Late Life Romanceअक्टूबर की उस गुलाबी ठंड वाली शाम को सोसाइटी के पार्क में गुलमोहर के पत्ते धीरे-धीरे गिर रहे थे। पार्क के कोने वाली वही लकड़ी की पुरानी बेंच, जिस पर हरा पेंट अब जगह-जगह से उखड़ने लगा था, विक्रम का ठिकाना थी।
55 वर्षीय विक्रम—रिटायर्ड बैंक मैनेजर। सफ़ेद होते बाल, आँखों पर मोटा चश्मा, और हाथ में आधी पढ़ी हुई उपन्यास की किताब। तीन साल पहले जब उनकी पत्नी नीता कैंसर से जंग हार गईं, तब से विक्रम की दुनिया सिमटकर इस साढ़े तीन बीएचके के फ्लैट और इस पार्क की कोने वाली बेंच तक रह गई थी। उनका बेटा अमेरिका में अपनी जिंदगी में व्यस्त था। विक्रम के लिए जिंदगी अब बस कट रही थी, जी नहीं जा रही थी। Late Life Romance
“अरे शर्मा जी, आज टहलने का मन नहीं है क्या?”
विक्रम ने नज़र उठाकर देखा। सामने सुनीता खड़ी थीं। 52 वर्ष की सुनीता—सुंदर, शालीन, चेहरे पर एक बेहद आत्मीय मुस्कान, और आँखों में अदम्य जीजीविषा। सुनीता एक आर्ट टीचर थीं। दस साल पहले जब उनके पति ने उन्हें और उनकी नौ साल की बेटी को छोड़ दिया था, तब सुनीता ने अपने दम पर जिंदगी दोबारा बनाई। अब उनकी बेटी बैंगलोर में एक अच्छी कंपनी में जॉब कर रही थी। सुनीता अकेली ज़रूर थीं, पर उदास नहीं। Late Life Romance
विक्रम ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ जवाब दिया, “बस सुनीता जी, आज थोड़ा सुस्ती महसूस हो रही थी। आप ही अपनी वॉक पूरी कर लीजिए।”
सुनीता मुस्कुराईं, “जिंदगी में ठहराव अच्छा है विक्रम जी, लेकिन सुस्ती नहीं। खैर, आज मौसम बदल रहा है, ख्याल रखिएगा।”
सुनीता आगे बढ़ गईं। उनकी साड़ी का आंचल हवा में हल्का सा लहराया और उनके चले जाने के बाद भी उनकी हल्की सी मोगरे की खुशबू हवा में तैरती रही। विक्रम कुछ देर उन्हें दूर तक टहलते हुए देखते रहे। उनके मन में अचानक एक अजीब सा सुकून तैर गया—एक ऐसा अहसास जिसे उन्होंने लंबे समय से महसूस नहीं किया था।

Late Life Romance: बेमौसम बारिश और कुल्हड़ वाली चाय
अगले ही हफ्ते की बात है। शाम के साढ़े छह बज रहे थे। अचानक आसमान पर काले बादल छा गए और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश होने लगी। पार्क में टहल रहे लोग इधर-उधर भागने लगे।
विक्रम भी अपनी किताब को छाती से सटाए पार्क के मुख्य गेट की तरफ भागे। लेकिन बारिश इतनी तेज़ थी कि पार्क के ठीक बाहर बनी ‘काका की चाय की टपरी’ ही एकमात्र सहारा दिखी। विक्रम भागकर टीन की उस छोटी सी छत के नीचे पहुंचे।
वहां पहले से ही सुनीता खड़ी थीं। उनके बाल बारिश की बूंदों से थोड़े भीग गए थे और वे अपने पल्लू से चेहरे को सुखा रही थीं।
“अरे विक्रम जी! आप भी भीग गए?” सुनीता ने अपनी ट्रेडमार्क हंसी के साथ कहा।
“हाँ सुनीता जी, अचानक ही मौसम ने करवट ले ली। लगा नहीं था कि आज बारिश होगी,” विक्रम ने अपनी गीली ऐनक उतारकर अपने रूमाल से पोंछते हुए कहा।
“मौसम बिना बताए आ जाए, तभी तो खूबसूरत होता है,” सुनीता ने हल्के से फुसफुसाते हुए कहा, जैसे खुद से बात कर रही हों।
टपरी वाले काका ने दो कुल्हड़ की अदरक वाली कड़क चाय उनकी तरफ बढ़ा दी।
“काका, हमने तो मँगवाई नहीं?” विक्रम ने कहा।
“मैंने मँगवाई है विक्रम जी। इतनी अच्छी बारिश और गरम चाय… मना मत कीजिएगा,” सुनीता ने एक कुल्हड़ विक्रम की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
दोनों टीन की छत के नीचे खड़े होकर कुल्हड़ से उठते भाप को देखने लगे। बाहर बारिश की बूंदें ज़मीन पर गिरकर मिट्टी की सौंधी खुशबू हवा में घोल रही थीं।
विक्रम ने चाय की पहली चुस्की ली। “अदरक एकदम सही मात्रा में है।”
“है न?” सुनीता ने मुस्कुराकर कहा। “वैसे विक्रम जी, मैंने आपको अक्सर पार्क में अकेले उदास बैठे देखा है। कभी-कभी लगता है जैसे आप अतीत के किसी कमरे में खुद को बंद कर चुके हैं।”
विक्रम थोड़े ठिठके। फिर उन्होंने गहरी सांस ली। “शायद आप सही कह रही हैं। नीता के जाने के बाद… और बेटे के दूर चले जाने के बाद, लगता है जैसे मेरा किरदार इस दुनिया में पूरा हो चुका है। अब बस औपचारिकताएं बाकी हैं।” Late Life Romance
सुनीता ने बड़े ध्यान और आत्मीयता से उनकी बात सुनी। उन्होंने अपना कुल्हड़ नीचे रखा और विक्रम की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “किरदार कभी पूरा नहीं होता विक्रम जी, बस अंक बदल जाते हैं। ५० की उम्र के बाद की जिंदगी कोई ‘समाप्ति’ नहीं है, यह तो वो वक्त है जब आप पहली बार पूरी तरह अपने लिए जी सकते हैं। बिना किसी जिम्मेदारी के दबाव के।”
विक्रम ने सुनीता को देखा। उनके शब्दों में कोई प्रवचन नहीं था, एक सच्चा अहसास था जो सीधे दिल में उतर रहा था। उस ढलती शाम, टीन पर गिरती बारिश की छम-छम के बीच, दो अकेले दिलों ने पहली बार एक-दूसरे की रुह को छुआ था।

Late Life Romance: मुलाकातों का सिलसिला
उस दिन की चाय के बाद दोनों के बीच की झिझक का बांध टूट गया।
अब पार्क में मुलाकातें सिर्फ “नमस्ते” तक सीमित नहीं थीं। शाम ५ बजे ही विक्रम अनजाने में अपना सबसे बेहतरीन कुर्ता पहन लेते, अपने बालों को सलीके से संवारते और पार्क की ओर निकल पड़ते। सुनीता भी अपने कैनवास और रंगों की दुनिया से निकलकर समय पर पार्क पहुँच जातीं।
धीरे-धीरे उनकी बातचीत का दायरा बढ़ने लगा।
एक शाम, पार्क के बोगनविलिया के पौधों के पास टहलते हुए, विक्रम ने मुस्कुराकर पूछा, “सुनीता जी, आपको जगजीत सिंह की ग़ज़लें पसंद हैं?”
सुनीता के चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई। “पसंद? विक्रम जी, जगजीत साहब तो मेरी रूह में बसते हैं! ‘तुमको देखा तो यह ख्याल आया…'”
“…जिंदगी धूप तुम घना साया,” विक्रम ने पंक्ति पूरी की।
दोनों एक साथ हंस पड़े।
आगे के कुछ हफ़्तों में उन्होंने जाना कि दोनों को पुरानी क्लासिक फ़िल्में देखना पसंद है, दोनों को किताबों से प्यार है और दोनों ही अपनी-अपनी जगह बेहद अकेले थे, जो अब एक-दूसरे के साथ में अपनी तन्हाई को भूलने लगे थे।
रविवार की एक दोपहर, सुनीता ने विक्रम को अपने घर पर कॉफ़ी के लिए बुलाया।
सुनीता का घर उनकी शख्सियत की तरह ही जीवंत था। दीवारों पर उनके बनाए हुए खूबसूरत चित्र टंगे थे। एक तरफ बड़ा सा कैनवास था जिस पर एक आधा बना हुआ ढलते सूरज का चित्र था।
“यह घर बहुत जीवंत है सुनीता जी,” विक्रम ने लिविंग रूम में रखी किताबों की अलमारी को देखते हुए कहा। Late Life Romance
“घर ईंटों से नहीं, आपकी सोच से बनता है विक्रम जी,” सुनीता ने कॉफ़ी का मग बढ़ाते हुए कहा।
विक्रम ने कॉफ़ी का मग लिया और दीवार पर लगी एक पेंटिंग के पास गए। “यह पेंटिंग… इसमें जो महिला अकेली समंदर किनारे खड़ी है, यह बहुत खूबसूरत है, लेकिन इसमें एक छुपा हुआ दर्द है।”

सुनीता हैरान रह गईं। उन्होंने कई लोगों को वह पेंटिंग दिखाई थी, सबने रंगों की तारीफ की थी। लेकिन पहली बार किसी ने उस पेंटिंग के पीछे के भाव को पढ़ा था। Late Life Romance
सुनीता मुस्कुराईं, उनकी आँखों के कोनों में हल्की सी नमी तैर गई। “आप इंसानों को भी उतनी ही गहराई से पढ़ते हैं जितना अपनी किताबों को?”
“नहीं,” विक्रम ने धीमी आवाज़ में कहा, “बस आपको समझने की कोशिश कर रहा हूँ।”
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा असहज नहीं था, बल्कि उसमें एक गहरा खिंचाव था। दोनों की नज़रें मिलीं। 55 की उम्र के इस मोड़ पर, जहाँ धड़कनों में कोई उतावलापन नहीं था, वहाँ एक गहरा ठहराव और समर्पण था।

Late Life Romance: दिल का इक़रार और ठहराव भरा रोमांस
दिसंबर का महीना आ चुका था। दिल्ली-एनसीआर की ठंड अब धीरे-धीरे अपने पर पसार रही थी।
विक्रम ने सुनीता को शहर के एक पुराने, हेरिटेज कैफ़े में डिनर के लिए इनवाइट किया। कैफ़े में मद्धम पीली रोशनी थी और कोने में एक पुराना ग्रामोफ़ोन धीमी आवाज़ में 70 के दशक का इंस्ट्रूमेंटल म्यूज़िक बजा रहा था।
सुनीता आज मैरून रंग की सिल्क साड़ी पहनकर आई थीं। कानों में छोटे से झुमके और माथे पर एक छोटी सी काली बिंदी। विक्रम उन्हें देखते ही रह गए।
“आप… आप आज बहुत खूबसूरत लग रही हैं सुनीता जी,” विक्रम के मुंह से सहज ही निकल गया।
सुनीता का चेहरा हल्का सा गुलाबी हो गया। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए कहा, “शुक्रिया विक्रम जी। वैसे आज कोई खास मौका है क्या?”
खाना ऑर्डर करने के बाद, विक्रम ने अपनी जेब से एक छोटा सा मखमली डिब्बा निकाला और टेबल पर सुनीता की तरफ खिसका दिया।
सुनीता ने आश्चर्य से देखा, “यह क्या है?”
“खोलकर देखिए।”
सुनीता ने डिब्बा खोला। उसमें चाँदी की एक बेहद नाज़ुक और खूबसूरत ब्रेसलेट थी, जिस पर एक छोटा सा मोगरे के फूल का डिज़ाइन बना था।
“विक्रम जी… यह…”
विक्रम ने आगे बढ़कर बहुत ही अदब और नर्मी से सुनीता का हाथ अपने हाथों में ले लिया। सुनीता के हाथों की गर्माहट विक्रम की उंगलियों में उतर गई। 50 वर्ष से अधिक उम्र के दो परिपक्व लोगों के हाथ जब मिले, तो उसमें कामुकता से ज़्यादा एक-दूसरे के प्रति सम्मान और साथ निभाने का वादा था। Late Life Romance
यह भी पढ़ें-

“सुनीता जी,” विक्रम ने बहुत ही गंभीर लेकिन भर्राई हुई आवाज़ में कहा। “मेरी जिंदगी का पतझड़ बहुत लंबा रहा है। मुझे लगा था कि अब मेरी जिंदगी में कभी वसंत नहीं आएगा। लेकिन जब से आप आई हैं, मुझे चाय की टपरी भी हसीन लगने लगी है, बारिश की बूंदों में संगीत सुनाई देने लगा है।”
सुनीता की आँखों से एक आंसू छलक कर उनके गाल पर आ गिरा।
विक्रम ने अपनी उंगली से उस आंसू को धीरे से पोंछा। “मैं आपसे कोई शादी का औपचारिक वादा या समाज के तय नियम नहीं मांग रहा। मैं बस अपनी बची हुई जिंदगी के पन्ने आपके साथ लिखना चाहता हूँ। क्या आप मुझे इस दूसरी पारी में अपना हमसफ़र बनने का मौका देंगी?”
सुनीता ने अपने दूसरे हाथ से भी विक्रम के हाथ को थाम लिया। उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान खिली जिसमें बरसों का अकेलापन पल भर में पिघल गया।
“विक्रम जी,” सुनीता ने रोते-मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने जिंदगी से उम्मीद करना छोड़ दिया था। लेकिन आपके साथ बिताया हर लम्हा मुझे बताता है कि प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती। मुझे आपका साथ सहर्ष मंज़ूर है।”
उस कैफ़े के कोने वाले टेबल पर, मद्धम रोशनी में, दोनों ने एक-दूसरे के हाथों को कसकर थाम रखा था। यह कोई तूफानी रोमांस नहीं था, यह दो परिपक्व आत्माओं का एक-दूसरे में विश्राम पाने का अनूठा अहसास था।

Late Life Romance: समाज और एक नई सुबह
अगली सुबह जब धूप खिली, तो पार्क में सब कुछ वैसा ही था, लेकिन विक्रम और सुनीता के लिए दुनिया बदल चुकी थी।
उन्होंने अपने-अपने बच्चों को फोन करके अपने इस रिश्ते के बारे में बताया। शुरुआत में बच्चों को थोड़ी झिझक हुई—कि समाज क्या कहेगा, इस उम्र में क्या ज़रूरत है? लेकिन जब उन्होंने अपने माता-पिता के चेहरों पर बरसों बाद वो सच्ची खुशी देखी, तो वे भी इस रिश्ते के आगे नतमस्तक हो गए।
सोसाइटी के लोग जो कभी छिपकर बातें करते थे, अब उन्हें एक साथ देखकर मुस्कुराने लगे थे।
एक शाम, वही काका की चाय की टपरी थी। हल्की बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी।
विक्रम ने दो कुल्हड़ चाय ली और एक सुनीता की तरफ बढ़ाई।
“याद है सुनीता जी, पहली बार हम यहीं मिले थे?” विक्रम ने कहा।
“बिल्कुल याद है,” सुनीता ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “आपने तो ऐनक पोंछने में ही दस मिनट लगा दिए थे।”
विक्रम हंस पड़े। उन्होंने सुनीता के कंधे पर अपना हाथ रखा, और सुनीता ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सिर उनके कंधे पर टिका दिया।
बारिश की बूंदें गिरती रहीं, चाय का भाप उड़ता रहा, और दोनों बुज़ुर्ग प्रेमी हाथ थामे अपनी जिंदगी की इस सबसे खूबसूरत और ठहराव भरी “दूसरी पारी” का आनंद लेते रहे। प्यार वाकई उम्र का मोहताज नहीं होता; यह तो बस दो सच्चे दिलों की तलाश का नाम है, जो किसी भी मोड़ पर पूरी हो सकती है। Late Life Romance
यह भी पढ़ें-

Jija Sali Love Story: जब जीजा-साली के इश्क ने दिया संतान का सुख, 2 पत्नियों का अनोखा आशियाना
रोजाना लेटेस्ट रोमांटिक कहानी, रियल लव स्टोरी और प्यार का पंचनामा पढ़ने के लिए हमारे फेसबुक पेज को फॉलो/लाइक करें।
यदि आप अपने मोबाइल पर रोजाना लेटेस्ट रोमांटिक कहानी, सच्ची प्रेम कहानी चाहते हैं तो हमारे व्हाटसएप चैनल को फॉलो करें।
💖 Love Calculator 💖
अपने और अपने पार्टनर के नाम से लव परसेंटेज चेक करें!




