Devar Bhabhi Love Story देहरादून में रविवार की सुबह का मतलब होता है—थोड़ी देर से सोकर उठना, सुहानी ठंड का अहसास और रसोई से उठती गरम चाय की खुशबू। लेकिन राजपुर रोड वाले इस घर में रविवार की सुबह का एक और खास मतलब होता था—’लक्ष्मी और मुकेश की तकरार!’
लक्ष्मी रसोई में खड़ी अदरक और इलायची कूट रही थी। पीली सूती साड़ी, सिर पर बना एक ढीला-ढाला जुड़ा और चेहरे पर सुबह की ताज़गी। अभी चाय उबल ही रही थी कि पीछे से चप्पलों के घसीटने की आवाज़ आई। Devar Bhabhi Love Story
मुकेश आखें मलता हुआ, लोअर और बिखरे बालों वाली टी-शर्ट में रसोई के दरवाजे पर आकर टिक गया। Devar Bhabhi Love Story
“भाभी… ज़रा चाय में चीनी कम और अदरक ज़रा ज़्यादा ठोंकना। आज सर भारी हो रहा है,” मुकेश ने उबासी लेते हुए हुकुम सा चलाया।

लक्ष्मी ने हाथ में पकड़ी कलछी को कड़ाही से टकराते हुए मुड़कर देखा। “वाह रे मेरे मर्चेंट नेवी के कैप्टन! ऑर्डर तो ऐसे दे रहे हैं जैसे नौसेना का जहाज़ चला रहे हों। ज़रा घड़ी देखी है? सुबह के नौ बज रहे हैं और नवाब साहब अब सोकर उठे हैं!”
“अरे भाभी, हफ़्ते में एक ही दिन तो सोने को मिलता है,” मुकेश ने मासूमियत का मुखौटा पहनते हुए कहा। “और वैसे भी, मेरी चाय का असली टेस्ट तो सिर्फ़ आपके हाथों से ही आता है। मम्मी तो चाय कम और मीठा पानी ज़्यादा बनाती हैं।”
“मक्खन लगाना बंद करो मुकेश,” लक्ष्मी ने नकली गुस्से से आँखें दिखाईं। “चाय मिलेगी, लेकिन एक शर्त पर! पहले जाकर नहाओ, और हाँ… नाश्ते के बाद बाज़ार से धनिया और हरी मिर्च लाकर दो, तभी चाय का कप हाथ में मिलेगा।”
“अरे! चाय पीने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ेगी इस घर में?” मुकेश ने अपना सिर पकड़ लिया।
“रिश्वत नहीं, इसे ‘ड्यूटी’ कहते हैं देवर जी!” लक्ष्मी ने मुस्कान छुपाते हुए चाय दो कपों में छानी।
Devar Bhabhi Love Story: पनीर के पकौड़े और ‘ऑपरेशन चोरी’
बारिश की हल्की फुहारें शुरू हो चुकी थीं। मौसम देखते ही लक्ष्मी ने गरम-गरम पनीर और प्याज के पकौड़े तलने का मन बना लिया। पूरे घर में बेसन और अजवाइन की सोंधी खुशबू फैल गई।
लक्ष्मी ने एक प्लेट में ताज़े, कुरकुरे पकौड़े निकाले और उन्हें डाइनिंग टेबल पर रखकर दो मिनट के लिए चटनी लेने रसोई में मुड़ी।
बस… इसी मौके की ताक में मुकेश दीवार के पीछे छिपा बैठा था।
जैसे ही लक्ष्मी मुड़ी, मुकेश ने बिल्ली की तरह दबे पाँव आकर प्लेट से चार सबसे बड़े पकौड़े एक साथ उठा लिए और गाल फुलाकर मुँह में ठूँस लिए।
लेकिन बदकिस्मती से, गरम पकौड़े ने अपना काम कर दिया।
“उफ़्फ़… आहह… उम्फ़!” मुकेश का मुँह जलने लगा और वह बिना चबाए हवा खींचने लगा।
तभी लक्ष्मी हाथ में चटनी की कटोरी लिए बाहर आई। मुकेश को मुँह में पकौड़े ठूँसे और आँखें बड़ी-बड़ी किए देखकर लक्ष्मी की हँसी छूट गई। वह टेबल पर हाथ रखकर खिलखिलाकर हँस पड़ी।

“आ हा हा! लो कर लो बात! ‘चोर पकड़े गए!’ थोड़ा सब्र नहीं होता? अब जला लिया न मुँह?” लक्ष्मी ने उसे तुरंत पानी का गिलास पकड़ाया।
मुकेश ने गटक-गटक कर पानी पिया और गहरी साँस ली। फिर बेशर्मी से मुस्कुराते हुए बोला, “अरे भाभी, गरम पकौड़े चोरी करके खाने का न… मज़ा ही अलग है! और वैसे भी, यह आपकी गलती है।”
“मेरी गलती? वो कैसे?” लक्ष्मी ने अपने हाथ कमर पर टिकाए।
“अब आप इतना स्वादिष्ट नाश्ता बनाएंगी, तो शरीफ़ इंसान भी डाकू बन जाएगा!” मुकेश ने एक और पकौड़ा उठाकर चटनी में डुबोते हुए कहा।
“तुम्हारी बातों का कोई जवाब नहीं है मुकेश,” लक्ष्मी ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में अपने देवर के लिए स्नेह साफ़ झलक रहा था।
Devar Bhabhi Love Story: शॉपिंग की सजा!
दोपहर को सुमित्रा जी (मम्मी जी) ने मुकेश को फरमान सुना दिया—”मुकेश, लक्ष्मी को बाज़ार ले जाओ। इसे अपने लिए और घर के लिए कुछ सामान लेना है।”
मुकेश का चेहरा उतर गया। “मम्मी… औरतों की शॉपिंग? मतलब मेरा पूरा संडे बर्बाद! ये एक साड़ी देखने के लिए पचास दुकानें घूमती हैं।”
“ज्यादा नाटक मत करो,” लक्ष्मी ने पर्स संभालते हुए कहा। “चुपचाप बाइक निकालो। और हाँ, आज सामान उठाने की पूरी जिम्मेदारी आपकी है।”
पलटन बाज़ार में लक्ष्मी एक-एक दुकान पर जाकर कपड़ों के रंग और कपड़े का स्टफ़ देख रही थी। मुकेश हाथ में तीन-चार पॉलीथिन बैग लटकाए, थका-हारा उसके पीछे-पीछे घिसट रहा था।
“भाभी… दया करो!” मुकेश एक दुकान के बाहर रुककर गिड़गिड़ाया। “तीन घंटे हो गए हैं। इस नीले सूट में और उस गहरे नीले सूट में क्या फर्क है? दोनों नीले ही तो हैं!”

“आपको क्या समझ आएगा कैप्टन साहब?” लक्ष्मी ने इतराते हुए कहा। “यह ‘रॉयल ब्लू’ है और वो ‘नेवी ब्लू’ है। फर्क ज़मीन-आसमान का है।”
“मुझे तो बस इतना फर्क समझ आ रहा है कि मेरी टाँगें जवाब दे चुकी हैं,” मुकेश एक बेंच पर बैठ गया। “अगर अब आप किसी और दुकान में घुसीं, तो मैं यहीं बाज़ार के बीच में धरना देकर बैठ जाऊँगा कि ‘मेरी भाभी मुझ पर अत्याचार कर रही है!'”
लक्ष्मी अपनी हँसी नहीं रोक पाई। “अच्छा बाबा, ठीक है! शॉपिंग ख़त्म। अब चलो, तुम्हें तुम्हारी पसंदीदा चाट खिलाती हूँ।”
चाट का नाम सुनते ही मुकेश के चेहरे पर एकदम से बत्ती जल गई। “देखा! इसे कहते हैं सही टाइम पर सही फैसला! चलिए फिर, टिक्की का बिल आप ही भरेंगी!”
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Devar Bhabhi Love Story: पारिवारिक मिठास और स्नेहल रिश्ता
शाम को पूरा परिवार – सास, ससुर, लक्ष्मी और मुकेश – बरामदे में बैठकर चाय पी रहे थे।
पति समीर के चले जाने के बाद, शुरुआती दिन लक्ष्मी के लिए बहुत भारी और उदासी भरे थे। लेकिन मुकेश की इस नादानी, शरारतों और बेफिक्र मिज़ाज ने धीरे-धीरे घर के उस उदास सन्नाटे को तोड़ दिया था। मुकेश कभी जान-बूझकर कोई बचकानी हरकत करता, तो कभी लक्ष्मी से डाँट खाकर मुस्कुरा देता, ताकि लक्ष्मी का ध्यान अपने गम से हट सके।
“मम्मी जी,” मुकेश ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा। “आप भाभी को थोड़ा कम काम दिया करो। आज बाज़ार में मुझे कितना डरा रही थीं कि घर जाकर मुझसे झाड़ू लगवाएंगी!”
“झूठे नंबर वन!” लक्ष्मी ने तुरंत विरोध किया। “मम्मी जी, यह अपनी तरफ से बना रहा है! उल्टा मैंने तो इसे चाट खिलाई।”

सुमित्रा जी दोनों को देखकर मुस्कुरा दीं। “मुझे सब पता है रे! तुम दोनों जब तक दिन में चार बार एक-दूसरे की खिंचाई न कर लो, तुम लोगों का खाना हजम नहीं होता।”
ससुर जी भी हँस पड़े। “मुकेश, अपनी भाभी को तंग मत किया कर, वरना अगली बार जब तू नेवी की ड्यूटी पर जाएगा, तो घर से पापड़ और अचार के डिब्बे गायब मिलेंगे!”
“अरे नहीं-नहीं दादाजी! भाभी ऐसा अत्याचार नहीं करेंगी,” मुकेश ने कान पकड़ते हुए लक्ष्मी की तरफ देखा। “क्यों भाभी?”
लक्ष्मी ने हँसते हुए उसके लिए चाय का दूसरा कप आगे बढ़ा दिया। “अब सीधे बन रहे हो? लो चाय पियो, वरना ठंडी हो जाएगी।”
देहरादून की शाम ढल रही थी, हल्की-हल्की ठंड हवा में घुल रही थी, और उस घर के बरामदे में ठहाकों और अपनों के प्यार की गर्माहट फैली हुई थी। यह रिश्ता केवल देवर और भाभी का नहीं था, बल्कि दो ऐसे दोस्तों का था जो एक-दूसरे की हँसी की वजह थे। Devar Bhabhi Love Story
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