devar bhabhi romance सहारनपुर के एक शांत और प्रतिष्ठित रिहाइशी इलाके में बना ‘वर्मा हाउस’ बाहर से तो एक बेहद खुशहाल और पारंपरिक परिवार का प्रतीक था, लेकिन उसके भीतर एहसासों, अधूरी चाहतों और जिम्मेदारियों का एक बहुत बड़ा समंदर बहता था। devar bhabhi romance
छत्तीस साल की रवीना इस घर की बड़ी बहू थी। छह साल पहले बड़ी धूमधाम और गाजे-बाजे के साथ उसका इस घर में आगमन हुआ था। शादी के बाद का दो साल का वक्त किसी हसीन सपने की तरह गुज़रा, लेकिन फिर किस्मत ने एक ऐसा क्रूर मोड़ लिया कि बीमारी के चलते उसके पति का देहांत हो गया। devar bhabhi romance
पति की असामयिक मृत्यु के बाद रवीना के सामने पूरी जिंदगी पहाड़ की तरह खड़ी थी। रिश्तेदारों ने तरह-तरह की बातें बनाईं, लेकिन रवीना ने मायके लौटने के बजाय अपने ससुराल को ही अपना असली घर माना और पिछले चार सालों से अपनी पूरी लगन, त्याग और प्यार से इस परिवार को संभाले रखा। वह सहारनपुर के सबसे बड़े शॉपिंग मॉल में एक ज़िम्मेदार पद पर स्टोर मैनेजर का काम करती थी। devar bhabhi romance
घर में उसके साथ उसका 28 साल का देवर राघव और उसकी 24 साल की पत्नी मोनिका रहते थे। राघव एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के रीजनल ऑफिस में काम करता था। वह स्मार्ट, जिम्मेदार, लेकिन मिज़ाज से बेहद चुलबुला और जिंदादिल इंसान था।
वहीं उसकी पत्नी मोनिका एक सीधी-सादी, बेहद सुंदर लेकिन घरेलू महिला थी, जो सुबह से शाम तक रसोई, घर की सफाई और बाकी ज़िम्मेदारियों में रमी रहती थी। तीनों के बीच कहने को तो बहुत सम्मान, अपनापन और गहरा प्यार था, लेकिन रवीना की आँखों के पीछे छिपा अकेलापन राघव से कभी छुप नहीं पाता था।
एक दिन, मॉल के कॉर्पोरेट हेडक्वार्टर से रवीना के पास इमरजेंसी कॉल आई। शिमला के नए खुले आउटलेट में कुछ ऑडिट और इवेंट मैनेजमेंट का काम था, जिसके लिए रवीना का वहां जाना बेहद जरूरी था। इत्तेफाक से सहारनपुर में मंगलवार को साप्ताहिक बाज़ार बंद रहता है, जिसके कारण राघव के ऑफिस की भी मंगलवार को छुट्टी होती थी। devar bhabhi romance
मंगलवार की सुबह चाय की चुस्कियां लेते हुए राघव ने कहा, “भाभी, आप अकेले बस या टैक्सी की धक्केबाज़ी में क्यों परेशान होंगी? आज बाज़ार बंद है, मेरी ऑफिस की पूरी छुट्टी है। मैं अपनी कार से आपको शिमला छोड़ देता हूँ। दिन में आपका ऑडिट का काम निपट जाएगा और शाम तक हम आराम से सहारनपुर वापस आ जाएँगे।”
मोनिका ने नाश्ते की प्लेट टेबल पर रखते हुए मुस्कुराकर कहा, “हाँ दीदी, राघव बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। इतनी ठंड और कोहरे में आपका अकेले जाना ठीक नहीं रहेगा। राघव साथ रहेंगे तो मुझे भी तसल्ली रहेगी।”
रवीना ने मन ही मन थोड़ा संकोच किया, पर राघव के चेहरे की सहजता और ज़िद के आगे वह मना न कर सकी। सुबह आठ बजे राघव और रवीना कार से शिमला के लिए रवाना हो गए।

devar bhabhi romance शिमला की बर्फीली धुंध और पिघलती सीमाएं
सहारनपुर के मैदानी इलाके को पीछे छोड़ते हुए कार जैसे-जैसे पहाड़ों की घुमावदार सड़कों पर चढ़ने लगी, ठंड का अहसास तीखा होता गया। राघव कार चला रहा था और बगल की सीट पर बैठी रवीना खिड़की से बाहर छंटते कोहरे और चीड़ के पेड़ों को देख रही थी। दोनों के बीच हल्की-फुल्की बातें हो रही थीं, लेकिन समय का पता ही नहीं चला और दोपहर तक वे शिमला के प्रतिष्ठित मॉल रोड पहुँच गए।
रवीना तुरंत अपने काम में जुट गई। मॉल के आउटलेट में स्टॉक चेकिंग, फाइलों का निपटारा और स्टाफ की मीटिंग लेते-लेते शाम के सात बज गए। इसी बीच बाहर मौसम ने अचानक ऐसा खौफनाक रुख अख्तियार किया कि आसमान से बर्फ के मोटे-मोटे फाहे गिरने लगे।
देखते ही देखते मॉल रोड और नेशनल हाईवे पर बर्फ की मोटी चादर बिछ गई। जगह-जगह पहाड़ों से मलबा और लैंडस्लाइड होने के कारण पुलिस ने रात के लिए यातायात पूरी तरह रोक दिया।
कार में वापस लौटकर राघव ने जब गाड़ी स्टार्ट करने की कोशिश की, तो पुलिसकर्मी ने आकर साफ मना कर दिया, “सर, आगे रास्ता बंद है। आज रात गाड़ियों का जाना नामुमकिन है। आप पास में ही कहीं रुकने का इंतज़ाम कर लीजिए।”
रवीना घबरा गई, “राघव! अब क्या होगा? घर पर मोनिका अकेली है और हम यहाँ फंस गए।”
“भाभी, आप घबराइए मत। मैं अभी मोनिका को फोन करके बता देता हूँ और यहीं मॉल रोड के पास कोई सुरक्षित होटल देख लेता हूँ,” राघव ने बेहद शांत लहजे में रवीना का हाथ थामते हुए कहा।
राघव ने मोनिका को फोन करके सारी स्थिति समझाई। मोनिका ने भी उन्हें ठंड में परेशान होने के बजाय होटल में रुकने की सलाह दी। लेकिन असली मुसीबत तब शुरू हुई जब भारी बर्फबारी के कारण शिमला के लगभग सारे होटल सैलानियों से फुल हो चुके थे। काफी मशक्कत और सिफारिशों के बाद मॉल रोड की एक संकरी गली में बना एक छोटा, बुटीक वुडन कॉटेज होटल मिला।
होटल के मैनेजर ने चाबी टेबल पर रखते हुए कहा, “सर, सिर्फ एक ही डीलक्स सूट खाली है। दूसरा कोई रूम नहीं है।”
मजबूरी में दोनों को उसी एक कमरे में रुकना पड़ा।
कमरे का दरवाज़ा खोलते ही लकड़ी के फ़र्श और इंटीरियर से एक अजीब सी गर्माहट महसूस हुई। कमरे के एक कोने में बना पारंपरिक फायरप्लेस (अलाव) जल रहा था, जिसकी पीली और लाल लपटें कमरे के माहौल को बेहद सुकूनदेह बना रही थीं। बाहर माइनस डिग्री की कड़कड़ाती ठंड थी और खिड़की के शीशों पर बर्फ जम रही थी।
रवीना ठंड के मारे थर-थर कांप रही थी। उसके गाल और नाक की नोक गुलाबी हो चुकी थी। उसने अपने हाथ अलाव की लपटों के पास किए।
राघव ट्रे में दो गर्म-गर्म कॉफी के मग लेकर उसके करीब आया। “लीजिए भाभी, यह पीजिए। थोड़ा शरीर में गर्मी आएगी।”
कप थमाते वक्त राघव की उंगलियां रवीना की ठंडी और कांपती उंगलियों से छू गईं। उस एक सेकंड के स्पर्श ने दोनों के शरीर में बिजली की एक सिहरन पैदा कर दी। रवीना ने नज़रें उठाईं। अलाव की मद्धम, थरथराती रोशनी में रवीना का सादा चेहरा, उसकी कजरारी आँखें और खुले हुए भीगे बाल किसी हसीन पेंटिंग की तरह लग रहे थे। बत्तीस-छत्तीस की उम्र में भी उसके बदन की बनावट और उसकी सादगी में एक असीम कशिश थी।
राघव ने देखा कि रवीना की आँखों में एक गहरा दर्द और अकेलापन तैर रहा था। वही अकेलापन जिसे उसने इस घर की जिम्मेदारियों के पीछे पिछले चार सालों से छुपा कर रखा था।
“भाभी…” राघव की आवाज़ में एक अजीब सा लोच और अहसास था। “आपने इस घर के लिए, हमारे लिए अपनी जवानी, अपनी खुशियां और अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी। कभी-कभी जब मैं आपको इस बड़ी कोठी में अकेले मुस्कुराते हुए देखता हूँ, तो मेरा दिल अंदर तक रो देता है।”
रवीना की पलकों से एक आँसू ढुलक कर उसके गाल पर आ गिरा। “राघव… जब कोई इंसान जिंदा लाश बन जाए और दुनिया उसे सिर्फ एक ‘जिम्मेदारी’ समझे, तो अकेलापन सहना आदत बन जाता है।”
“नहीं भाभी, आप कोई जिम्मेदारी नहीं हैं… आप एक इंसान हैं,” राघव ने बिना किसी हिचकिचाहट के आगे बढ़कर अपने हाथों से रवीना के गाल पर गिरे आँसू को पोछा।
उसकी उंगलियों का गर्म स्पर्श रवीना के पूरे जिस्म में पिघलने लगा। रवीना ने अपनी आँखें मूँद लीं। राघव की चौड़ी छाती की गर्माहट और उसकी साँसों की महक रवीना के बिल्कुल करीब थी। चार सालों से दबा हुआ नारीत्व, प्यार की भूख और तड़प एक झटके में बंदिशों की दीवार तोड़कर बाहर आ गई।
“राघव…” रवीना के मुँह से केवल एक कांपती हुई सिसकारी निकली।
राघव ने बेहद आदर, संवेदना और शिद्दत के साथ रवीना को अपनी बाहों में भर लिया। वह स्पर्श किसी वासना या हवस का नहीं था, बल्कि दो भूखी और तड़पती आत्माओं का एक-दूसरे में विलीन होने का संवेदी अहसास था। राघव ने अपने होंठ रवीना के माथे पर रखे, फिर उसके गालों से होते हुए उसके कांपती पंखुड़ियों जैसे होठों पर अपने होंठ रख दिए।
उस बर्फानी रात में, शिमला के उस छोटे से होटल के कमरे में अलाव की आग जितनी तेज़ जल रही थी, उससे कहीं ज़्यादा तेज़ आग उन दोनों के सीने में जल रही थी। साड़ियों के पल्लू खिसक गए, दूरियां मिट गईं और सालों की जमी हुई बर्फ पिघलकर बह गई। राघव की मजबूत बाहों में रवीना ने अपने औरत होने के पूरे वजूद को महसूस किया। वह रात दोनों के लिए एक नई दुनिया की शुरुआत बन गई।

devar bhabhi romance खामोश वापसी और गुप्त रातों का सिलसिला
अगले दिन सुबह होते ही रास्ता साफ हो गया। धूप खिलने पर राघव और रवीना कार से सहारनपुर के लिए निकल पड़े। पूरे रास्ते दोनों के बीच एक अनकहा सन्नाटा था—एक ऐसा सन्नाटा जिसमें कोई पछतावा नहीं था, बल्कि एक गहरा, रेशमी खिंचाव था।
घर पहुँचकर सब कुछ बेहद सामान्य तरीके से बीता। मोनिका ने उनका स्वागत किया, गरमा-गरम खाना खिलाया और दोनों अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। रवीना मॉल चली गई और राघव ऑफिस। दिन के उजाले में दोनों के बीच वही मर्यादा, वही ‘देवर-भाभी’ का औपचारिक रिश्ता कायम था।
लेकिन जब रात का अंधेरा पूरे सहारनपुर पर छा गया और घड़ी में दो बजे, तो उस हवेली की खामोशी में एक अजीब सा तनाव उमड़ने लगा।
रवीना अपने कमरे में अकेली लेटी हुई थी। उसके बदन में शिमला की उस रात का स्पर्श, राघव के होठों की गर्माहट और उसकी उंगलियों की सरसराहट अब भी दौड़ रही थी। चार साल की प्यास एक रात में बुझने वाली नहीं थी; बल्कि उसने तो एक नए अहसास को जन्म दे दिया था। रवीना का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, उसकी सांसें उखड़ रही थीं। devar bhabhi romance
उसने अपने बिस्तर पर करवट बदली, फिर कांपते हाथों से अपना मोबाइल उठाया। उसने राघव के नंबर पर एक छोटा सा टेक्स्ट मैसेज टाइप किया:
“जाग रहे हो? अगर मुमकिन हो तो क्या दो मिनट के लिए ऊपर आ सकते हो?”
नीचे के कमरे में लेटे राघव का फोन हल्का सा वाइब्रेट हुआ। उसने देखा कि बगल में मोनिका गहरी नींद में सो रही थी। राघव ने मैसेज पढ़ा। उसका दिल भी उसी तड़प से धड़क रहा था। उसने धीरे से चादर हटाई, नंगे पैरों से दरवाज़ा खोला और सीढ़ियां चढ़कर ऊपर रवीना के कमरे में पहुँच गया।
जैसे ही राघव ने कमरे के अंदर कदम रखा और दरवाज़ा बंद किया, रवीना ने बिना कुछ कहे आगे बढ़कर राघव के गले में अपनी बांहें डाल दीं।
“राघव… मैं खुद को रोक नहीं पा रही हूँ,” रवीना की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी और मिठास थी।
“मुझे रोकने की ज़रूरत भी नहीं है भाभी,” राघव ने उसे अपनी बाहों में भींचते हुए कहा।
उस रात, बिना किसी शिमला के बहाने और बिना किसी मजबूरी के, दोनों ने एक-दूसरे के समर्पण को स्वीकार किया। यह गुप्त सिलसिला वहीं नहीं रुका। आने वाले तीन महीनों तक यह खेल यूँ ही चलता रहा। दिन में रवीना एक कड़क स्टोर मैनेजर और घर की सीधी-सादी जेठानी होती, राघव एक जिम्मेदार देवर और पति होता, लेकिन रात के सन्नाटे में, जब पूरी दुनिया सो जाती, दोनों एक-दूसरे की बाहों में अपनी अलग दुनिया बसा लेते।
devar bhabhi romance आधी रात का धमाका और उजागर सच
तीन महीने बीत चुके थे। यह रिश्ता अपनी पूरी रफ़्तार से चल रहा था, लेकिन पाप या राज़ चाहे कितना भी छुपाया जाए, एक न एक दिन वह सामने आ ही जाता है।
मार्च का महीना था। रात के लगभग ढाई बज रहे थे। नीचे वाले बेडरूम में सो रही मोनिका की आँख अचानक प्यास के मारे खुल गई। उसने साइड टेबल पर रखा जग देखा तो वह खाली था। उसने घूमकर देखा, लेकिन बेड पर राघव गायब था।
मोनिका को लगा कि शायद वह वॉशरूम गया होगा या नीचे रसोई में पानी पीने गया होगा। वह उठी और किचन की तरफ गई, लेकिन वहां अंधेरा था।
अचानक उसकी नज़र ऊपर जाने वाली सीढ़ियों पर पड़ी। ऊपर रवीना के कमरे के दरवाज़े के नीचे से हल्की सी पीली रोशनी छनकर बाहर आ रही थी और दरवाज़ा हल्का सा अधखुला था। मोनिका को लगा कि शायद दीदी की तबियत खराब है और राघव वहां दवा देने गया होगा।
मोनिका दबे पाँव सीढ़ियां चढ़ी। जैसे ही उसने रवीना के कमरे के उस अधखुले दरवाज़े के पास जाकर अंदर झांका, उसकी नज़रों के सामने जो नज़ारा था, उसने उसकी पूरी दुनिया हिलाकर रख दी। उसके हाथों से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा और उसके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई।
कमरे के अंदर, डिम लाइट की रोशनी में राघव और रवीना एक-दूसरे की आगोश में सिमटे हुए सो रहे थे। दोनों का यह नज़दीकी और अंतरंग रूप देखकर मोनिका के होश उड़ गए।

मोनिका का दिल दहल गया। गुस्से, दुख और धोखे के अहसास से उसकी आँखें भर आईं। वह अब अपने आप पर काबू न रख सकी और झटके से दरवाज़ा पूरा खोलकर कमरे में दाखिल हुई।
“राघव!! दीदी!!” मोनिका की चीख से पूरा कमरा गूँज उठा।
चीख सुनते ही राघव और रवीना हड़बड़ाकर उठे। रवीना ने घबराकर तुरंत अपनी साड़ी संभाली और उसका चेहरा शर्म से झुक गया। राघव अपनी पत्नी को सामने देखकर हक्का-बक्का रह गया, उसकी ज़बान जैसे तालू से चिपक गई।
“मोनिका… तुम इस वक्त…” राघव हकलाया।
“हाँ मैं! क्या देख रही हूँ मैं यह सब?” मोनिका फूट-फूटकर रोने लगी। “दीदी, मैंने आपको अपनी सगी बहन से बढ़कर माना! इस घर की बड़ी बहू माना! और आपने मेरे ही पति के साथ… और राघव, तुम? तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आई अपनी पत्नी के साथ धोखा करते हुए?”
रवीना बिस्तर से नीचे उतरी और ज़मीन पर बैठकर रोने लगी, “मोनिका… मुझे माफ़ कर दे… मैं गुनहगार हूँ, जो सज़ा देनी है मुझे दे दे, पर राघव की कोई गलती नहीं है…”
“गलती किसी एक की नहीं, तुम दोनों की है!” मोनिका रोती-चिल्लाती हुई नीचे अपने कमरे में भागी और अपना बैग निकालकर कपड़े पैक करने लगी।
devar bhabhi romance फ़ैसले का मोड़ और देवरानी-जेठानी का फ़ैसला
सुबह की पहली किरण के साथ ही वर्मा हाउस में एक भयानक तूफ़ान आ चुका था। घर का माहौल किसी श्मशान जैसा भारी था। मोनिका अपना बैग लेकर अपने मायके जाने की ज़िद पर अड़ी थी, जबकि रवीना अपनी ग्लानि में घर छोड़कर हमेशा के लिए किसी अनजान शहर जाने का सामान बांध रही थी।
राघव एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था जहाँ उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान था। एक तरफ उसकी कानूनी पत्नी मोनिका थी, जिससे वह प्यार करता था और जिसकी ज़िंदगी संवारने का उसने वादा किया था। दूसरी तरफ उसकी विधवा भाभी रवीना थी, जिसने इस घर के लिए छह साल कुर्बान किए थे और जिसे अब इस मोड़ पर अकेला छोड़ना उसकी नज़रों में सबसे बड़ा पाप था।
राघव अचानक दोनों के बीच में आकर खड़ा हो गया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी दृढता और गहराई थी।
“रुक जाइए आप दोनों!” राघव ने गरजते हुए कहा।
“अब क्या बाकी रह गया है राघव?” मोनिका ने रोते हुए कहा। “तुम्हें जो करना था कर चुके, अब मुझे मेरे रास्ते जाने दो।”
“नहीं मोनिका, तुम कहीं नहीं जाओगी! और भाभी, आप भी अपना बैग नीचे रखिए,” राघव ने सीधे दोनों की आँखों में देखते हुए कहा। “मैं मानता हूँ कि मैंने गलती की है, मैंने तुम्हें अंधेरे में रखा मोनिका। लेकिन मेरी बात ध्यान से सुनो।

मोनिका तुम मेरी पत्नी हो, मेरी आधी ज़िंदगी हो। लेकिन भाभी ने भी इस घर को अपने जीवन के छह सबसे अनमोल साल दिए हैं। जब भाई साहब गए, तो इन्होंने इस परिवार को बिखरने नहीं दिया। आज अगर मैं इन्हें इस मोड़ पर छोड़ देता हूँ या तुम्हें जाने देता हूँ, तो मुझसे बड़ा कायर कोई नहीं होगा।”
“तो तुम चाहते क्या हो?” मोनिका ने गुस्से से पूछा।
“मैं तुम दोनों का साथ चाहता हूँ! मैं न तो अपनी पत्नी को छोड़ सकता हूँ और न ही अपनी भाभी को इस दुनिया के ताने सहने के लिए बेसहारा कर सकता हूँ,” राघव ने साफ शब्दों में कहा।
यह सुनकर दोनों स्तब्ध रह गईं। दिन भर बहस, आँसू, शिकायतों और पुरानी यादों का दौर चला। दोपहर से शाम हो गई।
रवीना ने मोनिका से अकेले में बात की। उसने मोनिका के आगे हाथ जोड़कर कहा, “मोनिका, तू चाहे तो मुझे पुलिस में दे दे, पर इस घर को मत तोड़। राघव तुझसे बहुत प्यार करता है।”
मोनिका ने रवीना की आँखों में देखा। वहां कोई चालाकी या धूर्तता नहीं थी, केवल एक तड़पी हुई औरत का दर्द था। मोनिका का दिल भी पिघलने लगा। उसने सोचा कि अगर वह कोर्ट-कचहरी और मायके जाएगी, तो तमाशा पूरे समाज में बनेगा और राघव की ज़िंदगी भी तबाह होगी।
घंटों के मंथन के बाद, देवरानी और जेठानी ने बंद कमरे में आपस में एक बहुत ही अनोखा, व्यावहारिक और लीक से हटकर फैसला किया।
शाम के सात बजे दोनों कमरे से बाहर आईं। राघव तनाव में हॉल में चक्कर काट रहा था।
मोनिका ने आगे बढ़कर कहा, “राघव, हमने फैसला कर लिया है। हम दोनों इस घर में तुम्हारे साथ रहेंगी। कोई मायके नहीं जाएगा और न ही कोई घर छोड़ेगा।”
राघव की आँखों में खुशी और हैरानी के आँसू आ गए, “सच? तुम दोनों मान गईं?”
रवीना ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ राघव, लेकिन सब कुछ हमारे बनाए नियमों और कायदों से चलेगा।”
devar bhabhi romance टाइम-टेबल और संडे का ‘सरप्राइज’
यह फैसला सुनते ही राघव के सिर से जैसे मन भर का बोझ उतर गया। उसके चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आई। पर राघव तो ठहरा आखिर राघव! उसकी चुलबुली और शरारती आदत भला कहाँ जाने वाली थी!
राघव ने अपने चेहरे पर बेहद गंभीर और मासूम नाटक बनाते हुए, सिर खुजलाते हुए कहा, “अरे वाह! फैसला तो तुम दोनों ने मिलकर बहुत बढ़िया कर लिया भाभी! लेकिन भाई, एक बहुत बड़ी ‘टेक्निकल प्रॉब्लम’ खड़ी हो गई है!”
मोनिका ने भौंहें सिकोड़कर पूछा, “कैसी टेक्निकल प्रॉब्लम?”
राघव ने मासूमियत का मुखौटा पहनकर कहा, “अरे यही कि हफ़्ते में सात दिन होते हैं। किस दिन मैं किसके साथ सोऊँगा, यह तो तय कर लो? वरना पता चला कि रोज़ रात को मेरे कमरे के बाहर तुम दोनों का दंगल हो रहा है!”
यह सुनते ही मोनिका ने झटके से राघव की बांह पर एक हल्का सा मुक्का मारा, “ज़्यादा खुशफहमी पालने की ज़रूरत नहीं है! टाइम-टेबल हम दोनों बहनें पहले ही बनाकर आई हैं!”
रवीना ने अपने हाथ में पकड़ी एक छोटी सी डायरी खोली और गंभीर आवाज़ में पढ़ना शुरू किया, “सुनो राघव! सोमवार, बुधवार और शुक्रवार—ये तीन दिन तुम पूरी तरह से मोनिका के साथ रहोगे। उसके कमरे में!”
मोनिका ने बात आगे बढ़ाते हुए मुस्कुराकर कहा, “और मंगलवार, गुरुवार और शनिवार—ये तीन दिन तुम दीदी के कमरे में रहोगे!”

राघव ने अपनी उंगलियों पर दिन गिने—1, 2, 3, 4, 5, 6। उसने हिसाब लगाया, फिर अचानक उसकी आँखें चमक उठीं। उसने बेहद शरारती और चुलबुले अंदाज़ में दोनों की तरफ देखा और अपने होठों पर एक बत्तीसी दबाते हुए बोला:
“अरे वाह! 6 दिन का तो बहुत बढ़िया डिस्ट्रीब्यूशन हो गया! लेकिन एक मिनट… हफ़्ते में तो सात दिन होते हैं ना? संडे का क्या? संडे का दिन तो खाली रह गया! ठीक है भाई, संडे मेरा ‘ऑफ-डे’ रहेगा… यानी संडे का दिन बाहर वाली के लिए रिज़र्व!”
राघव का इतना कहना ही था कि कमरे में एक सेकंड का सन्नाटा छाया, और अगले ही पल मोनिका और रवीना ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
“अच्छा! बाहर वाली??” दोनों एक साथ चिल्लाईं!
इससे पहले कि राघव वहां से भाग पाता, मोनिका ने उसका दायां कान कसकर मरोड़ा और रवीना ने बायां कान पकड़कर जोर से खींच दिया!
“आहहह! अयाअया! अरे मम्मा गो! छोड़ो-छोड़ो, कान उखड़ जाएगा! मज़ाक कर रहा था बाबा!” राघव दर्द और हँसी के मारे कसमसाते हुए चिल्लाने लगा।
“बाहर वाली लाएंगे यह! हिम्मत तो देखो इनकी दीदी!” मोनिका ने कान को थोड़ा और मरोड़ते हुए कहा।
“हाँ मोनिका, संडे को इसके लिए कोई छुट्टी नहीं है! संडे को यह सुबह उठकर पूरे घर का पोछा लगाएगा, हम दोनों के पैर दबाएगा और रसोई के सारे बर्तन मांजेगा!” रवीना ने भी हँसते हुए कान पर पकड़ मजबूत कर ली।
“अरे बाप रे बाप! कान छोड़ दो मेरी माताओं! संडे को मैं तुम दोनों के लिए अपने हाथों से शाही पनीर बनाऊँगा, बर्तन भी धोऊँगा और झाड़ू भी लगाऊँगा, पक्का!” राघव ने हाथ जोड़कर रोने का नाटक किया।
राघव की इस नौटंकी पर रवीना और मोनिका अपनी हँसी रोक न सकीं। दोनों ने हँसते हुए उसके कान छोड़े। पूरे ‘वर्मा हाउस’ में जो तनाव का गुबार फैला था, वह ठहाकों की गूँज में हवा हो गया। एक अनोखा, थोड़ा चटपटा और पूरी तरह खुशहाल परिवार अपनी नई शर्तों और नए टाइम-टेबल पर मुस्कुरा रहा था। devar bhabhi romance
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