उत्तराखंड के ऋषिकेश की सुबह जब गंगा आरती के शंखनाद और मंत्रोच्चार के साथ होती है, तो ऐसा लगता है मानो पूरी वादियों में एक असीम शांति घुल गई हो। इसी पवित्र नगरी के एक छोटे से, साफ-सुथरे मकान में रहता था रावत परिवार। परिवार में पांच लोग थे- बूढ़े माता-पिता, बड़ा बेटा दीपक, उसकी पत्नी राधिका और छोटा बेटा मयंक।
चार साल पहले जब रुड़की की रहने वाली 25 वर्षीय राधिका इस घर में ब्याह कर आई थी, तो घर की रौनक ही बदल गई थी। राधिका स्वभाव से बेहद चंचल, बातूनी और हर पल मुस्कुराने वाली लड़की थी। उसने बीए तक पढ़ाई की थी, लेकिन उसकी समझदारी किसी बड़ी डिग्री से कहीं ज्यादा गहरी थी।
Devar bhabhi love story : बीटेक की डिग्री और बेरोजगारी
वहीं उसका पति दीपक, उम्र करीब 28 साल, बीटेक की डिग्री जेब में लिए नौकरी की तलाश में थक चुका था। आखिरकार, परिवार को संभालने के लिए उसने ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को अपनी ऑटो में बिठाकर मंदिरों और घाटों के दर्शन कराने का काम शुरू कर दिया था। वह दिन-भर मेहनत करता ताकि घर की खुशियां बरकरार रहें।
छोटा भाई मयंक अभी पास के ही एक संस्थान से आईटीआई कर रहा था। घर में दीपक और मयंक की कोई बहन नहीं थी, इसलिए पूरा घर अक्सर एक सूनेपन का अहसास करता था, जिसे राधिका ने अपनी चंचलता से भर दिया था।

Devar bhabhi love story
ससुराल में राधिका और मयंक का रिश्ता देवर-भाभी का कम, दो पक्के दोस्तों का ज्यादा था। घर में जब भी मयंक कोई शरारत करता, राधिका उसकी ढाल बन जाती।
“भाभी! ओ भाभी! जरा सुनना, आज कॉलेज में टेस्ट है और मेरी नीली वाली शर्ट नहीं मिल रही। कहीं आपने उसे गंगा जी में तो नहीं बहा दिया?” मयंक ने कमरे से चिल्लाते हुए पूछा।
राधिका रसोई से हाथ में बेलन लिए निकली और अपनी बड़ी-बड़ी आंखें तरेरते हुए बोली, “हां मयंक जी! बिल्कुल बहा दिया। तुम्हारी उस शर्ट पर इतनी धूल थी कि गंगा मैया को भी उसे धोने में दो दिन लगेंगे! अलमारी के दाहिने कोने में देखो, तुम्हारी वो ‘राजकुमार’ वाली शर्ट वहीं प्रेस करके रखी है।”
मयंक ने हंसते हुए शर्ट निकाली और बोला, “मानना पड़ेगा भाभी, भैया भले ही बीटेक करके ऑटो चला रहे हों, लेकिन उन्होंने ढूंढकर ‘ऑल-इन-वन’ बीवी पाई है।”
“अच्छा! ज्यादा मक्खन मत लगाओ। चलो, चुपचाप नाश्ता करो,” राधिका ने मुस्कुराते हुए मयंक के सिर पर धीरे से बेलन छुआ दिया। घर में ऐसा ही हंसी-मजाक हर रोज गूंजता था।

Devar bhabhi love story: सूनी कलाई और वो पवित्र संकल्प
शादी के पहले साल जब सावन का महीना आया, तो ऋषिकेश की खूबसूरती देखने लायक थी। चारों तरफ कांवड़ियों की भीड़ और बम-बम भोले के जयकारे गूंज रहे थे। इसी बीच रक्षाबंधन का पवित्र त्योहार आ गया। सुबह-सुबह दीपक अपनी ऑटो लेकर स्टेशन की तरफ निकल गया, क्योंकि त्योहार के दिन सवारियां ज्यादा मिलती थीं और वह कुछ अतिरिक्त कमाना चाहता था।
घर में सन्नाटा था। राधिका तैयार होकर रसोई से बाहर आई, तो उसने देखा कि मयंक सोफे पर चुपचाप बैठा है। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मायूसी थी। वह खिड़की से बाहर देखते हुए गहरी सोच में डूबा था। दरअसल, बचपन से ही मयंक और दीपक की कोई बहन नहीं थी। हर साल रक्षाबंधन पर जब दोस्तों की कलाइयां राखियों से सजती थीं, तो मयंक अपनी खाली कलाई को छुपाए घूमता था। आज भी उसकी वही कलाई सूनी थी।
राधिका ने मयंक की मायूसी को भांप लिया, लेकिन माहौल को हल्का करने के लिए वह अपनी चंचल आदत के मुताबिक मयंक के पास गई और बोली, “अरे वाह मयंक जी! आज तो बड़े हैंडसम लग रहे हो। क्या बात है, आज किसी को ऋषिकेश के लक्ष्मण झूले पर डेट पर ले जाने का इरादा है क्या? इतनी शांति क्यों है भाई?”
Devar bhabhi love story : ममतामयी दुलार
मयंक ने बिना उसकी तरफ देखे, बेहद बुझे हुए स्वर में कहा, “भाभी, प्लीज। आज मेरा मजाक का मूड बिल्कुल नहीं है। आप जाकर अपना काम कीजिए।”
मयंक की आवाज में छिपा दर्द राधिका के दिल को छू गया। उसने तुरंत अपनी चंचलता को एक तरफ रख दिया। उसके भीतर की एक परिपक्व, ममतामयी और समझदार भाभी जाग उठी। वह बिना कुछ कहे तुरंत घर से बाहर निकली, पास के बाजार गई और वहां से एक बेहद खूबसूरत रेशमी राखी, रोली, अक्षत और ताजी मिठाइयां लेकर लौटी।
उसने आते ही दीपक को भी फोन करके जल्दी घर बुलाया। जब दीपक घर पहुंचा, तो राधिका ने पूजा की थाली सजाई।
वह मयंक के सामने जाकर खड़ी हो गई और बेहद गंभीर लेकिन आत्मीय आवाज में बोली, “मयंक, जरा इधर देखना।”
मयंक ने सिर उठाया तो देखा कि राधिका के हाथ में पूजा की थाली थी और उसकी आंखों में एक बहन सा प्यार तैर रहा था।
“यह क्या है भाभी?” मयंक ने हैरान होकर पूछा।
राधिका ने मुस्कुराते हुए कहा, “मेरे नटखट देवर जी… मैं सिर्फ आपकी भाभी नहीं हूं। आज से मैं आपकी बहन भी हूं, यदि आप मुझे इस रूप में स्वीकार करो तो। आज के बाद इस घर में किसी की कलाई रक्षाबंधन पर सूनी नहीं रहेगी।”
Devar bhabhi love story
मयंक हतप्रभ रह गया। उसकी आंखों में आंसू तैरने लगे। उसने लड़खड़ाती आवाज में कहा, “लेकिन भाभी… समाज क्या कहेगा? कोई अपनी भाभी से राखी थोड़े ही बंधवाता है? लोग बातें बनाएंगे।”
दीपक ने आगे बढ़कर मयंक के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “पागल है क्या मयंक? रिश्ता दिल से होता है, समाज से नहीं। अगर राधिका तुझे अपना भाई मानकर यह हक दे रही है, तो इनकार मत कर।”
थोड़ी बहस और अपनों के प्यार के आगे मयंक हार गया। राधिका ने मयंक के माथे पर तिलक लगाया, अक्षत लगाए और उसकी कलाई पर वो पवित्र रेशमी धागा बांध दिया। मयंक ने राधिका के पैर छुए, तो राधिका ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उस दिन देवर-भाभी के उस चंचल रिश्ते के ऊपर भाई-बहन के एक परम पवित्र और गहरे अहसास की परत चढ़ गई।

Devar bhabhi love story: पहाड़ सा टूटा दुख का पहाड़
वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा। इस घटना को तीन साल बीत चुके थे। मयंक की आईटीआई पूरी होने वाली थी और वह नौकरी की तलाश में था। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
एक शाम, ऋषिकेश में भारी बारिश हो रही थी। दीपक कुछ पर्यटकों को लेकर नीलकंठ महादेव मंदिर से वापस लौट रहा था। पहाड़ी रास्तों पर अचानक भूस्खलन (landslide) हुआ और एक बड़ा पत्थर दीपक की ऑटो पर आ गिरा। गाड़ी असंतुलित होकर गहरी खाई में जा गिरी।
जब रात के 11 बजे रावत परिवार के दरवाजे पर पुलिस की गाड़ी रुकी, तो पूरे घर का दिल दहल गया। पुलिस ने जब दीपक की मौत की खबर दी, तो मानो पूरे परिवार पर आसमान टूट पड़ा। राधिका के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसकी चंचलता, उसकी हंसी, उसकी दुनिया- सब कुछ एक पल में राख हो गई। बूढ़े माता-पिता सदमे में चले गए।
25 साल की उम्र में राधिका विधवा हो चुकी थी। घर का कमाऊ सदस्य चला गया था और पूरे परिवार की जिम्मेदारी अब 22 साल के मयंक के कंधों पर आ गई थी। मयंक ने अपने आंसुओं को अंदर ही अंदर सुखा लिया। उसने देखा कि उसकी वो चंचल भाभी, जिसने कभी उसकी कलाई सूनी नहीं रहने दी थी, आज एक जिंदा लाश बन चुकी थी। मयंक ने फैसला किया कि वह अपने भाई का स्थान तो नहीं ले सकता, लेकिन अपने माता-पिता और अपनी उस ‘बहन जैसी भाभी’ को कभी बेसहारा नहीं होने देगा।

Devar bhabhi love story: समाज का दबाव और मर्यादा की परीक्षा
दीपक की मृत्यु के कुछ महीनों बाद, राधिका के पिता रुड़की से अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ आए। उन्होंने रावत परिवार की तंगहाली और राधिका की कम उम्र को देखते हुए मयंक के माता-पिता से बात की।
“समधी जी, दीपक चला गया, इसका हमें गहरा दुख है। लेकिन राधिका की पूरी जिंदगी आगे पड़ी है। वह अभी सिर्फ 25 साल की है। हम उसे अपने साथ रुड़की ले जाना चाहते हैं और उसकी दूसरी शादी कराना चाहते हैं,” राधिका के पिता ने कहा।
जब यह बात राधिका तक पहुंची, तो उसने साफ मना कर दिया। उसने रोते हुए कहा, “पिताजी, मैं इस घर को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। मम्मी-पापा बूढ़े हैं, दीपक की यादें इस घर के कण-कण में हैं। मैं दीपक के माता-पिता को इस हाल में छोड़कर अपनी खुशियां ढूंढने नहीं जा सकती।”
जब राधिका अपने फैसले पर अड़ गई, तो समाज और रिश्तेदारों ने एक नया रास्ता निकाला। उन्होंने मयंक और राधिका के माता-पिता पर दबाव बनाना शुरू किया।
“अगर राधिका इसी घर में रहना चाहती है, तो मयंक की उम्र भी तो हो ही गई है। क्यों न मयंक और राधिका की शादी करा दी जाए? देवर-भाभी की शादी हमारे समाज में कोई नई बात नहीं है। इससे राधिका को इस घर में एक नाम मिल जाएगा और रावत परिवार की बहू भी घर में ही रहेगी,” रिश्तेदारों ने दलील दी।
राजस्थान: इस सच्चे प्यार ने दी हर मुश्किल को मात, हादसे में गंवाया पैर, परिवार से की लड़ाई
Devar bhabhi love story
जब मयंक और राधिका को इस प्रस्ताव के बारे में पता चला, तो दोनों के पैरों तले जमीन खिसक गई।
मयंक तुरंत राधिका के कमरे में गया। राधिका घूंघट निकाले रो रही थी। मयंक ने दूर खड़े होकर कहा, “भाभी… यह समाज क्या कह रहा है? जिस कलाई पर आपने तीन साल पहले भाई मानकर राखी बांधी थी, आज लोग उसी रिश्ते को तार-तार करना चाहते हैं। मैं यह पाप कभी नहीं कर सकता। मेरे मन में आपके लिए सिर्फ एक मां और बहन जैसा सम्मान है।”
राधिका ने अपने आंसू पोंछे, उठकर खड़ी हुई और मयंक के सिर पर हाथ रखकर बोली, “शांत हो जाओ मयंक। जो पवित्र धागा हमने एक बार बांध दिया, उसकी मर्यादा को यह समाज कभी नहीं समझ पाएगा। मैं भी इस शादी के लिए कभी तैयार नहीं होऊंगी। हमारा रिश्ता इस समाज की संकीर्ण सोच से कहीं ऊपर है।”
दोनों ने मिलकर पूरे परिवार और समाज के सामने अपने फैसले की घोषणा कर दी। उन्होंने साफ कह दिया कि वे शादी नहीं करेंगे, लेकिन एक ही घर में रहकर, बिना किसी शारीरिक या सामाजिक बंधन के, एक-दूसरे का संबल बनेंगे। समाज ने बहुत बातें बनाईं, ताने दिए, लेकिन दोनों अपने फैसले पर अडिग रहे।

Devar bhabhi love story: त्याग, कर्तव्य और एक नया सवेरा
वक्त बीतने के साथ मयंक की मेहनत रंग लाई। उसकी आईटीआई पूरी होने के बाद, देहरादून की एक प्रतिष्ठित प्राइवेट कंपनी में उसकी नौकरी लग गई। शुरुआत में वेतन कम था, लेकिन मयंक की लगन देखकर जल्द ही उसका प्रमोशन हो गया। अब घर में पैसों की तंगी खत्म हो चुकी थी। बूढ़े माता-पिता की दवाइयां समय पर आने लगीं और घर की गाड़ी फिर से पटरी पर लौट आई।
मयंक और राधिका ने अपने जीवन के सबसे खूबसूरत साल-अपनी युवावस्था और शादी की इच्छाओं को- एक-दूसरे के सम्मान और परिवार के कर्तव्य की खातिर कुर्बान कर दिया था। दोनों एक ही छत के नीचे रहते थे। राधिका घर संभालती है, माता-पिता की सेवा करती है और मयंक कमाकर लाता है। उनके बीच अब वो अल्हड़ हंसी-मजाक तो नहीं था, लेकिन एक ऐसी खामोश समझदारी और गहरा सम्मान था, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था।
एक दिन, जब माता-पिता थोड़े स्थिर हुए, तो राधिका ने मयंक से कहा, “मयंक, घर में सब कुछ है, लेकिन एक सूनापन है। तुमने मेरे और इस परिवार के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी, कभी अपनी गृहस्थी नहीं बसाई। मैं चाहती हूँ कि इस घर में किसी बच्चे की किलकारी गूंजे।”
Devar bhabhi love story
मयंक ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, जो विचार आपके मन में है, वही मेरे मन में भी है। क्यों न हम किसी अनाथ बच्चे को एक नई जिंदगी दें?”
अगले ही महीने, मयंक और राधिका ऋषिकेश के एक स्थानीय अनाथ आश्रम गए। वहां उन्होंने वैधानिक प्रक्रिया पूरी करने के बाद एक तीन महीने की बेहद प्यारी और मासूम बच्ची को गोद ले लिया।
जब वे उस बच्ची को घर लेकर आए, तो पूरे घर में जैसे खुशियों का त्योहार आ गया। बूढ़े दादा-दादी की आंखों में पोती को देखकर खुशी के आंसू थे।
शाम को गंगा किनारे घाट पर बैठकर मयंक और राधिका उस बच्ची को निहार रहे थे। ठंडी हवाएं चल रही थीं और गंगा की लहरें कल-कल कर बह रही थीं।
“भाभी, इसका नाम क्या रखें?” मयंक ने बच्ची को गोद में लेते हुए पूछा।
राधिका ने गंगा जी की तरफ देखा और कहा, “इसका नाम ‘पावनी’ रखेंगे… पवित्र गंगा की तरह। जिसने हमारे इस अजीब, लेकिन सबसे पवित्र रिश्ते को एक नया अर्थ दे दिया।”
मयंक ने पावनी को राधिका की गोद में दे दिया। समाज जिसे ‘देवर-भाभी’ कहता था, उन्होंने बिना शादी किए, बिना किसी मर्यादा को तोड़े, दुनिया के सामने त्याग और निश्छल प्रेम की एक ऐसी ‘रियल स्टोरी’ लिख दी थी, जिसकी मिसाल खुद गंगा मैया की लहरें दे रही थीं। दोनों ने अपनी व्यक्तिगत खुशियों की कुर्बानी देकर एक अनाथ जिंदगी को सहारा दिया था, और यही उनके इस अनोखे और भावुक सफर का सबसे खूबसूरत मुकाम था। Devar bhabhi love story
रोजाना लेटेस्ट रोमांटिक और रियल लव स्टोरी पढ़ने के लिए हमारे व्हाटसएप चैनल को फॉलो करें।




