Widow Romance Story : romantic stories in hindi
रोमांटिक कहानियां

फौजी की विधवा का बगावती इश्क, ससुराल की बंदिशें, कैसे छोटी जाति के लड़के ने बदली जिंदगी

Widow Romance Story: दिसंबर की एक कड़कड़ाती सर्द दोपहर में पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके से सटी और लुटियंस की सीमा पर बनी ‘प्रताप हवेली’ (जिसे अब एक आलीशान दो-मंजिला कोठी का रूप दे दिया गया था) के ऊँचे-ऊँचे कमरों में सिर्फ़ सन्नाटा तैर रहा था। बाहर बाज़ार की चहल-पहल, गाड़ियों के हॉर्न और लोगों का शोर था, पर इस कोठी के अंदर का माहौल किसी सदि‍यों पुराने संग्रहालय जैसा भारी था। Widow Romance Story

38 साल की रविता अपनी दूसरी मंजिल के कमरे से सटी खुली बालकनी में चुपचाप खड़ी थी। उसके हाथों में भाप उड़ती हुई ग्रीन-टी का कप था, जिसे उसने केवल अपने हाथों को थोड़ी गर्माहट देने के लिए थाम रखा था। उसके बदन पर बिल्कुल सादी, बिना किसी किनारे या बॉर्डर की सफ़ेद-बादामी रंग की सूती साड़ी थी। Widow Romance Story

कानों में कोई झुमका नहीं, गले में कोई मंगलसूत्र नहीं और होठों पर कोई रंग नहीं। 38 की उम्र में भी उसके चेहरे का कुदरती आकर्षण, तीखे नैन-नक्श और त्वचा की रेशमी रौनक़ ढली नहीं थी, पर उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों में एक अजीब सी थकावट और गहरा खालीपन तैर रहा था—एक ऐसा खालीपन, जिसे केवल वही समझ सकता है जिसने अपने हर एक सपने को अपने ही हाथों से तिल-तिल करके दफनाया हो। Widow Romance Story

दो साल पहले जब उसके पति विवेक—फौज में एक बड़े अधिकारी, पुरानी दिल्ली के नामचीन, रसूखदार घराने के वारिस थे, की अचानक एक भीषण कार हादसे में मौत हुई, तो रविता के लिए केवल एक जीवनसाथी का अंत नहीं हुआ था। उसके ससुराल वालों और बिरादरी के दकियानूसी बड़े-बुजुर्गों ने उसी दिन रविता के औरत होने का अंत भी घोषित कर दिया था। Widow Romance Story

ससुराल की कड़ी बंदिशों ने उसे इस विशाल कोठी के एक ठंडे कोने में समेट दिया था। कहने को वह इस करोड़ों की जायदाद और रसूख की मालकिन थी, पर असलियत में वह यहाँ सिर्फ़ एक ‘सभ्य और लाचार विधवा’ का किरदार निभा रही थी—एक ऐसा किरदार जहाँ खुलकर हँसना मना था, सजना-संवरना एक सामाजिक अपराध था और किसी पराए पुरुष की तरफ देखना महापाप माना जाता था।

उसके जीवन का इकलौता मकसद उसका अठारह साल का छोटा भाई, दीपांशु था, जो उसके साथ रहकर दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई कर रहा था।

रविता का एक भूला हुआ शौक था—ऑयल पेंटिंग। शादी से पहले वह कैनवास पर रंगों से ज़िंदगी उकेरती थी। पर पति की मौत के बाद हाथ में रंग-ब्रश पकड़ना भी बिरादरी की नजरों में एक ‘पाप’ घोषित कर दिया गया था। इसलिए कमरे के एक कोने में उसका ईज़ल और कैनवास एक पुराना कपड़ा ओढ़कर धूल फांक रहा था।

तभी सीढ़ियों की तरफ से दीपांशु के भारी जूतों की आवाज़ के साथ एक और अनजान, भारी और आत्मविश्वास से भरी आवाज़ ऊपर आती दिखाई दी। रविता ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और कमरे के दरवाज़े की तरफ देखा।

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Widow Romance Story पुरानी किताबों की महक और एक नई धड़कन

“दीदी! ज़रा यहाँ आइए न, देखिए मैं किससे मिलवाने लाया हूँ!” दीपांशु ने उत्साह से पुकारा।

कमरे में दीपांशु के साथ एक लंबा, छरहरा और गठीले बदन वाला युवक दाखिल हुआ। चौबीस साल का यशवीर—साँवला रंग, तीखे नैन-नक्श, चौड़े कंधे, घने काले बाल और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक व गहराई।

यशवीर दिल्ली विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में गोल्ड मेडलिस्ट था और इन दिनों सामाजिक कुरीतियों और जातिगत भेदभाव पर एक राष्ट्रीय संस्था के लिए शोध कर रहा था। वह दीपांशु का सीनियर भी था और मेंटर भी।

लेकिन इस प्रतिभा के पीछे एक और कड़वी सामाजिक सच्चाई थी—यशवीर उस तथाकथित ‘छोटी जाति’ से ताल्लुक रखता था, जिसे पुरानी दिल्ली और लुटियंस के रूढ़िवादी घरानों में सिर्फ़ दरवाज़े के बाहर तक सीमित रखने की पुरानी परंपरा थी। Widow Romance Story

यशवीर की नज़र जैसे ही कमरे के कोने में ढके हुए एक पुराने कैनवास, बिखरे हुए रंगों की सूखी ट्यूब्स और फिर सफ़ेद साड़ी में खड़ी रविता पर पड़ी, उसकी आँखों में एक पल के लिए गहरा ठहराव आ गया। वह साधारण महिलाओं जैसी नहीं थी; उसकी सादगी में एक राजसी दर्द छिपा था।

“नमस्ते, रविता जी,” यशवीर ने सीधे उनका नाम लेकर अभिवादन किया। उसकी आवाज़ में ‘भाभी जी’ या ‘मैम’ जैसी कोई औपचारिकता या झूठा संकोच नहीं था, बल्कि एक गहरा, सहज सम्मान था।

रविता की पलकें झुक गईं। उसने सालों से अपना नाम किसी अनजान पुरुष के मुँह से इतने आदर के साथ नहीं सुना था। “नमस्ते… आप बैठिए, मैं आप लोगों के लिए चाय भिजवाती हूँ।”

“चाय तो बाद में भी पी लेंगे, रविता जी,” यशवीर ने अपने चेहरे पर एक हल्की मुस्कान लाते हुए कहा। “लेकिन कमरे के उस कोने में ढके हुए इस कैनवास को इस तरह धूल खाने के लिए छोड़ देना… मेरी नज़र में कला और सौंदर्य के साथ सरासर नाइंसाफ़ी है।”

रविता चौंक गई। उसकी धड़कनें अचानक तेज़ हो गईं। सालों से उसकी कोठी में आने वाले रिश्तेदार, बिरादरी के लोग या पंडित सिर्फ़ उसकी ‘किस्मत’, उसकी ‘सफ़ेद साड़ी’ या उसकी ‘लाचारी’ पर बातें करते थे। किसी ने आज तक उसकी कला, उसकी पसंद या उसके वजूद के बारे में बात करने की हिम्मत नहीं की थी।

“अब… अब मैं पेंटिंग नहीं करती,” रविता ने अपनी साड़ी का आंचल उंगलियों में कसकर भींचते हुए कहा।

“क्यों? क्योंकि समाज ने आपसे कहा है कि एक पति के चले जाने के बाद औरत का रंगों से रिश्ता खत्म हो जाता है?” यशवीर ने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में कोई दुस्साहस नहीं था, केवल एक तीखा कटाक्ष और अटूट संवेदना थी। “रंग तो आपके भीतर हैं रविता जी, बस आपने समाज के डर से उन पर सफ़ेदी की चादर ओढ़ ली है।”

रविता का दिल ज़ोर से धड़का। वह कुछ कहना चाहती थी, पर उसके शब्द गले में ही अटक कर रह गए।

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Widow Romance Story दरियागंज की छत और जाड़े की धुंध

दिन बीतते गए। यशवीर का कोठी पर आना-जाना बढ़ने लगा। कभी वह दीपांशु की प्रोजेक्ट फाइल्स के सिलसिले में आता, तो कभी रविता के पति की पेंडिंग पेंशन और कागज़ी कार्रवाइयों में कानूनी मदद करने के बहाने।

धीरे-धीरे रविता और यशवीर के बीच एक अनकहा, रेशमी रिश्ता पनपने लगा। यशवीर जब भी आता, रविता के लिए केवल किताबें ही नहीं लाता, बल्कि कभी दरियागंज की प्रसिद्ध पुरानी किताबों के पन्नों की महक वाला कोई नावेल, तो कभी चाँदनी चौक से खरीदा हुआ असली मुग़लई चमेली का इत्र लाता।

“यह इत्र आपके लिए है,” एक शाम यशवीर ने धीरे से कहा था। “क्योंकि आपके चारों तरफ फैली इस सफेदी की गंध से मुझे नफ़रत है। मैं चाहता हूँ कि आप अपनी खुशबू खुद चुनें।”

दिसंबर की एक बेहद कड़कड़ाती, धुंधली शाम थी। पूरे शहर पर कोहरे की एक मोटी परत जम चुकी थी। बेमौसम की हल्की बूंदाबांदी ने दिल्ली की ठंड को और पैना और बर्फीला बना दिया था। दीपांशु किसी काम से अपने कॉलेज के साथियों के साथ कनॉफ्ट प्लेस गया हुआ था और उसे लौटने में देर होने वाली थी।

कोठी में केवल रविता थी और यशवीर, जो अपनी रिसर्च रिपोर्ट की कुछ कॉपीज देने आया था।

दीपांशु के आने का इंतज़ार करते हुए यशवीर ने छत की तरफ देखा। “रविता जी, चलिए ऊपर छत पर चलते हैं। जाड़े की इस धुंध में दरियागंज और पुरानी दिल्ली का नज़ारा बेहद अलग दिखता है। शायद आपके कैनवास को कोई नया विचार मिल जाए।”

रविता ने पहले तो संकोच किया। बिरादरी के नियमों के अनुसार किसी गैर-मर्द के साथ छत पर जाना मना था, लेकिन यशवीर की आँखों में एक ऐसा सम्मोहन और विश्वास था कि वह न चाहते हुए भी उसके पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

छत पर सन्नाटा था। ठंडी हवा के झोंके रविता की सादी साड़ी को उड़ा रहे थे। दूर जामा मस्जिद के मीनार धुंध में हल्के-हल्के दिखाई दे रहे थे और हवा में कबाब और मुग़लई इत्र की सोंधी खुशबू घुली हुई थी।

रविता ठिठुरने लगी, उसके होंठ ठंड से कांपने लगे। यशवीर ने यह देखा। उसने बिना एक पल गंवाए अपनी गर्म, ऊनी शॉल उतारी और धीरे से रविता के कंधों पर लपेट दी।

शॉल लपेटते वक्त यशवीर की उंगलियाँ रविता की गर्दन और भीगे कंधों से छुपकर गुजर गईं। वह स्पर्श किसी गर्म बिजली की तड़प बनकर रविता की रीढ़ की हड्डी में सरसरा गया।

“यह… यह ठीक नहीं है, यशवीर,” रविता की आवाज़ कांप रही थी। वह एक कदम पीछे हटना चाहती थी, पर उसके पाँव जैसे छत के फर्श से चिपक गए थे।

“क्या ठीक नहीं है, रविता?” यशवीर उसके बिल्कुल करीब आ गया। दोनों के बीच नाममात्र का फ़ासला रह गया था। “अपने ही शरीर की गर्माहट से डरना? या इस बात को स्वीकार करना कि आप आज भी एक जीवित, सुंदर और संवेदनशील स्त्री हैं?”

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Widow Romance Story एक रेशमी छुअन और भावुक क्षण

यशवीर ने अपनी दोनों हथेलियों में रविता का ठंडा पड़ता चेहरा थाम लिया। उसकी चौड़ी, गर्म उंगलियाँ रविता के गालों, उसकी कांपती ठुड्डी और गर्दन पर हौले-हौले सरकने लगीं। रविता ने अपनी आँखें मूँद लीं। तीन साल बाद किसी पुरुष के इस पावन, सम्मानजनक और शिद्दत भरे स्पर्श ने उसके भीतर बरसों से सोई हुई स्त्री को पूरी तरह जगा दिया था।

यशवीर की साँसें गर्म थीं, जो ठंडी हवा में भाप बनकर रविता के गालों से टकरा रही थीं। यशवीर ने अपने अँगूठे के पोर से रविता के निचले होंठ को हौले से छुआ। रविता के मुँह से एक हल्की, रेशमी सी सिसकारी निकली। उसने कांपते हाथों से यशवीर के मजबूत कंधों को थाम लिया।

“तुम… तुम मुझसे चौदह साल छोटे हो यशवीर… और मेरी जाति, मेरा विधवापन… यह समाज…” रविता के शब्द उसकी गहरी साँसों में खोने लगे।

“भाड़ में जाए यह पाखंडी समाज और भाड़ में जाएँ इसकी बनाई जातियाँ!” यशवीर ने बेहद प्यार और शिद्दत से कहा। उसने अपने गर्म होंठ रविता की बंद आँखों पर, फिर उसके गालों पर और फिर धीरे-धीरे उसकी भीगी गर्दन की ढलान पर रख दिए।

रविता का पूरा जिस्म सिहर उठा। यशवीर की उंगलियाँ उसकी पीठ पर सरकने लगीं, जहाँ साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया था। नंगे बदन पर यशवीर की गर्म उंगलियों का दबाव रविता के पूरे वजूद में एक मीठी, अदम्य तड़प भर रहा था। सालों से जमी बर्फ पिघलकर बह रही थी।

यशवीर ने रविता का चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया और अपने होंठ उसके कांपते हुए होठों पर रख दिए। वह चुंबन कोई केवल शारीरिक हवस का खेल नहीं था; वह पुरानी दिल्ली की धुंध में दो अकेली रूहों का एक-दूसरे को मुकम्मल करने का बेहद संवेदनशील, मादक और गहरा प्रयास था।

रविता ने अपनी उंगलियों को यशवीर के घने बालों में फँसा लिया और अपने पूरे वजूद को, अपनी पूरी तृष्णा को यशवीर के हवाले कर दिया। यशवीर का स्पर्श जितना मजबूत था, उतना ही नाजुक भी—वह उसे किसी कांच की कीमती मूरत की तरह अपनी बाहों में भींचे हुए था।

उस धुंधली रात में, कोठी की सुनसान छत पर, दो प्रेमियों के बदन की गर्माहट और साँसों की महक एक-दूसरे में घुलकर एक हो गई।

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Widow Romance Story बिरादरी का पाखंड और करारा प्रहार

लेकिन यह सुकून और यह मिलन ज़्यादा देर तक छिपा नहीं रह सका।

तभी नीचे से सीढ़ियों पर कई लोगों के भारी जूतों की कड़कड़ाती आवाज़ें गूँजने लगीं। रविता के ससुर—ठाकुर वीरेंद्र प्रताप सिंह, उनकी पत्नी और बिरादरी के चार बड़े-बुजुर्ग (जो दिल्ली के रसूखदार और रूढ़िवादी राजनीति के जाने-माने चेहरे थे) अचानक छत पर आ धमके। वे ज़मीन के किसी वसीयतनामा पर दस्तखत कराने के सिलसिले में बिना बताए आ पहुँचे थे।

छत पर यशवीर की बाहों में रविता को देखकर, उसकी बिखरी साड़ी और चेहरे पर छाई लालिमा को देखकर वीरेंद्र प्रताप का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। उनकी आँखें बाहर निकल आईं।

“यह क्या बेहयाई है!” वीरेंद्र प्रताप दहाड़े। “तू इस नीच जात के लड़के के साथ हमारी इस खानदानी कोठी की छत पर यह रंगरेलिया मना रही है?”

बिरादरी के एक बुजुर्ग, पंडित जगन्नाथ ने अपनी छड़ी ज़मीन पर पटकते हुए कड़वाहट से कहा, “महेंद्र जी! हमने तो पहले ही कहा था, इस विधवा बहू को सिर पर मत चढ़ाओ। एक छोटी जात का ढोर-ढोर चराने वालों का लड़का और वह भी उम्र में इससे चौदह साल छोटा… यह तो हमारी बिरादरी के मुँह पर वो कालिख है जो सात जन्मों में नहीं धुलेगी!”

रविता घबराकर पीछे हटने लगी, उसका पूरा शरीर डर से कांप रहा था, लेकिन यशवीर ने उसका हाथ और कसकर थाम लिया। वह आगे आया और उसकी आवाज़ में एक तेज़, कड़ा प्रहार गूँज उठा जो पूरी हवेली में गूँज गया।

“ठाकुर साहब! आपकी इस बड़ी बिरादरी का झूठा गुरूर किस काम का, जो एक बेकसूर औरत के अस्तित्व को ज़िंदा लाश बना दे?” यशवीर ने ललकारते हुए कहा। “आप लोग लुटियंस और पुरानी दिल्ली की बड़ी-बड़ी कोठियों में रहते हैं, खुद को आधुनिक और पढ़ा-लिखा कहते हैं, पर आपकी सोच आज भी मध्यकालीन गटर में पड़ी सड़ रही है!

उम्र का फासला और जाति का फर्क… ये सब आपकी अपनी बनाई हुई सड़ी-गली दीवारें हैं। जब ईश्वर ने हम सबका खून एक रंग का बनाया है, तो आपकी ये ऊँची-नीची जाति की दीवारें सिर्फ इंसानियत को बाँटने का ढोंग हैं! इंसान अपनी जाति से नहीं, अपनी नीयत और अपनी सोच से बड़ा या छोटा होता है!”

“तू नीच होकर हमें ज्ञान देगा? तेरी औकात क्या है?” वीरेंद्र प्रताप ने गुस्से में हाथ उठाया।

तभी रविता, जो अब तक खामोश और सहमी हुई थी, अचानक यशवीर के आगे आकर खड़ी हो गई। उसने अपने ससुर का उठता हुआ हाथ हवा में ही रोक दिया। उसकी आँखों से सालों का डर, लाचारी और झिझक पूरी तरह गायब हो चुकी थी।

“बस कीजिए बाबूजी!” रविता की बुलंद आवाज़ ने सब को सन्न कर दिया।

उसकी सास चिल्लाई, “रविता! होश में है तू? यह क्या कुफ़्र बक रही है?”

“मैं पूरी तरह होश में हूँ माँ जी!” रविता ने कड़वाहट से मुस्कुराते हुए कहा। “दो साल से देख रही हूँ आपकी इस ऊँची बिरादरी का पाखंड! विवेक के जाने से मेरी साँसें तो नहीं रुकी थीं, फिर आप लोगों ने मेरे जीने का हक क्यों छीना?

मुझे हल्के रंगों में लपेटकर, इस बड़े बंगले के एक कोने में ज़िंदा लाश बनाकर क्यों फेंक दिया? ताकि आप लोग विवेक की संपत्ति पर कब्ज़ा कर सकें? अगर आपकी बिरादरी का कोई पचास साल का मर्द अपनी पत्नी के मरते ही बीस साल की लड़की से दूसरी शादी कर सकता है, तो एक स्त्री अपने लिए प्रेम, सम्मान और अपनी पसंद का साथी क्यों नहीं चुन सकती?”

पंडित जगन्नाथ चिल्लाए, “यह हमारी परंपराओं का अपमान है! हमारी बिरादरी में विधवा का दूसरा विवाह या किसी नीच जात के साथ रिश्ता… महापाप है!”

“परंपराएँ?” रविता ज़ोर से हँसी—एक ऐसी हँसी जो सदियों पुरानी रूढ़ियों की छाती पर करारा तमाचा थी। “कैसी परंपराएँ? वो परंपराएँ जो केवल औरतों और कमज़ोरों की गर्दन पर रखी छुरी हैं? आपकी बिरादरी का यह झूठा स्वाभिमान सिर्फ़ एक बेबस औरत का दम घोटना जानता है, किसी का दुख बाँटना नहीं!”

तभी दीपांशु भी सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आ गया। उसने जब यह पूरा माजरा देखा, तो वह बिना एक पल गंवाए अपनी बहन और यशवीर के बगल में आकर खड़ा हो गया। “दीदी बिल्कुल सही कह रही हैं। बाबूजी, आपकी इस झूठी शान के लिए मैं अपनी दीदी की ज़िंदगी फिर से बर्बाद नहीं होने दूंगा।”

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Widow Romance Story आज़ाद उड़ान और नई भोर

वीरेंद्र प्रताप असहाय और अपमानित होकर फुँफकारने लगे। “अगर आज तूने इस कोठी की चौखट लांघी रविता, तो तू हमारे लिए और इस बिरादरी के लिए हमेशा के लिए मर जाएगी! इस लड़के के पास क्या है? न जात, न रसूख, न नाम!”

रविता ने मुड़कर उस बड़ी, चमचमाती लेकिन दम घोटने वाली कोठी को देखा, जिसने उसे दो साल तक घुट-घुटकर जीने पर मजबूर किया था।

“आज मैं इस कोठी को नहीं, बल्कि आपकी इस सड़ चुकी सोच, इस झूठी बिरादरी और इस पाखंडी समाज को पीछे छोड़ रही हूँ,” रविता ने गर्व और बुलंद आवाज़ में कहा। “मुझे ऐसे समाज का हिस्सा नहीं बनना जहाँ इंसान को उसकी जाति और उसकी मजबूरी से परखा जाता हो।”

रविता नीचे गई, उसने अपना एक छोटा सा बैग उठाया, जिसमें उसके कुछ कपड़े और उसकी पेंटिंग्स का सामान था। उसने यशवीर की तरफ देखा। यशवीर ने मुस्कुराकर अपना हाथ आगे बढ़ाया। रविता ने बिना किसी झिझक के, पूरे स्वाभिमान के साथ यशवीर का हाथ थाम लिया।

दीपांशु ने भी अपना बैग उठाया और उनके साथ चल पड़ा।

तीनों उस कोठी के भारी लोहे के दरवाजे को लांघकर बाहर निकल आए।

बाहर दिल्ली की धुंध अब पूरी तरह छँट चुकी थी। सुबह का सुनहरा सूरज आसमान में चमक रहा था। हवा में कड़कड़ाती ठंड तो थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी ताज़गी, आज़ादी और सुकून की महक थी।

अगले ही दिन, दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट में, रविता और यशवीर ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत एक-दूसरे का हाथ थामकर शादी के कागज़ात पर दस्तखत किए।

शादी के बाद, जब वे पुरानी दिल्ली के एक छोटे से लेकिन हवादार और धूप से भरे किराए के घर में पहुँचे, तो रविता ने लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी। उसकी माँग में यशवीर के हाथों से भरा हुआ लाल सिन्दूर चमक रहा था। यशवीर ने उसे अपनी बाहों में कसकर भींच लिया।

रविता ने खिड़की से बाहर चमकते सूरज और उड़ते कबूतरों को देखा। उसने कमरे के कोने में अपना ईज़ल लगाया और एक नए कैनवास पर लाल, पीले और नारंगी रंगों से एक नए सूरज की पेंटिंग बनानी शुरू कर दी।

यह एक नई भोर थी—जहाँ न कोई कोठी का बंधन था, न बिरादरी का पाखंड, न जाति का ज़हर और न उम्र की बेड़ियाँ। वहाँ केवल प्रेम, समानता, कला और एक सच्चा इंसान बनकर जीने की असीम आज़ादी थी। Widow Romance Story

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Mahesh kant Lillu
Mahesh kant Lillu (Xlaila Editor) पिछले 15 वर्षों से डिजिटल मीडिया से जुडे़ हैं। देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं देने के बाद, वर्तमान में वह एक बड़े मीडिया घराने में बतौर चीफ सब एडिटर (डिजिटल) कार्यरत हैं। खबरों के साथ-साथ दिल को छू लेने वाली कहानियों और जज्बातों को पन्नों पर उतारना उनका पैशन है, और अपने ब्लॉग xlaila पर कहानियों को जीवंत करना उनका हुनर है।
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