलने की,” राहुल ने लजाते हुए कहा, उसकी नज़रें कविता के भीगे हुए होंठों पर टिक गईं। devar bhabhi romance
“तो मैं सिखाती हूं ना… इधर आ,” कविता उसके और करीब आ गई। इतनी करीब कि राहुल उसकी सांसों की गर्माहट अपनी छाती पर महसूस कर सकता था।
कविता ने राहुल का दाहिना हाथ उठाया और धीरे से उसे अपनी पतली कमर पर रखा।
राहुल का पूरा बदन कांप उठा। उसकी उंगलियां कविता की मखमली सूती कुर्ती के ऊपर से उसकी गर्म कमर को छू रही थीं। राहुल के हाथ की गर्माहट और कड़ापन महसूस करके कविता की सांसें भी एक पल के लिए भारी हो गईं। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
“देख राहुल… जब तू मुझे छुएगा,” कविता ने अपनी आवाज़ को एकदम धीमा, रेशमी और मदहोश कर देने वाला बना लिया, “तो तेरे हाथ में ये अहसास होना चाहिए कि तू किसी कांच की गुड़िया को छू रहा है। तेरी आंखें मेरी आंखों में होनी चाहिए… ऐसे…”
कविता ने राहुल की कंचे जैसी आंखों में सीधे देखा। दोनों की नज़रें मिलीं। छत पर खामोशी छा गई। सिर्फ हवा की सरसराहट और दोनों की तेज़ होती सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
कविता की आंखों में एक अजीब सी कशिश थी—एक ऐसी प्यास जो इस वीरान हवेली में अपने सीधे-साधे, सुडौल देवर को देखकर धीरे-धीरे सुलग रही थी। और राहुल… राहुल तो उस कशिश के समंदर में डूबता जा रहा था। उसे लगा जैसे उसकी देह से आग की लपटें निकल रही हों।
“भाभी…” राहुल के होंठों से बस इतना ही निकला। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी।
“हां राहुल…” कविता ने फुसफुसाते हुए कहा। उसकी नज़रें राहुल के चौड़े, गठीले कंधों से फिसलती हुई उसके भरे हुए होंठों पर आ टिकीं। “बोल ना वो लाइन…”
“इन… इन मखमली हाथों से… यो गंदा काम ना करा कर भाभी,” राहुल ने बेहद गहराई और तड़प से कहा। उसकी उंगलियां खुद-ब-खुद कविता की कमर पर थोड़ी और कस गईं।
कविता की आंखें धीरे से मुंद गईं। उसने एक ठंडी, गहरी सांस ली। राहुल की मर्दानी ताकत और उसकी बेदाग सादगी का यह छुअन कविता के रोंगटे खड़े कर रहा था।
अचानक नीचे से सासू मां की आवाज़ आई, “री कविता! नीचे आ जा बेटी, चाय का बखत हो गया!”
दोनों झटके से अलग हुए। जैसे किसी हसीन ख्वाब से जागे हों। कविता का चेहरा मारे शर्म और उत्तेजना के लाल हो चुका था। उसने झटपट अपना आईफोन उठाया और बिना राहुल की तरफ देखे तेज़ी से नीचे भाग गई।
राहुल वहीं छत पर खड़ा रहा। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसकी कमर पर जहाँ कविता का स्पर्श हुआ था, वहाँ अभी भी एक मीठी सी जलन और गर्माहट बाकी थी।

devar bhabhi romance बारिश की वो सुहानी शाम और कोठी की तनहाई
उस दिन के बाद से दोनों के बीच का माहौल पूरी तरह बदल गया था। वो पहली वाली हिचक अब एक अजीब से रेशमी खिंचाव में बदल चुकी थी। राहुल अब खेत से जल्दी घर लौटने लगा था, और कविता दिनभर इस इंतज़ार में रहती कि कब राहुल घर आए और किसी न किसी बहाने से उसे देखे।
अक्टूबर का महीना बीत चुका था और नवंबर की शुरुआत थी। आसमान में काले-कलूटे बादल घिर आए थे। शाम के चार बजे ही ऐसा लग रहा था जैसे रात हो गई हो। अचानक झमाझम बारिश शुरू हो गई। ठंडी हवा के झोंके हवेली के विशाल आंगन में लगे नीम के पेड़ को झकझोरने लगे।
सासू मां सुबह ही गांव में एक रिश्तेदार की तेरहवीं में गई हुई थीं और बारिश की वजह से वहीं रुक गई थीं। कोठी में सिर्फ दो लोग थे—कविता और राहुल।
बिजली कट चुकी थी। कोठी के बड़े से हॉल में सिर्फ एक दीये की मद्धम रोशनी तैर रही थी।
राहुल खेत से लौटा था। वह पूरी तरह भीग चुका था। उसका सफेद कुर्ता उसके कसरती बदन से चिपक गया था, जिससे उसकी चौड़ी छाती, सुडौल पेट और बांहों की मजबूत मांसपेशियां साफ झलक रही थीं। उसके बालों से पानी की बूंदें टपककर उसकी गर्दन से होती हुई उसकी छाती पर गिर रही थीं।
जब वह आंगन पार करके अंदर हॉल में आया, तो सामने कविता खड़ी थी।
कविता ने सुनहरे-पीले रंग का शिफॉन का सूट पहना हुआ था। दीये की पीली रोशनी में वह किसी जलपरी जैसी लग रही थी। बारिश की ठंडक ने वातावरण को एक मादक महक से भर दिया था।
राहुल को भीगा हुआ देखकर कविता के होंठों पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान आ गई।
“अरे राम! पूरे भीग के आए हो,” कविता आगे बढ़ी। उसके हाथ में एक बड़ा सा तौलिया था। “ऐसे खड़े रहोगे तो ठंड लग जाएगी।”
राहुल ने शर्माते हुए तौलिया लेने के लिए हाथ बढ़ाया, “लाओ भाभी, मैं खुद पोंछ लूंगा।”
लेकिन कविता ने तौलिया उसके हाथ में नहीं दिया। इसके बजाय, उसने तौलिया खोला और राहुल के सिर पर रख दिया। वह अपने छोटे-छोटे, मखमली हाथों से राहुल के भीगे बालों को पोंछने लगी।
कविता की नज़दीकी इतनी ज़्यादा थी कि उसकी सांसों की भाप राहुल के गले को छू रही थी। कविता के भीगे-भीगे इत्र की खुशबू ने राहुल के दिमागी संतुलन को हिलाकर रख दिया।
“भाभी… आप… आप हट जाओ, मैं कर लूंगा,” राहुल ने धीमी आवाज़ में कहा, लेकिन उसके पैरों में हटने की ताकत नहीं थी।
“क्यों हट जाऊं? क्या डर लगता है मुझसे?” कविता ने तौलिए को धीरे-धीरे राहुल की गर्दन पर फेरते हुए कहा। उसकी उंगलियां तौलिए के कपड़े के ऊपर से राहुल की गर्दन की नसों को छू रही थीं।
“डर ना लगता भाभी… पर… पर मन में कुछ-कुछ होवै सै,” राहुल ने अपनी कंचे जैसी मासूम और सच बोलने वाली आंखों से कविता की तरफ देखा।
कविता का दिल ज़ोर से धड़क उठा। “क्या होता है राहुल?”
“ऐसा लागै सै… जैसे इस पूरे संसार में बस आप हो और मैं हूं। ऐसा लागै सै कि मैं आपको देखता ही रहूं… और जो छुअन छत पे हुआ था, वही अहसास दोबारा हो जावै,” राहुल की आवाज़ में एक मर्दानी तड़प और बेपनाह कशिश थी।
कविता की सांसें रुक गईं। राहुल की इस बेबाक, मासूम और बेहद गर्म स्वीकारोक्ति ने उसके भीतर छिपी सारी बंदिशों को तोड़ दिया। वह अपने पति की दूरियों से तंग आ चुकी थी, और सामने खड़ा था यह खूबसूरत, ताकतवर देवर—जो उससे बेइंतहा प्यार कशिश महसूस कर रहा था।
कविता ने तौलिया नीचे गिरा दिया।
उसने अपने दोनों हाथ राहुल के चौड़े, भीगे हुए कंधों पर रख दिए। उसकी मखमली उंगलियां राहुल के गीले कुर्ते के ऊपर से उसकी छाती की कसरती मांसपेशियों को महसूस करने लगीं।
“राहुल…” कविता की आवाज़ कांप रही थी, “आज कोई रील नहीं बन रही। आज कोई कैमरा नहीं है। आज जो है… वो सिर्फ तुम हो और मैं हूं।”
राहुल ने अपनी गहरी सांस खींची। उसने हिम्मत करके अपने दोनों बड़े, मजबूत हाथ कविता की पतली कमर पर रख दिए। इस बार कोई झिझक नहीं थी, कोई हिचकिचाहट नहीं थी। राहुल के हाथों का कड़ापन और गर्माहट कविता की कमर में सिहरन बनकर फैल गई।
“भाभी… आप घणी सुथरी लागो सै। इतनी सुथरी कि मेरा ईमान डोल जावै सै,” राहुल ने कविता की आंखों में आंखें डालकर कहा।
कविता ने अपनी एक उंगली राहुल के होंठों पर रख दी। “तो डोला लो अपना ईमान, राहुल… किसने रोका है?”

devar bhabhi romance मोमबत्ती की रोशनी और रेशमी अहसास
उस मद्धम रोशनी में, बाहर गिरती बारिश की टप-टप और अंदर सुलगती हुई दो देहों की गर्माहट ने कोठी के उस कोने को स्वर्ग बना दिया था।
कविता ने धीरे से राहुल का चेहरा अपने दोनों हाथों में भर लिया। उसकी उंगलियां राहुल की दाढ़ी के हल्के-हल्के कांटों को सहलाने लगीं। राहुल ने अपनी आंखें मूंद लीं। वह इस अहसास को अपने रोम-रोम में उतार लेना चाहता था।
कविता थोड़ा उचकी और अपने गर्म, मखमली होंठ राहुल के गाल पर टिका दिए।
एक बिजली सा झटका राहुल के पूरे वजूद में लगा। उसके हाथ खुद-ब-खुद कस गए और उसने कविता को पूरी तरह अपनी छाती से चिपका लिया। कविता के सुमेरु पर्वत राहुल की सख्त छाती से जा टकराए। दोनों की सांसें एक-दूसरे में उलझ गईं।
“अहह… राहुल,” कविता के मुंह से एक धीमी सी कराह निकली। राहुल की मर्दानी ताकत का अहसास उसे एक अलग ही दुनिया में ले जा रहा था।
राहुल ने अब खुद पहल की। उसने अपनी उंगलियों से कविता के सुनहरे शिफॉन के दुपट्टे को उसके कंधों से नीचे सरका दिया। दुपट्टा सरककर फर्श पर गिर गया। अब कविता का गला और उसके नीचे का हिस्सा दीये की रोशनी में चमक रहा था।
राहुल ने अपनी गर्दन झुकाई और अपने होंठ कविता की गर्दन के उस नाज़ुक हिस्से पर रख दिए जहां उसकी धड़कन तेजी से चल रही थी।
“ओह… राहुलिया…” कविता ने अपना सिर पीछे की तरफ गिरा दिया। उसकी उंगलियां राहुल के भीगे बालों में उलझ गईं और वह उन्हें कसकर खींचने लगी। राहुल का हर एक चुंबन, उसकी गर्म सांसें कविता के शरीर में एक मीठा ज़हर घोल रही थीं।
राहुल के हाथ कविता की पीठ पर फिसल रहे थे। शिफॉन की कुर्ती के नीचे से उसकी गर्म, चिकनी त्वचा का अहसास राहुल को बहका रहा था। उसने कविता को अपनी बांहों में उठाया। कविता ने बिना किसी झिझक के अपनी दोनों टांगें राहुल की कमर के इर्द-गिर्द लपेट लीं।
राहुल उसे लेकर हॉल में बिछे बड़े से सोफे पर आ गया। उसने कविता को फूलों की तरह सोफे पर लिटाया और खुद उसके ऊपर झुक गया।
बाहर बारिश का वेग और तेज हो गया था। बादलों की कड़क के साथ ही हॉल का दीया बुझ गया, और सिर्फ खिड़की से आती हुई हल्की सी सफेदी में दोनों के साए एक-दूसरे में समाने लगे।
कविता ने राहुल के भीगे कुर्ते के बटन एक-एक करके खोल दिए। जैसे ही राहुल की चौड़ी छाती कविता के पेट से छुई, दोनों के मुंह से एक साथ एक गहरी सांस निकली।
“राहुल… तुम कितने खूबसूरत हो,” कविता ने उसकी छाती पर अपने होंठ रखते हुए फुसफुसाया।
“आपसे ज़्यादा ना भाभी… आप तो मेरी रूह में बस गई हो,” राहुल ने कविता के होंठों को अपने होंठों के घेरे में ले लिया।
यह उनका पहला असली किस था। कोई रील नहीं, कोई नाटक नहीं। एक गहरा, रसीला और तृप्त कर देने वाला किस। कविता ने अपने होंठ पूरी तरह खोल दिए और राहुल के रसीले स्वाद को पीने लगी। दोनों की ज़ुबानें आपस में उलझ गईं। राहुल का हाथ कविता की कुर्ती के अंदर दाखिल हुआ और उसकी कमर के उभारों को सहलाते हुए ऊपर की तरफ बढ़ने लगा।
कविता का पूरा शरीर मचल उठा। उसकी कराहें बारिश के शोर में घुलने लगीं। राहुल का हर स्पर्श इतना धीमा, इतना सोफ़्ट लेकिन इतना प्रभावी था कि कविता को लग रहा था जैसे वह पिघलकर पानी हो जाएगी।
उस रात, उस अंधेरी और भीगी कोठी में, मर्यादा और वासना के बीच की वो पतली लकीर मिट चुकी थी। देवर और भाभी के बीच का वो पवित्र, लेकिन दबा हुआ प्यार एक बेहद और खूबसूरत अहसास में बदल चुका था। राहुल ने कविता को वो गर्माहट और तृप्ति दी जिसकी वो बरसों से प्यासी थी, और कविता ने राहुल को एक लड़के से एक मुकम्मल मर्द बना दिया था।

devar bhabhi romance सुबह की पहली किरण और एक नया रिश्ता
सुबह जब बारिश थमी और पूरब से सुनहरी धूप हवेली के आंगन में उतरी, तो मौसम में एक नई ताज़गी थी।
रसोई में चाय उबल रही थी। इलायची और अदरक की महक पूरे घर में फैली हुई थी।
कविता रसोई की स्लैब से टिकी खड़ी थी। उसके चेहरे पर एक अलग ही नूर था—एक अजीब सी संतुष्टि और लालिमा। उसके गले पर हल्के से गुलाबी निशान थे, जो रात की उस हसीन दास्तान की गवाही दे रहे थे।
तभी राहुल रसोई में आया। वह नहा चुका था। उसने साफ-सुथरा कुर्ता-पायजामा पहना हुआ था, लेकिन उसकी आंखों में रात वाली वही गहराई और चमक थी।
राहुल को देखते ही कविता के चेहरे पर एक मीठी सी शर्म छा गई। उसने अपनी नज़रें झुका लीं।
राहुल चुपचाप उसके पास आया। अब उसमें वो पुरानी हिचकिचाहट नहीं थी। उसने बड़े प्यार से अपना हाथ कविता की कमर पर रखा और उसे अपनी तरफ खींच लिया।
“राम-राम भाभी…” राहुल ने उसके कान के पास झुककर अपनी भारी आवाज़ में कहा।
कविता का दिल फिर से दहल उठा। उसने मुस्कुराते हुए अपनी कोहनी से राहुल के पेट में हल्का सा धक्का दिया, “छोड़ो भी… अब क्या सुबह-सुबह भी रील बनानी है?”
राहुल ने कविता का हाथ पकड़ा, उसकी उंगलियों को चूमा और अपनी कंचे जैसी आंखों में असीम प्यार भरकर कहा:
“ना भाभी… अब रील ना बनानी। अब तो ज़िंदगी की असली फिल्म शुरू हुई सै। और इस फिल्म में… यो देवर अपनी भाभी का हमेशा ख्याल रखेगा।”
कविता ने अपना सिर राहुल की चौड़ी छाती पर रख दिया। बाहर चिड़ियों की चहचहाहट हो रही थी, और रसोई में उबलती चाय की भाप में दो दिलों की एक अनकही, मीठी और रसीली दास्तान हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी थी। devar bhabhi romance
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