Devar Bhabhi Love story | Devar Bhabhi Romance
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देवर भाभी से हमसफर तक (Part-2): करवा चौथ का व्रत और वो पहला तूफानी सच, Devar Bhabhi Love story

Devar Bhabhi Love story प्रिय पाठकों, “देवर भाभी से हमसफर तक” कहानी के पार्ट वन को आपने इतना पसंद किया कि, श्ब्दों में उसका धन्यवाद करना मुश्किल है। आपका बहुत बहुत, शुक्रिया। आज हम इसी कहानी का पार्ट-2 लेकर आए हैं, आशा ही नहीं विश्वास है कि यह आपको पसंद आएगा और आप हमें अपना आशीर्वाद और सहयोग प्रदान करेंगे। तो चलिए पढ़ते देवर भाभी से हमसफर तक का पार्ट-2…

सहारनपुर की उन तंग गलियों और समाज के कड़वे तानों से बहुत दूर, नोएडा के सेक्टर-74 की एक बहुमंजिला इमारत की 12वीं मंजिल पर स्थित फ्लैट नंबर 1204 में सुबह की पहली किरण दस्तक दे रही थी।

रसोई से आ रही चाय की सोंधी खुशबू और इलायची की महक पूरे घर में फैली हुई थी। रीमा ने आसमानी रंग की सादी कॉटन की साड़ी पहनी हुई थी, माथे पर लाल सिन्दूर और गले में मंगलसूत्र दमक रहा था। रीमा के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी- एक ऐसा सुकून जो उसे सालों की तन्हाई और घुटती जिंदगी के बाद नसीब हुआ था।

तभी पीछे से आकर मंदीप ने रीमा को अपनी बांहों में भर लिया। मंदीप ने अपना चेहरा रीमा की गर्दन में छिपाते हुए बहुत ही कोमलता से कहा, “गुड मॉर्निंग, मेरी हमसफर!”

रीमा के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। उसने पीछे मुड़कर मंदीप के गाल पर हाथ रखा, “मंदीप… छोड़िए भी, अगर कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?”

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Devar Bhabhi Love story | Devar Bhabhi Romance एआई द्वारा तैयार इमेज

Devar Bhabhi Love story

“कौन देखेगा रीमा? यह हमारा अपना घर है, यहाँ सिर्फ तुम हो और मैं हूँ। और अब तुम्हें मुझसे शर्माने की कोई ज़रूरत नहीं है, तुम मेरी पत्नी हो,” मंदीप ने रीमा की आँखों में देखते हुए पूरे हक से कहा।

तीन महीने पहले जब सहारनपुर में समाज और परिवार ने उनके इस पवित्र रिश्ते पर उंगलियां उठाई थीं, तब मंदीप ने अपनी रीमा भाभी का हाथ थामकर पूरी दुनिया से बगावत कर दी थी। उसने रीमा को सिर्फ अपनी पत्नी का दर्जा ही नहीं दिया, बल्कि उसे वो सम्मान दिया जिसकी वह हमेशा से हकदार थी।

मंदीप अब नोएडा की एक लॉजिस्टिक्स कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर बन चुका था और रीमा के साथ अपनी नई गृहस्थी बसा चुका था। लेकिन वे दोनों यह नहीं जानते थे कि अतीत की कुछ परछाइयां अभी भी उनका पीछा कर रही थीं।

Devar Bhabhi Love story: करवा चौथ की दस्तक और अनपेक्षित मेहमान

कार्तिक का महीना शुरू हो चुका था और दो दिन बाद रीमा का शादी के बाद पहला ‘करवा चौथ’ था। रीमा के लिए यह व्रत बहुत खास था। वह अपने देवर से हमसफर बने मंदीप की लंबी उम्र के लिए पूरे श्रद्धा-भाव से यह व्रत रखना चाहती थी। उसने बाजार से नई लाल बनारसी साड़ी, पूजा की थाली और मेंहदी की कीप खरीद ली थी।

करवा चौथ की पूर्व संध्या (एक दिन पहले की शाम) को मंदीप ऑफिस से जल्दी आ गया था। दोनों मिलकर लिविंग रूम को सजा रहे थे कि अचानक घर की डोरबेल बजी।

मंदीप ने जाकर दरवाज़ा खोला, तो सामने का नजारा देखकर उसके होश उड़ गए। दरवाज़े पर उसके बड़े ताऊ जी (सहारनपुर के बड़े जमींदार) और ताई जी खड़े थे। उनके साथ मंदीप की बड़ी बुआ भी थीं। ये वही लोग थे जिन्होंने सहारनपुर में मंदीप और रीमा की शादी का सबसे ज्यादा विरोध किया था और रीमा को घर से बाहर निकालने का फरमान सुनाया था।

“ताऊ जी… आप?” मंदीप के मुंह से सिर्फ इतना ही निकल पाया।

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ताऊ जी ने बिना कुछ बोले मंदीप को परे धकेला और सीधे घर के अंदर दाखिल हो गए। ताई जी ने जब रीमा के माथे पर मंदीप के नाम का सिन्दूर और गले में मंगलसूत्र देखा, तो उनके चेहरे पर हकीर और गुस्से के भाव आ गए।

रीमा ने पुरानी परंपरा के मुताबिक तुरंत आगे बढ़कर ताई जी और ताऊ जी के पैर छूने की कोशिश की, लेकिन ताई जी ने अपने पैर पीछे खींच लिए।

“रहने दे रीमा! अपने ये पापी हाथ हमारे पैरों से मत लगा। जिस औरत ने अपने ही घर की मर्यादा की धज्जियां उड़ा दीं, देवर को पति बना लिया, उसके हाथ लगाने से हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा!” ताई जी ने बेहद कड़वे लहजे में कहा।

रीमा का हाथ हवा में ही रुक गया। उसकी आँखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

Devar Bhabhi Love story: सम्मान की लड़ाई और मंदीप का बगावती रूप

“ताई जी! अपनी ज़बान को संभालिए!” मंदीप की गरजती हुई आवाज़ से पूरा ड्राइंग रूम गूंज उठा।

मंदीप आगे आया और उसने रीमा को अपने पीछे सुरक्षित खड़ा कर लिया। “आप मेरे घर आए हैं, बुजुर्ग हैं, इसलिए मैं आपका सम्मान कर रहा हूँ। लेकिन अगर आपने मेरी पत्नी रीमा के खिलाफ एक भी गलत शब्द कहा, तो मैं भूल जाऊंगा कि आप मेरे रिश्तेदार हैं।”

ताऊ जी ने अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी, “मंदीप! तेरा दिमाग खराब हो गया है? तू इस औरत के मोहजाल में इतना अंधा हो गया है कि अपने ही खून को आंखें दिखा रहा है? सहारनपुर में पूरा खानदान तेरे नाम पर थूक रहा है। तूने अपने बड़े भाई की इज्जत की नीलामी कर दी!”

“भाई साहब की मौत के बाद जब रीमा इस घर में अकेली घुट रही थी, जब आप सब उसे मनहूस मानकर एक अंधेरे कमरे में कैद कर चुके थे, तब आपका खानदान कहाँ था ताऊ जी?” मंदीप की आँखों में आग थी। “रीमा ने कोई गुनाह नहीं किया है। उसने और मैंने पवित्र रिश्ते को अपनाया है। हमने कानून और ईश्वर की कसम खाकर शादी की है। अगर समाज को हमारा प्यार गलत लगता है, तो भाड़ में जाए ऐसा समाज!”

बुआ जी ने तंज कसते हुए कहा, “बड़ी बातें मत बना मंदीप! कल करवा चौथ है। क्या यह औरत तेरे नाम का व्रत रखेगी? जो औरत अपने पहले पति को खा गई, वो तेरे नाम का सुहाग सजाएगी? यह कलंक है!”

रीमा अब और बर्दाश्त नहीं कर सकी। वह रोते हुए अपने कमरे की तरफ भाग गई और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया।

मंदीप ने बहुत ही कड़े शब्दों में ताऊ जी और रिश्तेदारों से कहा, “आप लोग अभी इसी वक्त मेरे घर से निकल जाइए। मुझे और मेरी पत्नी को आपकी या इस ढोंगी समाज की कोई मंजूरी नहीं चाहिए।”

रिश्तेदार बड़बड़ाते और कोसते हुए वहां से चले गए, लेकिन वे रीमा के दिल पर एक ऐसा गहरा जख्म छोड़ गए थे जो फिर से हरा हो चुका था।

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Devar Bhabhi Love story: बंद कमरा, आंसू और जज्बाती तूफान

रिश्तेदारों के जाने के बाद मंदीप सीधे अपने बेडरूम की तरफ भागा। दरवाज़ा अंदर से बंद था।

“रीमा! दरवाज़ा खोलो रीमा… मेरी बात सुनो,” मंदीप ने घबराते हुए कुंडी खटखटाई।

अंदर से रीमा के बिलख-बिलख कर रोने की आवाजें आ रही थीं। कुछ देर की मिन्नतें करने के बाद रीमा ने दरवाज़ा खोला। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखें लाल थीं और चेहरे पर वही पुराना खौफ था जो सहारनपुर में रहता था।

रीमा ने रोते हुए मंदीप के सीने पर हाथ मारा, “मंदीप! क्यों किया आपने ऐसा? क्यों शादी की मुझसे? आपके ताऊ जी सही कह रहे हैं, मैं मनहूस हूँ। मेरी वजह से आज आपका पूरा परिवार आपसे अलग हो गया। आप मुझे छोड़ क्यों नहीं देते?”

मंदीप ने बिना एक शब्द कहे रीमा को अपनी मजबूत बांहों में कसकर भींच लिया। रीमा ने छूटने की कोशिश की, लेकिन मंदीप की पकड़ इतनी मजबूत थी कि रीमा का सारा विरोध उसके सीने से सटकर पिघल गया।

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मंदीप ने रीमा के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और उसकी आँखों में सीधे देखा। “रीमा, मेरी तरफ देखो! अगर आज के बाद तुमने खुद को मनहूस कहा, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। तुम मेरी ताकत हो, मेरी जिंदगी हो। जो परिवार मुश्किल वक्त में तुम्हारा साथ न दे सके, वो मेरा परिवार कभी नहीं हो सकता। तुम कल मेरे नाम का करवा चौथ का व्रत रखोगी, और मैं खुद तुम्हें अपने हाथों से पानी पिलाऊंगा।”

रीमा ने मंदीप की आँखों में वो अटूट भरोसा और बेपनाह मोहब्बत देखी। उसने अपना सिर मंदीप के चौड़े सीने पर रख दिया और शांत हो गई। मंदीप की गर्माहट ने उसके दिल के सारे डर को खत्म कर दिया था।

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Devar Bhabhi Love story: चांद की छांव और सुरमई रात का रोमांस

अगले दिन करवा चौथ था। रीमा ने सुबह-सुबह उठकर सरगी खाई और पूरे दिन निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखा। दिनभर की थकान और कल के ड्रामे के बावजूद, शाम होते-होते रीमा के चेहरे पर एक अलौकिक निखार आ गया था।

रात के करीब नौ बजे, रीमा ने लाल रंग की वही बनारसी साड़ी पहनी जो मंदीप उसके लिए लाया था। हाथों में हरी और लाल चूड़ियां, माथे पर बड़ी सी सिन्दूर की रेखा और पाजेब की छन-छन। जब वह तैयार होकर बालकनी में आई, तो मंदीप उसे देखता ही रह गया।

आसमान में पूनम का चांद धीरे-धीरे बादलों की ओट से बाहर निकल रहा था।

रीमा ने हाथ में छलनी ली। उसने पहले छलनी से चमकते हुए चांद को देखा, और फिर धीरे से छलनी का रुख अपने हमसफर मंदीप के चेहरे की तरफ मोड़ दिया। दीपक की मद्धम लौ में मंदीप का चेहरा किसी देवता जैसा लग रहा था। रीमा की आँखें श्रद्धा और प्यार से भर गईं। उसने मंदीप के पैर छुए।

मंदीप ने तुरंत रीमा को उठाया और पानी का लोटा उठाकर पहले उसे पानी पिलाया और फिर मिठाई का एक टुकड़ा उसके मुंह में डाला। रीमा ने भी मंदीप को मिठाई खिलाई।

“व्रत पूरा हुआ मेरी पत्नी जी?” मंदीप ने रीमा की पतली कमर में हाथ डालते हुए मखमली आवाज में पूछा।

“हाँ… अब मेरा व्रत भी पूरा हुआ और मेरी जिंदगी भी,” रीमा ने शर्माते हुए अपनी नजरें झुका लीं।

मंदीप ने रीमा को अपनी बांहों में उठाया और बालकनी से सीधे बेडरूम के अंदर ले आया। उसने पैर से दरवाज़ा बंद कर दिया। कमरे में केवल एक डिम नाइट-लैंप जल रहा था, जिसकी हल्की गुलाबी रोशनी पूरे माहौल को सम्मोहक बना रही थी।

मंदीप ने रीमा को बहुत ही कोमलता से बेड पर लिटाया। रीमा की पाजेब की छनछनाहट सन्नाटे को संगीत दे रही थी। मंदीप रीमा के ऊपर झुका। उसकी सांसें रीमा के होंठों से टकरा रही थीं।

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“रीमा… आज मुझे महसूस हो रहा है कि तुम सिर्फ मेरी पत्नी नहीं हो, मेरी रूह का हिस्सा हो,” मंदीप ने फुसफुसाते हुए कहा।

मंदीप ने धीरे से रीमा के माथे पर सजे सिन्दूर को अपने होंठों से छुआ। फिर उसकी आँखें, उसके गाल और फिर रीमा के रसीले, कांपते हुए होंठों को अपने होंठों की गिरफ्त में ले लिया। यह चुंबन केवल शारीरिक आकर्षण नहीं था, यह दो ऐसी आत्माओं का मिलन था जिन्होंने समाज की हर कड़वाहट को अपने प्यार के मीठे जल से धो डाला था।

रीमा ने अपनी दोनों बाहें मंदीप की गर्दन में डाल दीं और खुद को पूरी तरह अपने हमसफर को सौंप दिया। मंदीप की उंगलियां रीमा की साड़ी के पल्लू को खिसकाते हुए उसकी मखमली पीठ पर रेंगने लगीं। कमरे में सिर्फ हीटर की गर्माहट और उन दोनों की तेज होती सांसों की सरसराहट गूंज रही थी। उस चांद की रोशनी में, बंद कमरे के भीतर, देवर-भाभी से हमसफर बने उन दो दिलों का वो सभ्य, गहरा और रोंगटे खड़े कर देने वाला रोमांस अपनी मुकम्मल ऊंचाइयों को छू रहा था।

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Devar Bhabhi Love story: जीत प्यार की

अगली सुबह जब धूप कमरे में आई, तो रीमा मंदीप के सीने पर सिर रखे सो रही थी। मंदीप के हाथ रीमा के बालों में उलझे हुए थे।

कल तक जिस समाज और परिवार के तानों से रीमा डरती थी, आज वह उन सब से बहुत ऊपर उठ चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि जब तक मंदीप का हाथ उसके हाथ में है, दुनिया का कोई भी तूफ़ान उनके इस रिश्ते की नींव को हिला नहीं सकता।

‘देवर-भाभी’ का वो पुराना टैग अब खत्म हो चुका था। अब वे सिर्फ और सिर्फ एक-दूसरे के ‘हमसफर’ थे- एक ऐसा सफर जो इस जन्म से शुरू होकर सात जन्मों तक चलने वाला था। Devar Bhabhi Love story

लेखक- महेश कांत

क्या आपने इस कहानी का पहला भाग पढ़ा है? अगर नहीं तो यहां पढ़ें-

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Xlaila Editor
महेश कांत (Xlaila Editor) पिछले 15 वर्षों से डिजिटल मीडिया से जुडे़ हैं। अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं देने के बाद, वर्तमान में वह एक बड़े मीडिया घराने में बतौर चीफ सब एडिटर (डिजिटल) कार्यरत हैं। खबरों के साथ-साथ दिल को छू लेने वाली कहानियों और जज्बातों को पन्नों पर उतारना उनका पैशन है, और अपने ब्लॉग xlaila पर कहानियों को जीवंत करना उनका हुनर है।
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